Author : Harsh V. Pant

Published on Mar 11, 2026 Commentaries 1 Days ago

फरवरी 2026 में सीमा पर हुए हमलों के बाद पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव फिर खुलकर सामने आ गया है. जानें इस टकराव की असली वजह क्या है और क्यों ड्यूरंड रेखा व टीटीपी का मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों को लगातार अस्थिर बनाए हुए है.

काबुल बनाम इस्लामाबाद: आखिर क्यों बढ़ा तनाव?

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से सुलग रहा तनाव अब विवादित ड्यूरंड रेखा के किनारे खुली टकराव की स्थिति में बदल गया है. जो क्षेत्र पहले प्रॉक्सी गतिविधियों का मंच हुआ करता था, वह अब कम से कम फिलहाल सीधे राज्य-से-राज्य शत्रुता का रूप लेता दिखाई दे रहा है.

21 फरवरी को पाकिस्तान ने नंगरहार, पक्तिका और खोस्त में कथित आतंकी ठिकानों पर हवाई हमले किए. पाकिस्तान का दावा था कि ये हमले तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और आईएसआईएस-के के ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए. इसके जवाब में 26 फरवरी को काबुल ने छह प्रांतों में पाकिस्तानी ठिकानों के खिलाफ जमीनी कार्रवाई की. इसके बाद इस्लामाबाद ने स्थिति को और बढ़ाते हुए ‘ऑपरेशन ग़ज़ब लिल हक़’ शुरू किया और काबुल तथा कंधार में लक्ष्यों पर हमला किया. पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान का सब्र का प्याला अब भर चुका है.

काबुल का कहना है कि 55 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए और उसके 13 लड़ाके मारे गए. हालांकि इन आंकड़ों से परे एक महत्वपूर्ण सच्चाई यह है कि यह पहले से ही अस्थिर सीमा क्षेत्र अब और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश कर चुका है.

हानी के आंकड़े अभी भी विवादित और अपुष्ट हैं. पाकिस्तान का दावा है कि 274 तालिबान लड़ाके मारे गए और उसके 12 सैनिकों की मौत हुई. वहीं काबुल का कहना है कि 55 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए और उसके 13 लड़ाके मारे गए. हालांकि इन आंकड़ों से परे एक महत्वपूर्ण सच्चाई यह है कि यह पहले से ही अस्थिर सीमा क्षेत्र अब और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश कर चुका है.

डुरंड रेखा का विवाद

इस संकट को केवल हालिया हिंसा तक सीमित नहीं किया जा सकता. इसकी जड़ें डुरंड रेखा के विवाद में हैं,1893 में खींची गई लगभग 2,600 किलोमीटर लंबी सीमा, जिसे अफगानिस्तान की किसी भी सरकार ने औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया. यह रेखा पश्तून जनजातीय क्षेत्रों को दो हिस्सों में बांटती है और आधुनिक राज्य व्यवस्था के भूगोल में एक ऐतिहासिक असंतोष को स्थायी रूप से दर्ज करती है.

2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद पाकिस्तान को उम्मीद थी कि उसे रणनीतिक लाभ मिलेगा. उसे विश्वास था कि काबुल टीटीपी पर नियंत्रण करेगा, क्योंकि टीटीपी और अफगान तालिबान के बीच वैचारिक समानताएँ अच्छी तरह दर्ज हैं. लेकिन इसके विपरीत, टीटीपी के हमले बढ़ गए. रिपोर्टों के अनुसार केवल 2025 में ही 2,400 से अधिक पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई-जो एक दशक में सबसे अधिक है.

यह आरोप उस समय और तेज हो गया जब अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने पिछले वर्ष नई दिल्ली का दौरा किया और दोनों पक्षों ने क्षेत्रीय आतंकवाद की निंदा करते हुए संयुक्त बयान जारी किया.

तालिबान की टीटीपी के खिलाफ कार्रवाई से हिचकिचाहट के पीछे दो कारण हैं. पश्तून समुदाय की साझा पहचान और यह व्यावहारिक डर कि यदि वे टीटीपी के खिलाफ कठोर कदम उठाते हैं तो आंतरिक विभाजन पैदा हो सकता है, जिससे कुछ लड़ाके आईएसआईएस-के में शामिल हो सकते हैं.

तात्कालिक कारण और भू-राजनीति

हाल में इस्लामाबाद, बाजौर और बन्नू में हुए हमलों-जिन्हें पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में मौजूद आतंकियों से जोड़ा-ने इस टकराव को भड़काने का काम किया. अक्टूबर 2025 में क्षेत्रीय मध्यस्थों की मदद से हुई संघर्षविराम कोशिशें लगातार झड़पों के कारण विफल हो गईं.

इन तनावों के ऊपर एक और परत भू-राजनीतिक बदलाव की है. पाकिस्तान ने आरोप लगाया है कि काबुल ‘भारत की कॉलोनी’ बनता जा रहा है. यह आरोप उस समय और तेज हो गया जब अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने पिछले वर्ष नई दिल्ली का दौरा किया और दोनों पक्षों ने क्षेत्रीय आतंकवाद की निंदा करते हुए संयुक्त बयान जारी किया. पाकिस्तान के लिए यह केवल प्रतीकात्मक कूटनीति नहीं बल्कि संभावित रणनीतिक घेराबंदी का संकेत है. 

इस युद्ध में किसी की जीत नहीं

इस टकराव का तत्काल प्रभाव आर्थिक और मानवीय दोनों स्तरों पर दिखाई देगा. अफगानिस्तान अपने ट्रांजिट व्यापार के लिए काफी हद तक पाकिस्तानी बंदरगाहों पर निर्भर है, जबकि पाकिस्तान को अपने पश्चिमी मार्ग से राजस्व और रणनीतिक लाभ मिलता है. सीमा बंद होने से खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है.

नागरिकों की मौत, विस्थापन और संभावित शरणार्थी प्रवाह पहले से ही संकटग्रस्त अफगान अर्थव्यवस्था को और कमजोर कर सकते हैं. लंबी अस्थिरता बलूच अलगाववादियों को प्रोत्साहित कर सकती है, आईएसआईएस-के को मजबूत कर सकती है और उग्रवादी नेटवर्क को और अधिक बिखेर सकती है.

महत्वपूर्ण संपर्क परियोजनाएँ-जैसे TAPI गैस पाइपलाइन और यूरेशियाई परिवहन नेटवर्क-भी अनिश्चितता में पड़ सकती हैं. सीपेक (CPEC) के तहत पाकिस्तान में चीन के निवेश को भी सुरक्षा जोखिम बढ़ने का खतरा है. मानवीय स्थिति भी गंभीर है. नागरिकों की मौत, विस्थापन और संभावित शरणार्थी प्रवाह पहले से ही संकटग्रस्त अफगान अर्थव्यवस्था को और कमजोर कर सकते हैं. लंबी अस्थिरता बलूच अलगाववादियों को प्रोत्साहित कर सकती है, आईएसआईएस-के को मजबूत कर सकती है और उग्रवादी नेटवर्क को और अधिक बिखेर सकती है.

भारत की स्थिति

भारत के लिए यह संकट अवसर और जोखिम दोनों है. नई दिल्ली ने सार्वजनिक रूप से अफगानिस्तान की संप्रभुता का समर्थन किया है और पाकिस्तान की इस नीति की आलोचना की है कि वह अपनी आंतरिक सुरक्षा समस्याओं के लिए बाहरी कारणों को दोष देता है. यह रुख भारत की तालिबान के साथ सावधानीपूर्वक बढ़ती बातचीत से भी मेल खाता है, जिसमें मानवीय सहायता, व्यापार सुविधा और चाबहार कॉरिडोर जैसे संपर्क प्रयास शामिल हैं.

काबुल के साथ स्थायी राजनीतिक संवाद स्थापित करना होगा और अपने ही समाज में कट्टरता के कारणों को संबोधित करना होगा. इसलिए आज की आवश्यकता केवल तनाव कम करने की नहीं, बल्कि इस्लामाबाद में गंभीर आत्ममंथन की भी है-अन्यथा क्षेत्र में स्थायी संतुलन स्थापित होना मुश्किल रहेगा.

एक व्यस्त या उलझा हुआ पाकिस्तान भारत की पश्चिमी सीमा पर तत्काल दबाव कम कर सकता है. लेकिन अफगानिस्तान में अस्थिरता के कारण चरमपंथ, भारतीय परियोजनाओं पर खतरा और मध्य एशिया से जुड़ने की योजनाओं में बाधा जैसी चुनौतियां भी पैदा हो सकती हैं.

यह संकट एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है-प्रॉक्सी संघर्ष से सीधे सैन्य टकराव की ओर. क्षेत्रीय मध्यस्थता से अस्थायी तनाव कम होने की संभावना है, लेकिन जब तक ड्यूरंड रेखा विवाद, टीटीपी के ठिकाने और क्षेत्रीय प्रभाव की प्रतिस्पर्धा जैसे मूल मुद्दों पर प्रगति नहीं होती, यह सीमा क्षेत्र अस्थिर ही रहेगा.

पाकिस्तान के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि वह दशकों से चली आ रही अपनी अफगान नीति की रणनीतिक अस्पष्टता को जारी नहीं रख सकता. यदि इस्लामाबाद वास्तव में पश्चिमी सीमा पर स्थिरता चाहता है, तो उसे अपनी नीति में मूलभूत बदलाव करना होगा-चुनिंदा उग्रवाद की रणनीति छोड़नी होगी, काबुल के साथ स्थायी राजनीतिक संवाद स्थापित करना होगा और अपने ही समाज में कट्टरता के कारणों को संबोधित करना होगा. इसलिए आज की आवश्यकता केवल तनाव कम करने की नहीं, बल्कि इस्लामाबाद में गंभीर आत्ममंथन की भी है-अन्यथा क्षेत्र में स्थायी संतुलन स्थापित होना मुश्किल रहेगा.


यह लेख मूल रूप से एनडीटीवी में प्रकाशित हुआ था. 

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