Author : Rachel Rizzo

Published on Jan 14, 2026 Commentaries 0 Hours ago

हाल ही में अमेरिका ने वेनेज़ुएला में साहसिक सैन्य कार्रवाई कर मादुरो को हिरासत में लिया जिससे ट्रंप के इस कदम पर काफी चर्चा हुई. अब कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या लंबे समय से ट्रंप की नजर में रहे ग्रीनलैंड अगला निशाना बन सकता है.

ग्रीनलैंड: ट्रंप की नई रणनीतिक चुनौती

3 जनवरी की तड़के अमेरिका की विशेष सैन्य टुकड़ियों ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति भवन पर अचानक छापा मारकर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में ले लिया. दोनों को तुरंत न्यूयॉर्क ले जाया गया, जहाँ उन पर अमेरिका के खिलाफ “नार्को-आतंकवाद” चलाने के आरोप लगाए गए. डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की यह अब तक की सबसे साहसिक और विवादास्पद कार्रवाई मानी जा रही है. इस घटनाक्रम ने न केवल लैटिन अमेरिका की राजनीति में हलचल मचाई, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि ट्रंप प्रशासन किन परिस्थितियों में किसी दूसरे देश के खिलाफ सीधे सैन्य बल का प्रयोग कर सकता है.

वेनेज़ुएला में हुई सैन्य कार्रवाई के तुरंत बाद ट्रंप के बयान ने डेनमार्क की चिंता और बढ़ा दी. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को “राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से ग्रीनलैंड चाहिए” और इसे “बेहद रणनीतिक” बताया.

इसी संदर्भ में एक और मुद्दा फिर से सुर्खियों में आ गया है-ग्रीनलैंड. लंबे समय से ट्रंप की नजर इस विशाल आर्कटिक द्वीप पर रही है. ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या वेनेज़ुएला के बाद ग्रीनलैंड अगला निशाना हो सकता है? डेनमार्क सरकार, जिसके अधीन ग्रीनलैंड एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है, फिलहाल गंभीर चिंता में है और इसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रम्प का रुख़

ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर आकर्षण नया नहीं है. वर्ष 2019 में उन्होंने पहली बार खुले तौर पर इस द्वीप को खरीदने की इच्छा जताई थी, लेकिन डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया. ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड पर नियंत्रण आवश्यक है और उन्होंने सैन्य विकल्प को भी पूरी तरह नकारने से इनकार कर दिया. वेनेज़ुएला में हुई सैन्य कार्रवाई के तुरंत बाद ट्रंप के बयान ने डेनमार्क की चिंता और बढ़ा दी. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को “राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से ग्रीनलैंड चाहिए” और इसे “बेहद रणनीतिक” बताया. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीनलैंड पर सीधा सैन्य हमला फिलहाल बेहद असंभव है. वेनेज़ुएला और ग्रीनलैंड की परिस्थितियाँ एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं. वेनेज़ुएला अमेरिका के लिए पश्चिमी गोलार्ध में आता है, जहाँ ट्रंप प्रशासन खुलकर प्रभुत्व स्थापित करने की बात करता रहा है. नवंबर 2025 में जारी अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भी पश्चिमी गोलार्ध पर नियंत्रण को प्राथमिकता दी गई है, जिसे ट्रंप “डोनरो डॉक्ट्रिन” कहते हैं. इसके उलट ग्रीनलैंड यूरोप में स्थित है और डेनमार्क नाटो का सदस्य है. किसी नाटो सहयोगी के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करना अमेरिका के लिए राजनीतिक और रणनीतिक रूप से बेहद जोखिम भरा कदम होगा.

इसी कारण विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल ही में कांग्रेस की एक बंद बैठक में यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि अमेरिका ग्रीनलैंड को खरीदने की बात कर रहा है, उस पर हमला करने की नहीं. “अमेरिका फर्स्ट” की बात करने वाले ट्रंप अगर यूरोप में सैन्य हस्तक्षेप करते हैं, तो वे उन्हीं वाशिंगटन के हस्तक्षेपवादियों की कतार में खड़े हो जाएंगे, जिनकी वे अक्सर आलोचना करते रहे हैं.

सवाल यह नहीं है कि अमेरिका हमला करेगा या नहीं, बल्कि यह है कि वह किस तरह का दबाव बनाएगा. ग्रीनलैंड के पास दुर्लभ और मूल्यवान खनिज संसाधन हैं, जो हरित तकनीक और आधुनिक उद्योगों के लिए बेहद अहम हैं.

कांग्रेस में भी इस मुद्दे पर दुर्लभ द्विदलीय सहमति दिखाई देती है. “बाइपार्टिज़न फ्रेंड्स ऑफ डेनमार्क कॉकस” ने एक बयान जारी कर कहा कि ट्रंप की “तलवार खनकाने” वाली भाषा रूस और चीन जैसे अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों को मजबूत करती है. इस समूह का मानना है कि ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक रुख न केवल यूरोप के साथ रिश्ते बिगाड़ सकता है, बल्कि नाटो की एकता को भी कमजोर कर सकता है.

इसके बावजूद यह साफ है कि ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड को लेकर गंभीर है. सवाल यह नहीं है कि अमेरिका हमला करेगा या नहीं, बल्कि यह है कि वह किस तरह का दबाव बनाएगा. ग्रीनलैंड के पास दुर्लभ और मूल्यवान खनिज संसाधन हैं, जो हरित तकनीक और आधुनिक उद्योगों के लिए बेहद अहम हैं. बर्फ पिघलने के साथ-साथ तांबा, कोबाल्ट, लिथियम और निकल जैसे खनिजों के खनन की संभावनाएं बढ़ रही हैं. इन संसाधनों में चीन की रुचि तेजी से बढ़ी है, और यही बात अमेरिका को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है.

आगे की राह 

इसके अलावा, आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ पिघलने से नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं, जिनसे वैश्विक व्यापार की दिशा बदल सकती है. चीन और रूस पहले ही आर्कटिक शिपिंग रूट्स पर सहयोग की घोषणा कर चुके हैं. अमेरिका नहीं चाहता कि इस रणनीतिक क्षेत्र में उसका प्रभाव कम हो. इसलिए वह ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य और आर्थिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर सकता है-बंदरगाहों, लॉजिस्टिक हब और सुरक्षा ढांचे के ज़रिए.

सैन्य हस्तक्षेप न केवल महँगा और खतरनाक होगा, बल्कि इससे नाटो के भविष्य पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं और घरेलू स्तर पर ट्रंप के राजनीतिक आधार को नुकसान पहुँच सकता है.

ट्रंप की राजनीति का मूल मंत्र हमेशा “डील” और “जीत” रहा है. उन्होंने यही तरीका टैरिफ, व्यापार और रक्षा खर्च के मामलों में अपनाया है. ग्रीनलैंड के साथ भी उनका रास्ता शायद यही होगा-सीधे युद्ध की बजाय आर्थिक दबाव, कूटनीतिक सौदेबाज़ी और सुरक्षा सहयोग के ज़रिए प्रभाव बढ़ाना. सैन्य हस्तक्षेप न केवल महँगा और खतरनाक होगा, बल्कि इससे नाटो के भविष्य पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं और घरेलू स्तर पर ट्रंप के राजनीतिक आधार को नुकसान पहुँच सकता है.

इसलिए फिलहाल सबसे संभावित परिदृश्य यही है कि अमेरिका ग्रीनलैंड पर लगातार आर्थिक और रणनीतिक दबाव बनाए रखे. यह दबाव इतना हो सकता है कि अंततः ट्रंप इसे अपनी “तकनीकी जीत” के रूप में पेश कर सकें-बिना एक भी गोली चलाए, लेकिन अपने हित साधते हुए.


यह लेख मूल रूप से टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित हुआ था.

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