Published on Nov 13, 2025
अपर्णा रॉय द्वारा संपादित

ब्राज़ील के बेलेम में होने वाला COP30 वैश्विक जलवायु व्यवस्था के लिए एक अहम मोड़ है. यह सम्मेलन उस पेरिस समझौते के दस वर्ष पूरे होने के बाद हो रहा है, जिसने दुनिया की जलवायु शासन प्रणाली को बदल दिया—राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (NDC), पारदर्शिता के नियम और साझा महत्वाकांक्षा इसके केंद्र में थे. पहला ग्लोबल स्टॉकटेक (GST) दिखाता है कि देशों के वादों और वास्तविक प्रगति के बीच बड़ा अंतर है. इसलिए COP30 का लक्ष्य छोटे, धीमे कदमों से आगे बढ़कर मजबूत और समन्वित कार्रवाई करना होना चाहिए. आने वाला दशक तय करेगा कि देश ऐसा विकास मॉडल चुन पाते हैं या नहीं जो केवल कम-कार्बन हो, बल्कि जलवायु के अनुरूप भी—लचीलापन, न्याय और दीर्घकालिक प्रणालीगत बदलाव पर आधारित.

भारत और ग्लोबल साउथ के लिए यह “इम्प्लीमेंटेशन COP” अवसर और परीक्षण, दोनों लेकर आ रहा है. उम्मीदें होंगी कि देश पेरिस समझौते के प्रमुख अनुच्छेदों पर ठोस प्रगति दिखाएँ:

  • अगले दौर के NDCs में अधिक महत्वाकांक्षा (अनुच्छेद 4)
  • मज़बूत अनुकूलन ढांचे और राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाएँ (अनुच्छेद 7)
  • पारदर्शिता और जवाबदेही को सशक्त बनाना (अनुच्छेद 13)
  • विश्वसनीय जलवायु वित्त और तकनीकी सहयोग सुनिश्चित करना (अनुच्छेद 9–10)
  • विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए न्यायसंगत संक्रमण (Just Transition) की स्पष्ट परिभाषा

“COP30 से अपेक्षाएँ” शीर्षक वाली यह श्रृंखला पानी, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, परिवहन, जलवायु वित्त, ऊर्जा परिवर्तन और लैंगिक मुद्दों जैसे आपस में जुड़े विषयों के आधार पर इन वार्ताओं को समझाएगी. यह बताएगी कि COP30 से क्या परिणाम आवश्यक हैं ताकि क्रियान्वयन का अंतर खत्म हो सके और पेरिस समझौते पर वैश्विक भरोसा फिर से स्थापित हो सके.

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