Published on Feb 04, 2026 Commentaries 2 Days ago

चीन की सेना में सब कुछ सामान्य नहीं है. दो शीर्ष जनरलों पर कार्रवाई ने साफ़ कर दिया है कि शी जिनपिंग सत्ता और निष्ठा को सैन्य अनुभव से ऊपर रख रहे हैं. जानें किस तरह यह अंदरूनी उथल-पुथल ताइवान ही नहीं बल्कि भारत-चीन सीमा पर भी चीन के व्यवहार और जोखिम-गणना को प्रभावित कर सकती है.

चीन की सेना में शुद्धिकरण: भारत के लिए मायने?

24 जनवरी को चीन ने घोषणा की कि उसके दो शीर्ष सैन्य अधिकारी-जनरल झांग योउश्या और जनरल ल्यू झेनली-को पार्टी अनुशासन और कानून के उल्लंघन के आरोप में जांच के दायरे में रखा गया है. उन पर चेयरमैन उत्तरदायित्व प्रणाली को गंभीर रूप से कुचलने का आरोप है यानी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सर्वोच्च सत्ता को सीधे चुनौती देना और पार्टी तथा पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की युद्ध क्षमता को नुकसान पहुंचाना. जांच की तेज़ी और सख़्ती यह दिखाती है कि शी जिनपिंग चीन में बची-खुची स्वतंत्र सत्ता को भी खत्म करना चाहते हैं. यह सैन्य शुद्धिकरण अगले वर्ष होने वाले 21वें पार्टी कांग्रेस से पहले पीएलए में संभावित स्वतंत्र शक्ति केंद्रों को रोकने के लिए किया गया है. मुख्य सवाल यह है कि इस शुद्धिकरण का चीन की रक्षा नीति पर क्या असर पड़ेगा और इसका भारत की सुरक्षा, खासकर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर, क्या प्रभाव होगा.

एक कठिन फैसला

गिरे हुए जनरल झांग एक प्रिंसलिंग थे-शी जिनपिंग के बचपन के मित्र और 2012 से उनके शासनकाल के करीबी सहयोगी. झांग और ल्यू को लंबे समय से अनुभवी सैन्य पेशेवर माना जाता था और वे पीएलए की पुरानी पीढ़ी से आते थे, जिन्हें वियतनाम युद्ध का अनुभव था लेकिन वे ताइवान को लेकर पीएलए के तेज़ सैन्य निर्माण पर शी जिनपिंग की तात्कालिकता से पूरी तरह सहमत नहीं हो सके. शी जिनपिंग के अनुसार, जैसा कि पोलित ब्यूरो सदस्य ली होंगझोंग ने कहा, जो निष्ठा पूरी तरह से नहीं है, वह पूर्ण अविश्वास है. इसलिए यह शुद्धिकरण लगभग तय था.

यह सैन्य शुद्धिकरण अगले वर्ष होने वाले 21वें पार्टी कांग्रेस से पहले पीएलए में संभावित स्वतंत्र शक्ति केंद्रों को रोकने के लिए किया गया है. मुख्य सवाल यह है कि इस शुद्धिकरण का चीन की रक्षा नीति पर क्या असर पड़ेगा और इसका भारत की सुरक्षा, खासकर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर, क्या प्रभाव होगा.

फिर भी, इस कदम से कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर छिपी हुई बेचैनी पैदा हुई है. बीजिंग ने तेज़ी से कार्रवाई की-कई तरीकों से, यहाँ तक कि मीडिया के ज़रिये देश-विरोधी गतिविधियों के आरोप फैलाकर-ताकि सेना के भीतर और बाहर असंतोष को रोका जा सके.

रक्षा नीति पर प्रभाव

चीन की शीर्ष राजनीति, खासकर पीएलए में, यह उथल-पुथल कई वर्षों तक जारी रह सकती है. सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) को नई पीढ़ी के नेताओं से भरने में समय लगेगा. भले ही अगले वर्ष पार्टी कांग्रेस में नए नेता चुने जाएँ, उनकी जाँच-पड़ताल लंबी और सख़्त होगी. हालाँकि, पीएलए की वास्तविक युद्ध क्षमता-जो थिएटर कमांड और उनके अधीन इकाइयों के पास है-काफी हद तक सुरक्षित रहेगी. हाल के वर्षों में कई वरिष्ठ अधिकारी गिरे हैं, फिर भी पीएलए में मेजर जनरल से ऊपर के हज़ारों अधिकारी मौजूद हैं. इसलिए शी जिनपिंग के पास कई दौर तक बदलाव करने की गुंजाइश है.

ताइवान और भारत

इन घटनाओं से ताइवान को कुछ राहत मिल सकती है. शी जिनपिंग भले ही जल्दबाज़ी में हों, लेकिन वे व्यावहारिक नेता हैं और ताइवान मोर्चे पर पीएलए की पूरी क्षमता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखते. साथ ही, अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ पीएलए की वास्तविक ताकत का ईमानदार आकलन उन्हें मिलना और कठिन हो जाएगा.

भारत संधियों को बाध्यकारी मानता है जबकि चीन उन्हें विरोधी के व्यवहार को प्रभावित करने और पीएलए की स्वतंत्रता बनाए रखने के साधन के रूप में देखता है. इसी कारण भारत का संयम चीन को जोखिम उठाने का अवसर देता है. इसी तरह, भारत समय को स्थिरता लाने वाला मानता है जबकि चीन समय का उपयोग तैयारी, मजबूती और ज़मीन पर धीरे-धीरे हालात बदलने के लिए करता है.

युवा अधिकारी बुरी ख़बर देने से बच सकते हैं और एक करीबी मित्र के पतन के बाद शी का भरोसा जीतना और भी मुश्किल होगा. शी जिनपिंग को ग्रे-ज़ोन ऑपरेशन्स पर ज़्यादा भरोसा है, क्योंकि इन्हें ज़रूरत के हिसाब से नियंत्रित किया जा सकता है और यह नीति जारी रहेगी. लेकिन सीधा सैन्य हमला एक बड़ा जोखिम होगा जो अब तक की सभी रणनीतिक उपलब्धियों को खतरे में डाल सकता है. इसलिए शी ऐसे किसी कदम के फायदे-नुकसान पर गंभीरता से विचार करेंगे.

भारत के मोर्चे पर भी यही स्थिति है. हाल के महीनों में भारत और चीन के बीच सीमित सुधार हुआ है-आर्थिक संबंध बेहतर हुए हैं और सरकारी व सामाजिक स्तर पर संपर्क बढ़ा है. लेकिन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा कम नहीं हुई है और लगभग 50,000 सैनिक अभी भी एलएसी पर तैनात हैं इसलिए यह सैन्य शुद्धिकरण एलएसी पर पूर्ण शांति नहीं बल्कि एक नियंत्रित और स्थिर यथास्थिति बनाए रखने की संभावना ज़्यादा दिखाता है जबकि पीएलए धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत करता रहेगा.

हथियार के रूप में समय

भारत चीन के साथ तीन बुनियादी रणनीतिक तत्वों को अक्सर गलत समझता है-संधियाँ, समय और अस्पष्टता. भारत संधियों को बाध्यकारी मानता है जबकि चीन उन्हें विरोधी के व्यवहार को प्रभावित करने और पीएलए की स्वतंत्रता बनाए रखने के साधन के रूप में देखता है. इसी कारण भारत का संयम चीन को जोखिम उठाने का अवसर देता है. इसी तरह, भारत समय को स्थिरता लाने वाला मानता है जबकि चीन समय का उपयोग तैयारी, मजबूती और ज़मीन पर धीरे-धीरे हालात बदलने के लिए करता है. भारत को इस सोच को समझते हुए एलएसी नीति को प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि सक्रिय और परिणाम-केंद्रित बनाना होगा. पीएलए के भीतर मौजूदा अस्थिरता भारत के लिए अपनी क्षमता बढ़ाने और आंतरिक मजबूती बनाने का अवसर है.


यह लेख मूल रूप से एनडीटीवी में प्रकाशित हुआ था.

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Authors

Harsh V. Pant

Harsh V. Pant

Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...

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Atul Kumar

Atul Kumar

Atul Kumar is a Fellow in Strategic Studies Programme at ORF. His research focuses on national security issues in Asia, China's expeditionary military capabilities, military ...

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