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पिछले दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जो बजट पेश किया, उसमें रक्षा बजट की भी घोषणा की. इस बार रक्षा बजट में बहुत ज्यादा तो नहीं, लेकिन ठीक-ठाक वृद्धि की गई है. कई लोगों का मानना है कि भारत को रक्षा पर और ज्यादा खर्च करना चाहिए. बजट में सरकार का फोकस इस बात पर रहा कि देश की आर्थिक व्यवस्था को और सुदृढ़ किया जाए. अगर भारत का GDP बढ़ेगा, तभी रक्षा खर्च भी बढ़ पाएगा. इसलिए सरकार का ध्यान अभी ग्रोथ तेज करने पर है.
रक्षा क्षेत्र में भारत पिछले कई सालों से बहुत सारे सुधार कर रहा है. चाहे वह हथियारों की खरीद हो, कोई बदलाव या फिर मानव संसाधन की बात हो. अभी देश के रक्षा बजट का ज्यादातर हिस्सा पेंशन और सैलरी में जा रहा है. हाल यह है कि रेवेन्यू एक्सपेंडिचर बहुत ज्यादा है. यहां पर एक बात यह है कि भारत को कैपिटल एक्सपेंडिचर (असेट्स तैयार करना) की तरफ बढ़ना चाहिए, क्योंकि जो बड़े-बड़े हथियार और प्लैटफॉर्म खरीदने हैं, वे तभी मिल पाएंगे जब रक्षा बजट का और प्रभावशाली तरीके से उपयोग किया जाए. इसे देखते हुए ही भारत ने इस पर फोकस करने की कोशिश की है कि आर्थिक नीतियां बदलें और सुधारों से भारत की अर्थव्यवस्था गति पकड़े.
दुनिया का हाल देखें तो इस समय लगभग सभी देशों का रक्षा बजट बढ़ रहा है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि दुनिया में असुरक्षा का माहौल है.
बाकी दुनिया का हाल देखें तो इस समय लगभग सभी देशों का रक्षा बजट बढ़ रहा है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि दुनिया में असुरक्षा का माहौल है. कई कारण ऐसे हैं जो माहौल को और तनावग्रस्त बना रहे हैं. कई युद्ध चल रहे हैं. रूस-यूक्रेन का युद्ध हो या गाजा में इजरायल का युद्ध, दोनों ही बड़ी परेशानियां हैं. मिडल ईस्ट में हालांकि सीजफायर हो चुका है, फिर भी वहां पर माहौल काफी तनावग्रस्त बना हुआ है. रूस-यूक्रेन युद्ध की जहां तक बात है तो उसे रोकने पर बात अभी बयानबाजी से आगे नहीं बढ़ी है. यही नहीं, अमेरिका और चीन के बीच जो परेशानियां हैं, जो प्रतिद्वंद्विता है, वह और गति पकड़ रही है.
इसलिए बड़ी ताकतें रक्षा बजट बढ़ा रही हैं. अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही बड़े-बड़े प्रॉजेक्ट्स का ऐलान किया है. उनमें से एक आयरन डोम है. ट्रंप एक मिसाइल डिफेंस शील्ड के बारे में भी बात कर रहे हैं. चीन भी इसे देखते हुए पिछले कुछ सालों से लगातार डिफेंस बजट बढ़ा रहा है. चीन के साथ समस्या और भी है कि उसमें ट्रांसपेरेंसी नहीं है. चीन जितने की घोषणा करता है, उससे कई गुना ज्यादा खर्च करता है. इसके चलते चीन के खिलाफ दुनिया भर में एक संदेह भी बना हुआ है.
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय देशों पर यह दबाव है कि वे भी अपना डिफेंस बजट बढ़ाएं. नैटो के सदस्य देश भी अपना रक्षा बजट बढ़ा रहे हैं. रूस के पड़ोसी देश भी थोड़े से डरे हुए हैं. जबसे यूक्रेन पर रूस ने आक्रमण किया है, उसके बाद से उन देशों का भी रक्षा बजट बढ़ रहा है. दूसरी तरफ चीन ने हिंद-प्रशांत के इलाके में जिस तरह का माहौल बनाया है, वह भी इस क्षेत्र में मौजूद देशों के लिए सिरदर्द बना हुआ है. इसके चलते जापान अपनी डिफेंस पॉलिसी बड़ी तेजी से बदल रहा है. साउथ कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और कई साउथ-ईस्ट एशिया के देश भी अपना रक्षा बजट बढ़ा रहे हैं.
चीन ने हिंद-प्रशांत के इलाके में जिस तरह का माहौल बनाया है, वह भी इस क्षेत्र में मौजूद देशों के लिए सिरदर्द बना हुआ है. इसके चलते जापान अपनी डिफेंस पॉलिसी बड़ी तेजी से बदल रहा है
इस समय जिस तरह का माहौल है और जिस तरह की अव्यवस्था बनी हुई है, हमारे मल्टिलैटरल इंस्टिट्यूशंस भी काम नहीं कर रहे हैं- इनको देखते हुए दुनिया भर के देशों का रक्षा बजट बढ़ रहा है. रक्षा बजट बढ़ाने का एक प्रभाव यह भी हो रहा है कि विभिन्न देशों के बीच तनाव और अधिक बढ़ रहा है. दिक्कत यह है कि इन तमाम देशों के पास ऐसा कोई तरीका उपलब्ध नहीं है कि वे सब साथ मिलकर ग्लोबल गवर्नेंस के मुद्दों पर अपना ध्यान लगा सकें. इसके चलते ग्लोबल गवर्नेंस को दरकिनार करके इस समय हर देश सिर्फ अपने बारे में सोच रहा है.
आर्थिक तौर पर भी अगर आप देखें तो संरक्षणवाद बढ़ रहा है. यह आर्थिक असुरक्षा का रूप ले रहा है, क्योंकि लोग परेशान हैं, वे असुरक्षा का अनुभव कर रहे हैं. दुनिया भर में अगर रक्षा बजट बढ़ रहा है तो मुझे लगता है कि यही सारे मुद्दे मिलकर डिफेंस बजट के ऊपर असर डाल रहे हैं. इसके चलते डिफेंस बजट दुनिया भर में बढ़ रहा है और आगे भी यही लग रहा है कि यह बढ़ता रहेगा.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President - ORF and Studies at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with ...
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