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दस साल पहले दुनिया ने तय किया था कि 2030 तक गरीबी खत्म करनी है, धरती को बचाना है और सबको बेहतर ज़िंदगी देनी है लेकिन अब हालात बदल गए हैं — युद्ध, आर्थिक मुश्किलें और जलवायु संकट ने सब कुछ पीछे धकेल दिया है. अब बड़ा सवाल ये है कि क्या दुनिया अपने इन वादों को पूरा कर पाएगी?
हर साल संयुक्त राष्ट्र महासभा का आयोजन किया जाता है और पिछले एक दशक के दौरान महत्वाकांक्षी और बेहद मुश्किल समझे जाने वाले सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करने के मामले में इसने दुनिया भर के देशों को एकजुट करने का कठिन काम किया है. हालांकि, एक महीने पहले न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान जब पूरे विश्व के नेता जुटे, तो वहां माहौल सहज नहीं था बल्कि चिंता और आशंकाओं से भरा हुआ था.
पूरी दुनिया ने वर्ष 2015 में सतत विकास लक्ष्यों को अपनाया था और 193 देशों ने सर्वसम्मति से इन लक्ष्यों को 2030 के सतत विकास एजेंडे के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना था. अब इसके 10 साल बीत चुके हैं और देखा जाए तो साल 2025 में दुनिया में जो स्थिति है, वो 2015 से काफ़ी अलग हो चुकी है. उस दौर की बात करें,तो उस समय पूरे विश्व में अमेरिका का दबदबा था और वही वैश्विक शासन की दशा और दिशा को निर्धारित करता था. उसके बाद के वर्षों में वैश्विक विकास को काफ़ी झटका लगा है, ख़ास तौर पर महामारी संकट, बढ़ते वैश्विक संघर्षों, आर्थिक अस्थिरता और जलवायु संकट जैसी घटनाओं ने कहीं न कहीं दुनिया की प्रगति को प्रभावित करने का काम किया है. वैश्विक अस्थिरता का यह सिलसिला इस साल भी जारी है और हालिया घटनाओं को देखा जाए तो साफ हो जाता है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भू-राजनीतिक तनावों ने विकास के एजेंडे में और ज़्यादा रुकावटें डाली हैं.
2030 तक गरीबी मिटाने और धरती को बचाने का सपना - लेकिन युद्ध, अर्थसंकट और जलवायु संकट ने सब कुछ पीछे धकेल दिया है.
SDGs की प्रगति से जुड़ी इस साल की रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ़ 18% सतत विकास लक्ष्य ही सही रास्ते पर चल रहे हैं, जबकि क़रीब आधे SDGs की प्रगति बेहद धीमी है
सबसे अहम बात यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है और इन्हें ‘अमेरिकी लोगों के अधिकारों व हितों के ख़िलाफ़’ बता दिया है. इतना ही नहीं, अमेरिका ने लैंगिक समानता और जलवायु परिवर्तन से संबंधित नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं और इनमें व्यापक बदलाव की मांग की है. देखा जाए तो, एसडीजी के लिहाज़ से यह एक ऐसा झटका है, जो न केवल असंगत है, बल्कि अमेरिका से ऐसे रवैये की उम्मीद कतई नहीं थी.
अमेरिका यहीं नहीं रुका, बल्कि इसी साल जनवरी में ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (USAID) को भी बंद कर दिया. ज़ाहिर है कि USAID अब तक के इतिहास में दुनिया भर में विकास सहायता देने वाली सबसे अहम और सबसे बड़ी एजेंसियों में से एक थी. इतना ही नहीं, अमेरिका संयुक्त राष्ट्र का भी सबसे बड़ा आर्थिक मददगार है और अपने ताज़ा रुख़ के तहत वह संयुक्त राष्ट्र को दी जाने वाली सहायता से भी हाथ खींचने में जुटा हुआ है. बजट में ज़बरदस्त कटौती की वजह से संयुक्त राष्ट्र की तमाम एजेंसियों और कार्यक्रमों, जैसे कि विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनेस्को यानी संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन, संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और वर्ल्ड फूड प्रोग्राम को ज़बरदस्त झटका लगा है. फंड की कमी की वजह से इन एजेंसियों को अपनी योजनाएं चलाने में ख़ासी दिक़्क़त हो रही है.
यूरोप भी इस मामले में अमेरिका के नक्शे क़दम पर चल रहा है. जर्मनी, फ्रांस और बेल्जियम जैसे बड़े दानदाता देशों ने अपने रक्षा ख़र्च को पूरा करने के लिए विकास सहायता के बजट में कटौती की है. यूनाइटेड किंगडम ने भी देखा जाए तो इसी रास्ते को अपनाया है.
संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2000 में टिकाऊ विकास के लिए मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (MDGs) यानी सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों को प्रस्तुत किया गया था, जिन्हें मुख्य रूप से आठ विकास लक्ष्यों को पाने के लिए वैश्विक स्तर पर अपनाया गया था. इसके बाद 2015 में संयुक्त राष्ट्र ने इनकी जगह पर 17 सतत विकास लक्ष्य पेश किए, जिन्हें हासिल करने के लिए दुनिया भर के देश अपने-अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं.
विकासशील देशों को इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ज़रूरी धनराशि और उपलब्ध वित्तपोषण का अंतर इस साल 4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है.
ज़ाहिर है कि MDGs के बारे में माना जाता था कि मुख्य रूप से इनका फोकस विकासशील देशों में ग़रीबी उन्मूलन और इससे जुड़े कार्यक्रमों को लागू करने पर ही था. जहां तक सतत विकास लक्ष्यों की बात है, तो MDGs की तुलना में ये बेहद व्यापक हैं और संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों पर समान रूप से लागू होते हैं. SDGs में 169 पारस्परिक तौर पर जुड़े लक्ष्य शामिल हैं. इनमें ग़रीबी उन्मूलन से लेकर स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार, असमानता कम करने और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने के साथ-साथ आर्थिक विकास को बढ़ावा देने जैसी कई रणनीतियां शामिल हैं. MDGs और SDGs देखा जाए तो मिलकर एक ऐसे नज़रिए को सामने लाते हैं, जिसमें "लक्ष्यों को हासिल करने के ज़रिए गवर्नेंस" को प्रमुखता दी गई है. यानी एक ऐसा दृष्टिकोण जो कहीं न कहीं गैर-बाध्यकारी प्रतिबद्धताओं पर आधारित है, साथ ही देशों को टिकाऊ विकास के लिए अपने स्वयं के तौर-तरीक़े स्थापित करने की छूट प्रदान करता है.
एक और अहम बात है कि सतत विकास लक्ष्यों का दायरा बहुत व्यापक है और ये बहुत महत्वाकांक्षी भी हैं, इसीलिए इन्हें हासिल करना बेहद जटिल हो गया है. इन्हीं वजहों से कहीं न कहीं सतत विकास लक्ष्यों को आलोचनाएं भी झेलनी पड़ी हैं. कई लोगों का कहना है कि SDGs का दायरा इतना व्यापक नहीं होना चाहिए और इनके भीतर प्राथमिकताओं को स्पष्टता के साथ निर्धारित किया जाना चाहिए. SDGs को हासिल करने की जो समय सीमा निर्धारित की गई है, उसमें अब केवल पांच साल का ही समय बचा है. SDGs की प्रगति से जुड़ी इस साल की रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ़ 18% सतत विकास लक्ष्य ही सही रास्ते पर चल रहे हैं, जबकि क़रीब आधे SDGs की प्रगति बेहद धीमी है, वहीं पांच SDGs तो ऐसे हैं, जो 2015 के लक्ष्य से भी पीछे चल रहे हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर ग़रीबी उन्मूलन के मामले में बेहद मामूली प्रगति दर्ज़ की गई है और यह 2015 की तुलना में केवल 1.5 प्रतिशत अंक कम है, साथ ही इसके वर्ष 2030 तक स्थिर रहने का अनुमान है. हालांकि, पिछले दशक में कई क्षेत्रों में ख़ासी प्रगति भी दर्ज़ की गई है, जैसे कि पांच साल से कम आयु के बच्चों और मातृ मृत्यु दर में काफ़ी कमी देखी गई है, एचआईवी/एड्स और मलेरिया से होने वाली मृत्यु दर में भी कमी दर्ज़ की गई है. इसके अलावा, लैंगिक समानता के लिहाज़ से कई देशों की संसदों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, साथ ही सामाजिक सुरक्षा के मामले में व्यापक बढ़ोतरी देखने को मिली है और साफ पानी की उपलब्धता, स्वच्छता एवं बुनियादी सफाई से जुड़ी सेवाओं में भी ख़ासा सुधार हुआ है.
सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में प्रगति और इसमें सामने आने वाली चुनौतियों पर चर्चाओं को अगर नज़रंदाज़ कर दिया जाए, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि दुनिया से ग़रीबी को मिटाने और धरती की रक्षा व सभी के लिए समृद्धि और ख़ुशहाली सुनिश्चित करने के लिए पूरी दुनिया को एकजुट होकर क़दम आगे बढ़ाने होंगे. साथ ही, इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि ख़ास तौर पर विकासशील देशों के लिए, जो कि कई मूलभूत सुविधाओं और समस्याओं से जूझ रहे हैं, सतत विकास लक्ष्य जैसा एक ढांचा बेहद ज़रूरी है.
ज़ाहिर है कि बढ़ते जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों, लगातार गहरी होती जा रही राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता एवं वैश्विक व्यापार में मची उथल-पुथल का सबसे अधिक सामना विकासशील देश ही कर रहे हैं. इसके साथ ही, विकासशील देश सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पैसों की कमी से भी जूझ रहे हैं. विकासशील देशों को इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ज़रूरी धनराशि और उपलब्ध वित्तपोषण का अंतर इस साल 4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है. इसके अलावा, विकासशील देश वर्ष 2020 से कर्ज़ पर अत्यधिक ब्याज़ की समस्या का भी सामना कर रहे हैं और इसने उन्हें कर्ज़ के दलदल में फंसा दिया है. साल 2024 में वैश्विक सार्वजनिक ऋण रिकॉर्ड 102 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के आंकड़े तक पहुंच गया है. इसने विकासशील देशों को टिकाऊ विकास से जुड़े कार्यक्रमों और परियोजनाओं में निवेश से दूर रहने के लिए मज़बूर किया है. इस कारण सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करना और भी ज़्यादा कठिन हो गया है.
विकासशील देश साझा अनुभवों और चुनौतियों के आधार पर अपने जैसे दूसरे देशों के साथ गठजोड़ बनाकर, वित्तपोषण के नए-नए तरीक़ों को अपनाकर और स्थानीय स्तर पर समाधान के विकल्पों को खोजने के साथ ही क्षेत्रीय सहयोग स्थापित करने पर फोकस कर सकते हैं
इन परिस्थितियों में SDGs को पाने के लिए कई क़दम उठाए जा सकते हैं और विकासशील देशों की मदद की जा सकती है. उदाहरण के तौर पर ऐसे देशों की जो क्षमता है और जो संसाधन हैं, उनके मुताबिक़ सतत विकास लक्ष्यों को फिर से निर्धारित किया जा सकता है. इसके अलावा, SDGs की प्रगति के लिए इन देशों को वित्तपोषण और साझेदारी में सहायता की जा सकती है. इतना ही नहीं, इन देशों की ज़रूरतों और वहां के ज़मीनी हालातों के मुताबिक़ इन लक्ष्यों में बदलाव भी किया जा सकता है और जिस देश में जिस विशेष लक्ष्य को हासिल करना ज़्यादा ज़रूरी है, उसी को प्राप्त करने पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित करने की रणनीति अपनाई जा सकती है.
विकास को हासिल करने की राह में जो मौज़ूदा बाधाएं हैं और जो संकट के हालात हैं, उनमें विकासशील देशों के लिए कहीं न कहीं काफ़ी संभावनाएं भी छिपी हैं. ज़ाहिर है कि विकासशील देशों की ओर से लंबे अरसे से सतत विकास लक्ष्यों में कई स्तरों पर सुधारों की मांग की जाती रही है. ऐसे में इन देशों के पास वैश्विक टिकाऊ गवर्नेंस की स्थापना और उसके तौर-तरीक़ों को सुनिश्चित करने में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका निभाने का बेहतरीन अवसर है. कहने का मतलब है कि विकासशील देश साझा अनुभवों और चुनौतियों के आधार पर अपने जैसे दूसरे देशों के साथ गठजोड़ बनाकर, वित्तपोषण के नए-नए तरीक़ों को अपनाकर और स्थानीय स्तर पर समाधान के विकल्पों को खोजने के साथ ही क्षेत्रीय सहयोग स्थापित करने पर फोकस कर सकते हैं और ऐसा करके अपने दम पर सतत विकास लक्ष्यों के एजेंडे को मज़बूती से आगे बढ़ा सकते हैं.
यह लेख मूल रूप से लोवी इंस्टीट्यूट (Lowy Institute) में प्रकाशित हो चुका है.
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Sunaina Kumar is Director - CNED and Senior Fellow at the Observer Research Foundation. She previously served as Executive Director at Think20 India Secretariat under ...
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