Originally Published RT International Published on Apr 01, 2026 Commentaries 2 Days ago

ईरान संकट के बीच लाल सागर अब एक नया वैकल्पिक रास्ता बनकर उभर रहा है जहां वैश्विक व्यापार और तेल की आवाजाही धीरे-धीरे शिफ्ट होती दिख रही है. हूती टकराव और क्षेत्रीय तनाव इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित नहीं बल्कि जोखिम से भरा बना रहे हैं यानी दुनिया ने रास्ता बदल तो लिया है लेकिन जोखिम अभी भी पीछा नहीं छोड़ रहे- जानिए कैसे.

तेल-ट्रेड का नया हॉटस्पॉट: लाल सागर

ईरान की परमाणु व्यवस्था और क्षेत्रीय ताकत के संतुलन से शुरू हुआ यह संघर्ष अब तेजी से दुनिया के व्यापार और ऊर्जा के रास्तों को बदल रहा है. अफ्रीका पर इसका असर गंभीर हो सकता है क्योंकि यह संकट लाल सागर क्षेत्र में पहले से चल रही प्रतिस्पर्धा को बढ़ा सकता है और साथ ही अफ्रीकी देशों को आर्थिक झटकों और भू-राजनीतिक दबावों का सामना करना पड़ सकता है. तेल की कीमतें बढ़ने, व्यापार में रुकावट और जहाज़रानी की लागत बढ़ने के कारण अफ्रीका को फिर एक ऐसे संकट के प्रभाव झेलने पड़ सकते हैं जो उसके बाहर से पैदा हुआ है.

अमेरिका ने गुरुवार को चेतावनी दी कि हूती संघर्ष बाब-एल-मंदेब जलडमरूमध्य में जहाजों पर गोलीबारी शुरू कर सकते हैं, क्योंकि तेहरान ने चल रहे युद्ध के दौरान वैश्विक शिपिंग पर बाधाएं बढ़ाने की संभावना जताई है. यह अमेरिकी बयान तब आया जब तस्नीम समाचार एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से युद्ध में एक नए ‘फ्रंट’ खुलने की संभावना की चेतावनी दी, जो कि क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती के जवाब में हो सकता है.

हूती नेता अब्दुल-मलिक अल-हूती  ने गुरुवार को कहा कि सैन्य स्थिति के विकास के आधार पर उनका आंदोलन संघर्ष में भाग ले सकता है. एक टीवी संबोधन में उन्होंने जोर दिया कि यह आंदोलन अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ ‘जिहाद’ को अपना धार्मिक कर्तव्य मानता है और विभिन्न तरीकों से ईरान के समर्थन का आह्वान किया.

अफ्रीका पर इसका असर गंभीर हो सकता है क्योंकि यह संकट लाल सागर क्षेत्र में पहले से चल रही प्रतिस्पर्धा को बढ़ा सकता है और साथ ही अफ्रीकी देशों को आर्थिक झटकों और भू-राजनीतिक दबावों का सामना करना पड़ सकता है.

बाब-एल-मंदेब जलडमरूमध्य जो लाल सागर के मुहाने पर स्थित है. सऊदी अरब के पश्चिमी बंदरगाह यनबू से निकलने वाले तेल के परिवहन का एक महत्वपूर्ण मार्ग है. सऊदी अरब अपनी पूर्वी तेल क्षेत्रों से पाइपलाइन के जरिए प्रतिदिन कई मिलियन बैरल कच्चा तेल यहाँ भेज रहा है, ताकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में ईरान की रुकावट को आंशिक रूप से पार किया जा सके. हालांकि यह मार्ग होर्मुज़ से गुजरने वाले विशाल तेल प्रवाह की पूरी तरह भरपाई नहीं कर सकता, लेकिन इसकी रणनीतिक महत्ता काफी बढ़ जाती है, जिससे इस मार्ग पर नियंत्रण के लिए प्रतिस्पर्धा का खतरा भी बढ़ जाता है.

पोर्ट कूटनीति

ईरान संकट से पहले भी लाल सागर क्षेत्र में देशों के बीच भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही थी. पिछले लगभग दस वर्षों में खासकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की आपसी होड़ ने इस इलाके को प्रतिस्पर्धा का अहम केंद्र बना दिया. शुरुआत में रियाद और अबू धाबी ने अफ्रीका का हॉर्न में अपनी नीतियों पर मिलकर काम किया था, लेकिन धीरे-धीरे उनकी सोच अलग हो गई. जहाँ सऊदी अरब ने जिबूती जैसे देशों में आर्थिक सहयोग पर ज़्यादा ध्यान दिया, वहीं यूएई ने सूडान, इथियोपिया और युगांडा में बड़े निवेश करके अपनी मौजूदगी मजबूत कर ली.

यूएई की रणनीति का एक प्रमुख साधन दुबई स्थित लॉजिस्टिक्स कंपनी डीपी वर्ल्ड के नेतृत्व में चलने वाली ‘पोर्ट कूटनीति’ रही है. हालांकि हाल के वर्षों में इस रणनीति को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. उदाहरण के लिए, 2018 से जिबूती और डीपी वर्ल्ड के बीच डोरालेह कंटेनर टर्मिनल की रियायत समाप्त होने को लेकर विवाद चल रहा है. हाल ही में लंदन की एक मध्यस्थता अदालत ने जिबूती के पक्ष में फैसला दिया और डीपी वर्ल्ड के मुआवजे के दावों को खारिज कर दिया.

लाल सागर का महत्व इसके तटों पर मौजूद सैन्य ठिकानों की घनी मौजूदगी से भी बढ़ जाता है. चार अफ्रीकी देश-मिस्र, इरिट्रिया, जिबूती और सूडान-लाल सागर से लगे हैं, और उनके बंदरगाह बाहरी सैन्य उपस्थिति के केंद्र बन गए हैं. जिबूती में ही अमेरिका, फ्रांस, जापान और चीन के कई विदेशी नौसैनिक अड्डे मौजूद हैं. चीन ने 2017 में जिबूती में अपना पहला विदेशी नौसैनिक अड्डा स्थापित किया, जो लाल सागर के प्रवेश द्वार पर इस देश की रणनीतिक भूमिका को दर्शाता है.

शुरुआत में रियाद और अबू धाबी ने अफ्रीका का हॉर्न में अपनी नीतियों पर मिलकर काम किया था, लेकिन धीरे-धीरे उनकी सोच अलग हो गई. जहाँ सऊदी अरब ने जिबूती जैसे देशों में आर्थिक सहयोग पर ज़्यादा ध्यान दिया, वहीं यूएई ने सूडान, इथियोपिया और युगांडा में बड़े निवेश करके अपनी मौजूदगी मजबूत कर ली.

दिसंबर 2025 में जब इज़राइल ने वास्तविक रूप से स्वतंत्र देश माने जाने वाले सोमालीलैंड को मान्यता देने का निर्णय लिया, तब कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दे भी प्रमुख रहे. हालांकि इस मान्यता के नैतिक और कानूनी पहलुओं पर बहस जारी है, लेकिन ऐसा माना जाता है कि इज़राइल की रुचि समुद्री सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है, क्योंकि वह इस मार्ग से अपने बंदरगाहों तक आने-जाने वाले जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना चाहता है.

बर्बेरा के पास संभावित इज़राइली सैन्य अड्डे की योजनाओं की खबरें भी इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व को दर्शाती हैं. ऐसा कदम हॉर्न ऑफ अफ्रीका की पहले से जटिल राजनीति में तनाव को और बढ़ा सकता है और सोमालिलैंड की स्वतंत्रता के समर्थकों तथा सोमालिया की क्षेत्रीय एकता के पक्षधर समूहों के बीच विभाजन को गहरा कर सकता है.

इस बीच, गैर-राज्य अभिनेताओं की भूमिका इस संकट में अनिश्चितता की एक और परत जोड़ती है. यमन का हौथी आंदोलन दशकों से तेहरान से वित्तीय और सैन्य समर्थन प्राप्त करता रहा है. हालिया सैन्य झटकों के बावजूद, इस समूह के पास ड्रोन, बारूदी सुरंगें, तोपखाना और जहाज-रोधी मिसाइलें हैं, जो बाब-एल-मंदेब से गुजरने वाले जहाजों को बाधित कर सकती हैं.

इसके अलावा, हौथियों और सोमाली उग्रवादी समूह अल-शबाब के बीच संभावित सहयोग को लेकर भी चिंताएँ हैं. 2024 से दोनों संगठनों के बीच हथियारों की तस्करी, तकनीकी प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक समर्थन जैसे क्षेत्रों में सहयोग की खबरें सामने आई हैं. यद्यपि हौथियों का अल-शबाब पर सीधा नियंत्रण नहीं है, लेकिन सोमाली समूह ने पहले संकेत दिया है कि वह हौथी समर्थन के बदले अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती की गतिविधियां बढ़ाने के लिए तैयार हो सकता है. ऐसा सहयोग लाल सागर क्षेत्र में वाणिज्यिक शिपिंग के लिए जोखिम को काफी बढ़ा सकता है. अब तक ईरान संकट शुरू होने के बाद हौथियों ने बड़े हमले शुरू नहीं किए हैं, हालांकि उन्होंने चेतावनी दी है कि उनके ‘हाथ ट्रिगर पर हैं.’ दुश्मनी फिर से शुरू होने की संभावना बनी हुई है. यहां तक कि सीमित हमले भी बीमा प्रीमियम और शिपिंग लागत को काफी बढ़ा सकते हैं, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ और अस्थिर हो सकती हैं.

नाज़ुक सुरक्षा स्थिति

आने वाले महीनों में दो संभावित परिदृश्य सामने आ सकते हैं. पहले परिदृश्य में ईरान संकट की तीव्रता बढ़ने से खाड़ी और लाल सागर क्षेत्र में राज्यों और गैर-राज्य अभिनेताओं के बीच व्यापक टकराव शुरू हो सकता है. इससे समुद्री यातायात और वैश्विक तेल प्रवाह गंभीर रूप से प्रभावित होंगे. यदि होर्मुज़ सामान्य रूप से काम नहीं करता, तो अदन की खाड़ी और लाल सागर ऊर्जा निर्यात के लिए एकमात्र व्यवहार्य मार्ग बन जाएंगे, जिससे पहले से ही नाजुक सुरक्षा वातावरण पर भारी दबाव पड़ेगा.

होर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता और खाड़ी के समुद्री रास्तों पर खतरे के कारण यह संघर्ष लाल सागर को एक साधारण क्षेत्र से उठाकर वैश्विक व्यापार और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण केंद्र बना चुका है.

दूसरी स्थिति में कुछ समय के लिए तनाव कम हो सकता है, जहाँ क्षेत्रीय और बड़ी वैश्विक शक्तियां आपसी राजनीतिक मतभेदों के बावजूद समुद्री व्यापार को सुरक्षित रखने पर ध्यान देंगी. ऐसे में लाल सागर, बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य से होते हुए स्वेज नहर तक जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए सहयोग का क्षेत्र बन सकता है.

लेकिन चाहे जो भी स्थिति बने, यह संभावना कम है कि लाल सागर क्षेत्र जल्दी शांत होगा. इसके बजाय अलग-अलग हितों के कारण यह इलाका दो या उससे ज़्यादा विरोधी समूहों में बँट सकता है. Iran संकट ने एक नया भू-राजनीतिक असर पैदा किया है, समुद्री रणनीति का केंद्र अब पश्चिम की ओर खिसक रहा है. होर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता और खाड़ी के समुद्री रास्तों पर खतरे के कारण यह संघर्ष लाल सागर को एक साधारण क्षेत्र से उठाकर वैश्विक व्यापार और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण केंद्र बना चुका है.

इसलिए असली प्रश्न यह नहीं है कि ईरान संकट लाल सागर क्षेत्र को बदलेगा या नहीं-इसके प्रभाव पहले से दिखाई दे रहे हैं, बल्कि यह है कि यह परिवर्तन कितना तीव्र और कितने समय तक चलने वाला होगा.


यह लेख मूल रूप से आरटी इंटरनेशनल में प्रकाशित हुआ था. 

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