Published on Jul 31, 2023 Updated 0 Hours ago

 रूस पर लगाये गये प्रतिबंध वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बोझ डाल रहे हैं, क्योंकि सप्लाई चेन्स प्रभावित हुई हैं.

रूस पर अमेरिकी प्रतिबंध: ‘हज़ारों ज़ख़्म’ देने की रणनीति के समानांतर नुक़सान भी हैं!
रूस पर अमेरिकी प्रतिबंध: ‘हज़ारों ज़ख़्म’ देने की रणनीति के समानांतर नुक़सान भी हैं!

यूक्रेन संकट युद्ध की ज़रूरत की गैर-मौजूदगी के बजाय युद्ध की गैर-मौजूदगी पर आधारित, निष्क्रिय संतुलन के नाजुकपन को स्पष्ट करता है. समतापूर्ण और शक्तिसंपन्न वैश्विक नियम-निर्माण, जो सभी देशों के बीच भरोसा और सम्मान प्रेरित करता हो, अब भी कुछ दूर है. जब तक यह हक़ीक़त नहीं बन जाता, त्वरित क्षेत्रीय लाभों के ज़रिये सुरक्षा अंतराल से नफ़ा हासिल कर लेने का लालच हमेशा रहेगा.

झूठमूठ की शांति मोहक है. हमेशा मिसाइल दागने को तैयार बैठे उत्तर कोरिया के धमाकों को, ख़ुद से मतलब रखने वाले और आर्थिक रूप से अलग-थलग एक शासन द्वारा, अपने को बचाये रखने के इरादे से की जा रही पैंतरेबाजी मानकर अनेदखा करना सुविधाजनक हो गया. इसी इरादे को अगर रूस, चीन, या अमेरिका जैसी किसी सैन्य महाशक्ति के लिए बड़ा करके देखें, तो दुनिया निश्चित रूप से असुरक्षित लगती है, ख़ासकर ऐसी वैश्विक मध्यस्थता प्रणाली के बग़ैर जो बदलते भू-आर्थिक और, लिहाज़ा, भू-राजनीतिक आधारों की स्पष्ट संस्थागत स्वीकृति से निर्णायक क़दम उठाने की क्षमता हासिल करती हो.

शक्तिविहीन वैश्विक संस्थान सर्वोत्तम से निम्न (सबऑप्टिमल) समाधानों को बढ़ावा देते हैं

एक प्रभावकारी मध्यस्थता संस्थान की गैर-मौजूदगी में, अमेरिका की अगुवाई वाले पश्चिमी गठबंधन को रूसी सुरक्षा चिंताओं की अनदेखी करना और नाटो का पूर्व की तरफ़ विस्तार करना रास आया है. इसने रूस को प्रोत्साहित किया कि वह खेल बिगाड़ने वाले की भूमिका में आए और विवादित संपत्तियों पर सैन्य ताक़त से दख़ल करे. यह चीन को किनारे बैठने में सक्षम बनाता है, और वह सैन्य कार्रवाई के लिए निंदा नहीं करके रूस का हौसला अफ़ज़ाई करता है, क्योंकि यह एक समतापूर्ण, वैश्विक शांति को लागू कर पाने में पश्चिमी गठबंधन की घटती क्षमता को भी साथ में उजागर करता है.  इसी तरह यह भारत को एक अवसर प्रदान करता है कि वह रूस, जो एक दीर्घकालिक सैन्य उपकरण आपूर्तिकर्ता और रणनीतिक साझेदार है, की निंदा से अलग रहकर अपने निकटकालीन राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाए.

अमेरिका की वैश्विक तकनीकी और सैन्य पहुंच को स्वीकार करते हुए, समय-समय पर उसके अदब में सर झुकाने के बदले में, व्यावहारिक और लागत-सचेत यूरोप अमेरिकी रक्षा ख़र्च का मुफ़्त फ़ायदा उठाता है.

यहां तक कि क्रीमिया पर क़ब्ज़े (2014) के लिए सैन्य ताक़त का इस्तेमाल किये जाने में रूस की हठधर्मिता से आंखें फेर लेने में यूरोप भी सहभागी है. रूस को बस एक हल्की-सी झिड़की लगायी गयी, क्योंकि सस्ती प्राकृतिक गैस तक पहुंच और यूरोप के कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. अमेरिका की वैश्विक तकनीकी और सैन्य पहुंच को स्वीकार करते हुए, समय-समय पर उसके अदब में सर झुकाने के बदले में, व्यावहारिक और लागत-सचेत यूरोप अमेरिकी रक्षा ख़र्च का मुफ़्त फ़ायदा उठाता है. वहीं अमेरिका को अपने लिए, दूर-दराज़ के भू-राजनीतिक हॉटस्पाट्स (पूरे अटलांटिक और प्रशांत महासागर क्षेत्र में) का अपतटीय प्रबंधन सुविधाजनक लगता है, और जिससे अमेरिकी आर्थिक महाशक्ति को पैसे बनाने जारी रखने की अनुमति मिलती है.

यूक्रेन जिस तरह की सीमांतवर्तिता (ब्रिंकमैनशिप) का सामना करता है वह भारत के लिए अजनबी नहीं है. भारत, जो निगले जाने के लिए बहुत बड़ा और अनुशासनहीन छोड़े जाने के लिए बहुत विशाल है, चीन की ओर से एकतरफा आक्रामकता झेलता रहा है. यूक्रेन की तरह, भारत सशस्त्र संघर्ष के बावजूद चीन के साथ विवादित सीमा को फिर से जबरन खींचने के ख़िलाफ़ दृढ़प्रतिज्ञ रहा है.

लेकिन बीते तीन दशकों में दोनों एशियाई पड़ोसियों की सापेक्ष शक्तियों में जैसे-जैसे फ़ासला बढ़ा है, भारत इस मुद्दे पर चीनी संवेदनशीलताओं को लेकर कहीं ज़्यादा आदरपूर्ण हो गया है. कूटनीति, वार्ता, और समायोजन ने विवाद को उस तरह के गंभीर सैन्य टकराव तक बढ़ने से रोके रखा है, जिस तरह के टकराव में वह एक ज़्यादा कमज़ोर विपक्षी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जाने का इच्छुक रहा है.

दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में चीनी दावों के ख़िलाफ़ आसियान, जापान और दक्षिण कोरिया की ओर से चीन की सीमांतवर्तिता के प्रति इसी तरह की संभली हुई प्रतिक्रिया देखी जाती है. मामला काफ़ी बिगड़ने के बावजूद, ‘युद्ध की गैर-मौजूदगी’ का सिद्धांत बनाये रखा गया है.

बढ़ता चीन उसके लिए या दुनिया के लिए कोई ख़तरा नहीं है, इस ‘ख़याली’ नैरेटिव को जारी रखना अमेरिका को जंचता है. एक समृद्ध और दृढ़ चीन, जो जिन्सों (कमोडिटीज) के लिए भूखा और सभी की जेबों को जंचने वाली सस्ती मैन्यूफैक्चरिंग का माहिर है, निश्चित रूप से एक वैश्विक आर्थिक गतिप्रदाता रहा है, जिसने बीते तीन दशकों में उच्च खपत स्तर को संभव बनाया, वैश्विक वृद्धि दर को ऊपर ले गया, और वैश्विक ग़रीबी को कम किया. लेकिन जैसे-जैसे उसकी अर्थव्यवस्था समृद्ध हुई, वैसे-वैसे वैश्विक महत्वाकांक्षाएं भी बढ़ीं हैं.

कूटनीति, वार्ता, और समायोजन ने विवाद को उस तरह के गंभीर सैन्य टकराव तक बढ़ने से रोके रखा है, जिस तरह के टकराव में वह एक ज़्यादा कमज़ोर विपक्षी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जाने का इच्छुक रहा है.

अनसुलझे स्थानीय विवादों की वैश्विक क़ीमत चुकानी पड़ती है

आक्रमणकारियों पर लगाम लगाने में संस्थानिक सीमाबद्धताओं ने दिलचस्प स्थिति पैदा की है, जहां आक्रमणकारी देश को आर्थिक रूप से लहूलुहान करने के लिए आर्थिक प्रतिबंध के रास्ते तलाशते हैं- यानी आक्रमणकारी से सैन्य रूप से भिड़ने के ज़्यादा झंझट भरे विकल्प की तुलना में सीधे हाथ न डालने का विकल्प. लेकिन रूस जैसी अर्थव्यवस्था, जो गेहूं, कच्चे तेल एवं गैस और धातुओं के वैश्विक व्यापार से जुड़ी हुई है, पर प्रतिबंधों और नतीजतन काला सागर क्षेत्र (जो क्षेत्रीय जहाज़रानी का हब है) में अनिश्चितता के तत्काल पड़ने वाले नकारात्मक वैश्विक प्रभाव हैं.

चूंकि यह संकट महामारी की पीठ पर सवार होकर आया है, यह वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ाता है. अगर संघर्ष खिंचते हुए गतिरोध में बदल जाता है, तो समय के साथ वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग और स्रोत विकसित हो सकते हैं- जैसा कि ईरान के मामले में है, मौजूदा ईरानी प्रतिबंध हलके किये जा सकते हैं, मौजूदा तेल कुओं से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और भुगतान प्रतिबंधों से निपटने के तरीक़े निकाले जा सकते हैं – हालांकि रूसी तेल उत्पादन एक करोड़ बैरल प्रतिदिन का है, जो ईरान के मुक़ाबले तीन गुना ज़्यादा है और नतीजतन उसे छिपा पाना कम आसान है.

रूसी तेल – जो वैश्विक आपूर्ति के दसवें हिस्से से ज़्यादा है  पर प्रतिबंधों के असममित प्रभाव

नीचे दी गयी तालिका उस असममित (एसिमेट्रिक) प्रभाव को दिखाती है जो रूसी तेल की बिक्री पर प्रतिबंधों से विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ सकता है. एशिया प्रशांत तेल के लिए सबसे भूखा क्षेत्र है. यह तालिका सरलतापूर्वक मान लेती है कि क्षेत्रीय स्तर पर उत्पादित तेल की आंतरिक रूप से खपत की जा सकती है. लेकिन उत्तर अमेरिका के बाहर यह सच नहीं है, क्योंकि हो सकता है कि तेल परिवहन पाइपों का अलाइनमेंट इसमें मदद न करे, यहां तक कि यूरोप में भी. इससे भी ज़्यादा अहम बात, तेलशोधक संयंत्र (रिफाइनरी) कच्चे तेल की एक लक्षित किस्म (हल्के और वाष्पशील से लेकर भारी, गैर-तरल तेल तक चार प्रकार के) के लिए कॉन्फिगर किये गये होते हैं. यह समस्या यहां जितनी दिखायी गयी है उससे कहीं बड़ी है.

Source: BP Statistical review 2020

प्रति व्यक्ति आय के आधार पर, 25 निम्न-आय अर्थव्यवस्थाएं (सूडान और दक्षिण सूडान को छोड़कर) और 55 निम्न मध्यम-आय अर्थव्यवस्थाओं में से दो-तिहाई से ज़्यादा (वर्ल्ड बैंक डाटा 2020 के मुताबिक़), जिनमें भारत भी शामिल है, तेल की शुद्ध आयातक हैं. सभी क्षेत्रों में मिलाकर लगभग 60 अर्थव्यवस्थाएं तेल की शुद्ध निर्यातक हैं, लेकिन ये उत्तर अमेरिका, दक्षिण, व लैटिन अमेरिका, मध्य एशिया और रूस तथा मध्य पूर्व में केंद्रित हैं. जबकि, दूसरी ज़्यादातर अर्थव्यवस्थाएं जो मुख्यत: यूरोप, एशिया प्रशांत (ऑस्ट्रेलिया और मलेशिया को छोड़कर) और अफ्रीका (पश्चिम अफ्रीका के कुछ हिस्सों और उत्तर अफ्रीका के अलावा ) में हैं, तेल की शुद्ध आयातक हैं.

सबसे ग़रीब अर्थव्यस्थाओं में, इसके असर को न्यूनतम करने के लिए राजकोषीय संसाधनों या तेल के स्व-उत्पादन से आनेवाली क्रॉस सब्सिडी के बग़ैर, मुद्रास्फीति में उछाल वास्तविक वृद्धि, आय तथा उपभोग को कम कर देगी, जिसके वैश्विक व्यापार और ग़रीबी के लिए नकारात्मक परिणाम होंगे.

ईंधन की क़ीमतों में वृद्धि इन कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं पर सबसे ज़्यादा चोट करेगी. सबसे ग़रीब अर्थव्यस्थाओं में, इसके असर को न्यूनतम करने के लिए राजकोषीय संसाधनों या तेल के स्व-उत्पादन से आनेवाली क्रॉस सब्सिडी के बग़ैर, मुद्रास्फीति में उछाल वास्तविक वृद्धि, आय तथा उपभोग को कम कर देगी, जिसके वैश्विक व्यापार और ग़रीबी के लिए नकारात्मक परिणाम होंगे. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष 2022 के लिए वैश्विक वृद्धि अनुमानों को घटाकर फरवरी 2022 के 4.2 फ़ीसद के पूर्वानुमान के नीचे ले जाने की तैयारी में है. भारत में, भारतीय रिजर्व बैंक का वित्त वर्ष 2023 के लिए 4.5 फ़ीसद मुद्रास्फीति का अनुमान ऊपर जा सकता है, हालांकि वैश्विक बाज़ारों में जारी अस्थिरता और अनिश्चितता ही मज़बूत वृद्धि के पुनरुद्धार के लिए प्राथमिक बाधक होंगी.

रूस को सेंसर करते समय वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक निर्णायक व्यवधान स्पष्ट तौर पर वांछित परिणाम नहीं था. मेरी समझ से, यह अब तक लाभान्वित हुए तेल उत्पादकों के क्लब पर दबाव डालता है कि वे अपने मुनाफ़े को विकास समर्थन देने, निवेश और खपत के स्तरों को सहारा देने के लिए साझा करें, जिससे वृद्धिशील ‘पेट्रोडॉलरों’ के लाभकारी ढंग से निवेश के अवसर पैदा हो रहे हैं.

एक उपयुक्त विकल्प?

काफ़ी कुछ रूस को चीनी समर्थन की गहराई पर निर्भर करता है. चीन की वैश्विक वर्चस्व की तलाश में रूस एक सुविधाजनक, थोड़े समय का सहयोगी है या फिर एक उपयुक्त भरोसेमंद साझेदार? इस साल के अंत तक, राष्ट्रपति शी, माओत्से तुंग जितने ताक़तवर हो सकते हैं, बस इसके लिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की पंचवर्षीय राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस में पार्टी महासचिव और केंद्रीय सैन्य कमीशन के चेयरमैन पद पर उनके एक और कार्यकाल के लिए मुहर लगनी बाकी है.

लंबा खिंचने वाला संघर्ष राष्ट्रपति पुतिन, यूक्रेन, या ज़्यादातर दुनिया के लिए सर्वोत्तम नतीजे देने वाला नहीं हो सकता. वैश्विक आपूर्ति से कटा हुआ ‘क़िलाबंद रूस’, उदीयमान रूस की आत्म-धारणा के विपरीत है. कार्बन कटौती के इस दौर में जीवाश्म ऊर्जा का आपूर्तिकर्ता होना कोई ज़्यादा गौरव की बात नहीं है. कच्चे तेल की चीन की खपत पहले ही बढ़कर 5.4 फ़ीसद प्रति वर्ष (2009-2019 में महज 1.5 फ़ीसद की वैश्विक वृद्धि के मुक़ाबले ) पर पहुंच गयी है. वह वैश्विक खपत में 16.4 फ़ीसद की भागीदारी रखता है, जो अमेरिका के 19.4 फ़ीसद (2020) के ठीक पीछे है. प्राकृतिक गैस एक बेहतर भविष्य पेश करती है. प्राकृतिक गैस की वैश्विक खपत में चीन की हिस्सेदारी 8.6 फ़ीसद है, जो अमेरिका की 21.8 फ़ीसद (2020) की हिस्सेदारी से अब भी काफ़ी कम है.

अमेरिकी परमाणु कवर और सक्रिय नेटो कवर यूक्रेन के लिए आकर्षक आकांक्षाएं हैं, लेकिन ये आर्थिक और अंतत: सैन्य शक्ति में एशिया की ओर हो रहे स्थानांतरण के विपरीत हैं.

एक आम रूसी, और अब राष्ट्रपति पुतिन भी, मोल-तोल की सीमित गुंजाइश को ज़ाहिर कर चुके हैं. रूस द्वारा रखी गयी चार मांगों में से, एक तटस्थ यूक्रेन की मांग ही सबसे कम आपत्तिजनक है. अमेरिकी परमाणु कवर और सक्रिय नेटो कवर यूक्रेन के लिए आकर्षक आकांक्षाएं हैं, लेकिन ये आर्थिक और अंतत: सैन्य शक्ति में एशिया की ओर हो रहे स्थानांतरण के विपरीत हैं. इसके बजाय, व्यावहारिक और भविष्य के अनुकूल रहते हुए, एक सीमावर्ती राष्ट्र के लिए तटस्थता को अपनाना एक सद्गुण हो सकता है.

अगर यूक्रेन और दूसरे बाल्टिक राष्ट्र अपने दांव की हेजिंग करना (एक जगह से हुए नुक़सान को दूसरी जगह से पूरा करना) चाहते हैं और रूसी सैन्य महत्वाकांक्षाओं के ख़िलाफ़ चीन को एक अन्य गारंटर के रूप में देखते हैं, तो वे बेल्ट एंड रोड के प्रस्तावों पर पुनर्विचार कर सकते हैं, जो 2019 से एस्तोनिया, लातविया तथा लिथुआनिया में धूल फांक रहे हैं. हालांकि, रूस की बाजू चमकाने की रणनीति पर स्वाभाविक यूक्रेनी प्रतिक्रिया को देखते हुए, मदद के लिए मनुहार करना बाल्टिक राष्ट्रीयताओं के अत्यधिक स्वतंत्र मानस से कतई मेल नहीं खाता. इसके अलावा, कन्फ्यूशियसवादी विचारों की जटिलताओं में एक अनिवार्य क्रैश कोर्स दुरूह हो सकता है, हालांकि सहयोग की भावना के तहत चीन के सबसे लोकप्रिय मल्टी-प्लेयर ऑनलाइन वॉर गेम ‘लीग ऑफ लेजेंड्स’ का एक राउंड खेलने का अधिक स्वागत हो सकता है.

ओआरएफ हिन्दी के साथ अब आप FacebookTwitter के माध्यम से भी जुड़ सकते हैं. नए अपडेट के लिए ट्विटर और फेसबुक पर हमें फॉलो करें और हमारे YouTube चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें. हमारी आधिकारिक मेल आईडी [email protected] के माध्यम से आप संपर्क कर सकते हैं.


The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.