संकलन - विक्रम माथुर
आज भारत के शहर और कस्बे हर साल लगभग 4.2 करोड़ टन कचरा पैदा करते हैं – और 2050 तक यह बढ़कर करीब 43.6 करोड़ टन हो सकता है. इस कचरे का सिर्फ एक छोटा हिस्सा ही ठीक से प्रोसेस किया जाता है. बाकी कचरा कूड़े के ढेर बनकर लैंडफिल साइटों पर जमा हो जाते हैं, जो नदियों को जाम करता है, हमारे पीने के पानी और हवा को प्रदूषित करता है, और लोगों की सेहत के लिए खतरा बन जाता है. अगर समय रहते इसका समाधान नहीं निकाला गया, तो ये समस्या हमारे शहरों को रहने लायक नहीं छोड़ेगी. इसका एक हल है – सर्कुलर इकोनॉमी यानी ऐसा मॉडल जिसमें चीज़ों को बार-बार इस्तेमाल किया जाए और कम से कम कचरा बनाया जाए. इससे कचरा और प्रदूषण कम होगा, जिससे लैंडफिल से निकलने वाली मीथेन गैस घटेगी (जो जलवायु परिवर्तन का कारण बनती है) और प्लास्टिक से नालियाँ नहीं जाम होंगी, जिससे शहरी बाढ़ का खतरा भी कम होगा.
इस वैश्विक प्लास्टिक प्रदूषण संकट से लड़ने के लिए हर शहर और कस्बे में स्थानीय स्तर पर लड़ाई लड़नी होगी – इसमें शहरी प्रशासन की भूमिका बहुत अहम है. 'नेट ज़ीरो' का लक्ष्य तय किया जा चुका है, और शहर इसे तभी हासिल कर सकते हैं जब वे अपने नियमों और ढांचे में सर्कुलर इकोनॉमी यानी परिपथीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को शामिल करें – जैसे प्लास्टिक का कम इस्तेमाल करना और चीज़ों को बार-बार इस्तेमाल करने की आदत डालना. किसी भी तरह के कचरे को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता – चाहे वह मेडिकल कचरा हो, भोजन अपशिष्ट हो, ई-कचरा हो या फिर बैटरियां हों – इन सभी का समाधान सर्कुलर मॉडल के ज़रिये शहरी व्यवस्था में शामिल करना होगा.
एक टिकाऊ सर्कुलर इकोनॉमी (परिपथीय अर्थव्यवस्था) तभी सफल हो सकती है जब इसमें लोगों की भागीदारी और ज़िम्मेदारी हो. इसके लिए ऐसी रणनीति ज़रूरी है जिसमें लोग योजना बनाने की प्रक्रिया में शामिल हों और डिजिटल तकनीक के ज़रिये शासन से जुड़ें. इससे लोगों को खुद समाधान बनाने का मौका मिलेगा, खासकर उन इलाकों में जहां बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं. साथ ही, कचरा प्रबंधन प्रणाली में जाति और लैंगिक असमानताओं और कमजोरियों की स्पष्ट झलक मिलती है – ज़्यादातर अनौपचारिक कचरा बीनने वाले दलित और महिलाएं होती हैं. इन समुदायों को शिक्षा, तकनीक और पहचान देकर सशक्त बनाना न सिर्फ़ प्लास्टिक प्रदूषण को कम करता है, बल्कि सामाजिक समानता को भी बढ़ावा देता है.
हालांकि नीति और तकनीक ज़रूरी हैं, लेकिन सिर्फ इन्हीं से काम नहीं चलेगा. असली और टिकाऊ बदलाव तभी आएगा जब हमारे समाज में 'सर्कुलर सोच' की संस्कृति विकसित होगी – यानी ऐसे सामाजिक नियम और आदतें जो चीज़ों को फिर से इस्तेमाल करने और बेकार न जाने देने को जीवन का हिस्सा मानें. इसके लिए ज़रूरी है कि हम कचरे को अलग-अलग करना, चीज़ों का दोबारा इस्तेमाल करना और सोच-समझकर खर्च करना अपनी आदत बना लें. ऐसी संस्कृति ही समावेशी, मज़बूत और रहने लायक शहरों की नींव बन सकती है.