हर साल विश्व स्वास्थ्य दिवस एक ही सवाल को नए हालात में पूछता है. लेकिन 2026 में हालात ज्यादा कठिन, बंटे हुए और चुनौतीपूर्ण हैं. युद्धों ने अस्पतालों को भी निशाना बना दिया है. गलत जानकारी ने सार्वजनिक स्वास्थ्य को बहस और विवाद का विषय बना दिया है. जलवायु परिवर्तन बीमारियों के पैटर्न, खाद्य व्यवस्था और रोजमर्रा की जिंदगी के तरीके को बदल रहा है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तेजी से अस्पतालों और निगरानी प्रणालियों में आ रहा है, लेकिन सार्वजनिक संस्थाएं उसे उतनी तेजी से अपनाने में पीछे हैं. ऐसे समय में विश्व स्वास्थ्य संगठन का थीम “Together for health. Stand with science” सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एक परीक्षा जैसा लगता है. अब असली सवाल यह है कि क्या विज्ञान आज भी संस्थाओं के जरिए, सीमाओं के पार और लोगों की जिंदगी तक भरोसे के साथ पहुंच पा रहा है या नहीं.
यह लेख-श्रृंखला “World Health Day 2026: ये जोखिम आपको पता है?” इसी चिंता से शुरू होती है. यह One Health के विचार को सिर्फ एक ट्रेंड या फैशन नहीं मानती, बल्कि इसे एक ऐसे नजरिए के रूप में देखती है जिससे हम समझ सकते हैं कि आज के जोखिम कैसे फैलते हैं. आज खतरे कई रास्तों से चलते हैं—इंसानों और जानवरों की सेहत के बीच, खाने की सप्लाई चेन में, डिजिटल सिस्टम के जरिए, कमजोर सप्लाई नेटवर्क में, लोगों के अविश्वास में और राजनीतिक हिंसा के माहौल में. इस श्रृंखला के लेख यह सवाल उठाते हैं कि जब बीमारी, युद्ध, जलवायु परिवर्तन, शासन (गवर्नेंस) और तकनीक के बीच की सीमाएँ धुंधली हो गई है, तब सेहत की रक्षा करने के लिए हमें क्या करना होगा.
यह श्रृंखला भरोसे के सवाल से शुरू होती है, विज्ञान पर भरोसा, सबूतों पर भरोसा, और उन सार्वजनिक संस्थाओं पर भरोसा जो इन्हें लोगों तक पहुंचाती हैं. इसके बाद यह स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी और ज़मीनी स्थितियों की ओर बढ़ती है, जहां प्रोटीन की राजनीति, खाद्य प्रणाली, जलवायु से निपटने की क्षमता और शहरों की कमजोरियों पर चर्चा होती है. फिर ध्यान सरकार और उसके कामकाज पर जाता है. इसमें यह सवाल उठता है कि क्या भारत की सार्वजनिक संस्थाएं विज्ञान से जुड़े बड़े लक्ष्यों को सही तरीके से लागू कर पा रही हैं—जैसे बेहतर शासन, प्रशिक्षण, नीति-निर्माण और प्रशासनिक सीख के जरिए. इसके बाद कुछ लेख नई तकनीकों पर केंद्रित हैं, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायो सर्विलांस और साइबर-बायो सुरक्षा जैसी चीजें यह बदल रही हैं कि हम जोखिमों को कैसे पहचानते, समझते और संभालते हैं. अंत में, यह श्रृंखला सबसे कठिन क्षेत्र संघर्ष पर खत्म होती है, जहां अस्पतालों और मानवतावादी कार्यकर्ताओं पर हमले यह दिखाते हैं कि देखभाल की व्यवस्था कितनी आसानी से युद्ध का हिस्सा बन सकती है.
इन सभी लेखों को एक सीधी लेकिन चुनौतीपूर्ण बात जोड़ती है. सिर्फ विज्ञान अपने आप स्वास्थ्य की रक्षा नहीं कर सकता. इसके लिए ऐसी संस्थाएं चाहिए जो सीख सकें, आपस में तालमेल बिठा सकें, सही तरीके से संवाद कर सकें और मुश्किल समय में लोगों का भरोसा बनाए रख सकें. इसलिए, विज्ञान के साथ खड़े होने का मतलब उन व्यवस्थाओं के साथ खड़ा होना भी है, जो विज्ञान को उपयोगी, भरोसेमंद और न्यायपूर्ण बनाती हैं. आज के साझा जोखिमों के दौर में, यही शायद हमारे सामने सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती है.