यूएई के OPEC छोड़ने से तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है- यह भारत के लिए खतरा भी है और मौका भी. जानिए भारत इस मौके से अपनी ऊर्जा सुरक्षा किस तरह मजबूत कर सकता है.
कार्टेल दो तरीकों से खत्म होते हैं: या तो कीमतों की जंग से, या अचानक बाहर निकलने से. यूएई ने दूसरा रास्ता चुना है. 1 मई से, ओपेक का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक छह दशकों बाद इस कार्टेल और ओपेक+ दोनों को छोड़ देगा. यूएई लगभग 3.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mb/d) तेल उत्पादन करता है-जो वैश्विक तेल उत्पादन का करीब 4 प्रतिशत और ओपेक का लगभग 13 प्रतिशत है. यह घोषणा उस समय आई जब अमेरिका–इज़राइल और ईरान के बीच युद्ध का नौवां सप्ताह चल रहा था. ब्रेंट कच्चा तेल 111 डॉलर प्रति बैरल पर है, जो एक साल में लगभग 76 प्रतिशत बढ़ा है, और होर्मुज जलडमरूमध्य व्यावहारिक रूप से बंद है.
अबू धाबी के लिए यह कदम काफी समय से लंबित था. यूएई ने पिछले एक दशक में अपनी उत्पादन क्षमता को 4.8 mb/d से अधिक तक बढ़ाया, लेकिन रियाद द्वारा तय कोटा सीमाओं के कारण वह बंधा रहा. 2027 तक वह 5 mb/d का लक्ष्य रखता है-जो कार्टेल अनुशासन के साथ बिल्कुल मेल नहीं खाता. ऊर्जा मंत्री सुहैल अल मजरुई के अनुसार, उन्होंने यह समय इसलिए चुना क्योंकि कीमतों पर इसका प्रभाव न्यूनतम रहेगा. अब तक यह सही भी साबित हुआ है, क्योंकि ब्रेंट में 3 प्रतिशत से कम की वृद्धि हुई है, जिसका अधिकांश कारण ईरान है.
यूएई ने दूसरा रास्ता चुना है. 1 मई से, ओपेक का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक छह दशकों बाद इस कार्टेल और ओपेक+ दोनों को छोड़ देगा. यूएई लगभग 3.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mb/d) तेल उत्पादन करता है-जो वैश्विक तेल उत्पादन का करीब 4 प्रतिशत और ओपेक का लगभग 13 प्रतिशत है. यह घोषणा उस समय आई जब अमेरिका–इज़राइल और ईरान के बीच युद्ध का नौवां सप्ताह चल रहा था.
यूएई लंबे समय से उत्पादन आधार बढ़ाने की मांग करता रहा है. जब यह संभव नहीं हुआ, तो बाहर निकलना एक तर्कसंगत विकल्प बन गया. कार्टेल तब तक टिकते हैं जब तक संयम, अलग होने से ज्यादा लाभ देता है. जब 5 mb/d तक की क्षमता मौजूदा कोटा में बंध गई, तो अंदर रहना बाहर निकलने से ज्यादा नुकसानदेह हो गया.
सबसे गंभीर असर ‘सिग्नलिंग’ पर पड़ा है. दशकों तक, वियना (ओपेक मुख्यालय) से जारी एक बयान ही ब्रेंट कीमतों को ऊपर-नीचे कर देता था, और यह तंत्र भरोसे पर चलता था. तीसरे सबसे बड़े उत्पादक के बाहर होने से अब ओपेक के बयानों का प्रभाव कम हो जाएगा. ओपेक+ की वैश्विक उत्पादन में हिस्सेदारी पहले ही फरवरी के 48 प्रतिशत से घटकर मार्च में 44 प्रतिशत रह गई थी. इराक, जो अक्सर कोटा का उल्लंघन करता है, अब इसका अनुसरण कर सकता है. सऊदी अरब को कीमतों को स्थिर रखने का बोझ लगभग अकेले उठाना पड़ेगा.
यूएई अकेले ही कुल तेल आपूर्ति का 8–9 प्रतिशत हिस्सा रखता है, और सऊदी अरब, इराक व कुवैत के साथ मिलकर खाड़ी देश होर्मुज जलडमरूमध्य से 45–50 प्रतिशत तेल की आपूर्ति करते हैं. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है. रूस अब लगभग 36 प्रतिशत आपूर्ति करता है. यूएई का हिस्सा 8–9 प्रतिशत है, और खाड़ी देशों का बड़ा हिस्सा होर्मुज मार्ग से आता है. इसलिए, भारत ओपेक की एकजुटता का अप्रत्यक्ष लाभार्थी रहा है.
अब ये दोनों आधार कमजोर पड़ रहे हैं. यूएई के बाहर होने से ओपेक का अनुशासन ढीला पड़ सकता है. यदि तेल की कीमत 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है, तो भारत के आयात बिल में 13–14 अरब डॉलर की बढ़ोतरी होगी और चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 0.3 प्रतिशत बढ़ जाएगा. खुदरा स्तर पर, हर 10 डॉलर की वृद्धि पेट्रोल-डीजल की कीमत में लगभग 4–5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी ला सकती है, या तो सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा या तेल कंपनियों पर असर पड़ेगा. RBI के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में 10 प्रतिशत वृद्धि से GDP पर 15 बेसिस पॉइंट का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
कीमतों में उछाल तेजी से आएंगे, लंबे समय तक टिकेंगे और उनका असर ज्यादा गहरा होगा. इस अस्थिरता से बचाव के लिए भारत को दीर्घकालिक अनुबंध, आपूर्ति के विविध स्रोत, पूर्ण SPR भंडार और ADNOC-ISPRL जैसे द्विपक्षीय सहयोग पर जोर देना होगा. सुरक्षा मजबूत करने का यह मौका अभी खुला है, और नई दिल्ली को इसे गंवाना नहीं चाहिए.
लेकिन यह बाहर निकलना एक नया अवसर भी खोलता है. कोटा से मुक्त होने के बाद अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) को अपने अतिरिक्त उत्पादन के लिए भरोसेमंद और बड़े खरीदारों की जरूरत होगी. भारत के रिफाइनिंग हब-जामनगर, वाडिनार और पारादीप-इसके लिए उपयुक्त विकल्प हैं. दोनों देशों के बीच सहयोग पहले से ही काफी मजबूत है, जिसमें 2022 का व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता, लोअर ज़ाकुम में भारत की 10 प्रतिशत हिस्सेदारी, और मंगलौर के रणनीतिक भंडार में पहले से रखे गए 5.86 मिलियन बैरल ADNOC कच्चे तेल शामिल हैं. भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) का भी अधिक प्रभावी उपयोग किया जा सकता है, खासकर जब इसका एक प्रमुख उत्पादक कोटा के बाहर बिक्री कर रहा हो.
अब तुरंत दो कदम उठाने चाहिए. पहला, वाणिज्यिक: एडीएनओसी से दीर्घकालिक आपूर्ति समझौता तय कीमतों पर किया जाए, जिसमें कुछ हिस्से का भुगतान रुपये में हो. ऐसे टर्म कॉन्ट्रैक्ट उस अस्थिरता को कम करते हैं जिसे अब ओपेक नियंत्रित नहीं कर पाएगा. दूसरा, रणनीतिक: सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को भरना. इंडियन स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व लिमिटेड (ISPRL) मार्च 2026 तक 64 प्रतिशत क्षमता पर था. मौजूदा कीमतों पर इसे पूरी तरह भरने में लगभग 2 अरब डॉलर का खर्च आएगा, जो 145 अरब डॉलर के वार्षिक आयात बिल की तुलना में एक सस्ता बीमा माना जा सकता है. यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत का कुल भंडार केवल 74 दिनों के लिए पर्याप्त है, जो अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के 90 दिनों के मानक से कम है.
यूएई का यह कदम 1970 के दशक में बने तेल मूल्य निर्धारण ढांचे के धीरे-धीरे खत्म होने का संकेत है. वह व्यवस्था आपूर्ति के सामूहिक नियंत्रण पर आधारित थी. अब उसकी जगह अधिक लेन-देन आधारित और अस्थिर व्यवस्था ले रही है. कीमतों में उछाल तेजी से आएंगे, लंबे समय तक टिकेंगे और उनका असर ज्यादा गहरा होगा. इस अस्थिरता से बचाव के लिए भारत को दीर्घकालिक अनुबंध, आपूर्ति के विविध स्रोत, पूर्ण SPR भंडार और ADNOC-ISPRL जैसे द्विपक्षीय सहयोग पर जोर देना होगा. सुरक्षा मजबूत करने का यह मौका अभी खुला है, और नई दिल्ली को इसे गंवाना नहीं चाहिए.
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Arya Roy Bardhan is a Junior Fellow at the Centre for New Economic Diplomacy, Observer Research Foundation. His research interests lie in the fields of ...
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