Author : Harsh V. Pant

Published on Apr 13, 2026 Commentaries 2 Days ago

डोनाल्ड ट्रंप के नाटो पर सवाल उठाने से देशों के बीच भरोसा कमज़ोर हो रहा है. इससे पुतिन जैसे नेता मौके का फायदा उठा सकते हैं और दुनिया थोड़ी ज़्यादा अस्थिर हो सकती है. जानें कैसे यह टकराव वैश्विक सुरक्षा और संतुलन को प्रभावित कर रहा है.

ट्रंप बनाम NATO: दुनिया पर क्या असर?

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डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर NATO की अपनी पुरानी आलोचना को तेज करते हुए ट्रांसअटलांटिक संबंधों में अस्थिरता पैदा कर दी है. हाल के साक्षात्कारों में उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका का इस गठबंधन से बाहर निकलना केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि ‘पुनर्विचार से परे’ एक वास्तविक नीतिगत विकल्प हो सकता है.

ईरान संकट ने यह दिखा दिया है कि जब हित अलग होते हैं, तो गठबंधन की एकता सीमित हो जाती है. कई यूरोपीय देश घरेलू राजनीतिक बाधाओं और अलग-अलग खतरे की धारणाओं के कारण अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य अभियान में शामिल होने से हिचक रहे हैं.

नाटो को ‘कागज़ी शेर’ बताना, साथ ही डोनाल्ड ट्रम्प में अमेरिकी नौसैनिक अभियानों और चल रहे ईरान संकट के दौरान व्यापक लॉजिस्टिक प्रयासों में यूरोपीय देशों की अनिच्छा पर उनकी नाराज़गी-इन दोनों से उनके दृष्टिकोण में निरंतरता और तीव्रता दोनों झलकती हैं. ट्रम्प के लिए, गठबंधन कोई पवित्र व्यवस्था नहीं बल्कि तत्काल उपयोगिता के आधार पर आंके जाने वाले साधन हैं.

ट्रम्प की नाटो से पुरानी नाराज़गी 

यह कोई नई बात नहीं है. अपने पहले कार्यकाल से ही ट्रम्प नाटो को एक लेन-देन के नजरिए से देखते रहे हैं. उनका तर्क रहा है कि अमेरिका इस गठबंधन का असमान रूप से बड़ा बोझ उठाता है, जबकि यूरोपीय सहयोगी अमेरिकी सुरक्षा गारंटी का ‘फ्री-राइड’ लेते हैं.

हालांकि, इस आलोचना का कुछ असर भी पड़ा है. यूक्रेन पर रूस का आक्रमण के बाद यूरोपीय रक्षा खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और अधिकांश नाटो सदस्य 2% जीडीपी के लक्ष्य के करीब पहुँच गए हैं या उसे पूरा कर रहे हैं. फिर भी ट्रम्प के दृष्टिकोण से ये प्रयास अपर्याप्त हैं, खासकर तब जब अमेरिका जिन क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है-जैसे ईरान से जुड़ा वर्तमान तनाव-वहाँ सहयोगियों का समर्थन नहीं मिलता.

ईरान संकट ने उजागर कीं सीमाएँ

वर्तमान स्थिति को अलग बनाता है उसका संदर्भ. ईरान संकट ने यह दिखा दिया है कि जब हित अलग होते हैं, तो गठबंधन की एकता सीमित हो जाती है. कई यूरोपीय देश घरेलू राजनीतिक बाधाओं और अलग-अलग खतरे की धारणाओं के कारण अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य अभियान में शामिल होने से हिचक रहे हैं.

जब अमेरिकी राष्ट्रपति ही इस भरोसे पर सवाल उठाते हैं, तो इससे अनिश्चितता बढ़ती है और प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है. जैसा कि इमैनुएल मैक्रॉन ने चेतावनी दी है, यह केवल आलोचना नहीं बल्कि धीरे-धीरे नाटो को अंदर से खोखला करने जैसा है.

ट्रम्प के लिए यह हिचकिचाहट इस बात को पुष्ट करती है कि नाटो व्यवहार में ‘सशर्त’ है, भले ही सिद्धांत रूप में वह ‘निरपेक्ष’ होने का दावा करता हो. यदि गठबंधन अमेरिका के उद्देश्यों का स्वतः समर्थन नहीं करता, तो उनके अनुसार उसकी बुनियादी तर्कसंगतता ही संदिग्ध हो जाती है.

नाटो की उपयोगिता पर सवाल उठाने का असर

इस तरह की बयानबाज़ी के प्रभाव तत्काल विवाद से कहीं आगे जाते हैं. 1949 से नाटो यूरोपीय सुरक्षा का आधार रहा है, जहाँ इसका आर्टिकल 5 बड़े संघर्षों के खिलाफ एक मजबूत प्रतिरोधक है. लेकिन इसकी विश्वसनीयता औपचारिक प्रतिबद्धताओं से अधिक अमेरिका की भरोसेमंद भूमिका पर निर्भर करती है.

जब अमेरिकी राष्ट्रपति ही इस भरोसे पर सवाल उठाते हैं, तो इससे अनिश्चितता बढ़ती है और प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है. जैसा कि इमैनुएल मैक्रॉन ने चेतावनी दी है, यह केवल आलोचना नहीं बल्कि धीरे-धीरे नाटो को अंदर से खोखला करने जैसा है.

कानूनी रूप से अमेरिका का नाटो से पूरी तरह बाहर निकलना आसान नहीं है. संधि दायित्व और घरेलू कानून इसे जटिल बनाते हैं. लेकिन अधिक संभावित और खतरनाक स्थिति यह है कि अमेरिका धीरे-धीरे अपनी प्रतिबद्धता कम करे-जैसे सैनिकों की संख्या घटाना, सैन्य सहयोग कम करना, या परमाणु सुरक्षा छतरी को लेकर अस्पष्टता बनाए रखना. इससे औपचारिक वापसी के बिना ही नाटो की विश्वसनीयता कमजोर हो सकती है.

रूस का रवैया

यूरोप के लिए इसके रणनीतिक परिणाम गंभीर हैं. आर्टिकल 5 की विश्वसनीयता काफी हद तक अमेरिकी सैन्य क्षमताओं-जैसे खुफिया, निगरानी और परमाणु प्रतिरोध-पर निर्भर करती है. यदि अमेरिकी प्रतिबद्धता कमजोर पड़ती है, तो व्लादिमीर पुतिन जैसे नेता अवसरवादी रवैया अपना सकते हैं, जो पहले ही नाटो को रूस के प्रभाव क्षेत्र में हस्तक्षेप मानते रहे हैं.

जब NATO इस परिवर्तनशील दौर से गुजर रहा है, तब मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि संयुक्त राज्य अमेरिका गठबंधन में बना रहेगा या नहीं, बल्कि यह है कि वह किस प्रकार का सहयोगी बनना चाहता है. 

ऐसी स्थिति में मॉस्को बाल्टिक क्षेत्र में हाइब्रिड ऑपरेशन, यूक्रेन पर दबाव बढ़ाना, या सीमित सैन्य कार्रवाई के जरिए नाटो की प्रतिक्रिया क्षमता को परख सकता है. हालांकि यूरोपीय देशों ने रक्षा खर्च बढ़ाया है, फिर भी वे अभी अमेरिका की कमी की भरपाई करने में सक्षम नहीं हैं. यह अंतर केवल मात्रा का नहीं बल्कि गुणवत्ता का भी है-खासकर उन्नत तकनीक और समन्वय के क्षेत्रों में. इसी असमानता के कारण ट्रम्प की बयानबाज़ी इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है. भले ही नीति में बदलाव न हो, लेकिन अमेरिका के पीछे हटने की धारणा ही मॉस्को की रणनीतिक गणनाओं को बदल सकती है.

यूरोप की प्रतिक्रिया

यूरोप की प्रतिक्रिया एक परिचित द्वंद्व को दर्शाती है-चिंता के साथ नई महत्वाकांक्षा. एक ओर ट्रांसअटलांटिक सुरक्षा गारंटी के कमजोर होने को लेकर स्पष्ट चिंता है, तो दूसरी ओर अधिक रणनीतिक स्वायत्तता की आवश्यकता को लेकर जागरूकता बढ़ रही है. यूरोपीय रक्षा सहयोग को मजबूत करने के प्रयास-जैसे संयुक्त खरीद  से लेकर त्वरित प्रतिक्रिया क्षमताओं  के विकास तक-अब अधिक तात्कालिकता के साथ आगे बढ़ रहे हैं. पेरिस और बर्लिन के नेता, जो लंबे समय से अधिक आत्मनिर्भर यूरोप के पक्षधर रहे हैं, अब पूरे महाद्वीप में अपने विचारों के लिए व्यापक समर्थन पाते दिख रहे हैं.

हालांकि, स्वायत्तता का रास्ता न तो आसान है और न ही विवादों से मुक्त. यूरोपीय देशों के बीच खतरे की धारणाओं में अभी भी अंतर है-पूर्वी देश रूस के खिलाफ प्रतिरोध को प्राथमिकता देते हैं, जबकि दक्षिणी देश भूमध्यसागर और उत्तर अफ्रीका की अस्थिरता पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं. ये मतभेद एक साझा रणनीतिक दृष्टि बनाने में बाधा उत्पन्न करते हैं. इसके अलावा, विश्वसनीय सैन्य क्षमताएँ विकसित करने के लिए केवल वित्तीय निवेश ही नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, संस्थागत सुधार और समय भी चाहिए-जो अक्सर सीमित संसाधन होते हैं.

चीन के लिए अवसर

यूरोप से परे, कमजोर पड़ते NATO के प्रभाव भी महत्वपूर्ण हैं. ट्रांसअटलांटिक एकता में कमी वैश्विक व्यवस्था को अधिक खंडित और बहुध्रुवीय बनाने की प्रक्रिया को तेज कर सकती है. चीन विशेष रूप से इस स्थिति को अपने रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के अवसर के रूप में देखेगा-चाहे वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र हो या वैश्विक शासन संस्थाएँ. यदि संयुक्त राज्य अमेरिका अपने गठबंधनों से पीछे हटता दिखता है, तो साझेदारों को जोड़ना कठिन होगा और उसकी रणनीतिक स्थिति कमजोर पड़ेगी. ट्रांसअटलांटिक एकता का क्षरण वैश्विक स्तर पर अधिक खंडित, बहुध्रुवीय व्यवस्था को तेज करेगा. 

यदि संयुक्त राज्य अमेरिका अपने गठबंधनों से पीछे हटता दिखता है, तो साझेदारों को जोड़ना कठिन होगा और उसकी रणनीतिक स्थिति कमजोर पड़ेगी. ट्रांसअटलांटिक एकता का क्षरण वैश्विक स्तर पर अधिक खंडित, बहुध्रुवीय व्यवस्था को तेज करेगा. 

वॉशिंगटन के लिए जोखिम केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं हैं. दशकों में बने अमेरिकी गठबंधनों का नेटवर्क न केवल उसकी सैन्य शक्ति बल्कि आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव का भी आधार है. यदि ये संबंध कमजोर होते हैं, तो वैश्विक व्यापार, तकनीक और कूटनीति में अमेरिका का प्रभाव कम हो सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय परिणामों को आकार देने की उसकी क्षमता धीरे-धीरे सीमित हो जाएगी. इस दृष्टि से, गठबंधनों के प्रति लेन-देन आधारित दृष्टिकोण की लागत उसके समर्थकों की अपेक्षा से कहीं अधिक हो सकती है.

दांव पर नाटो से कहीं बड़ा मुद्दा

अंततः, दांव पर केवल नाटो का भविष्य नहीं बल्कि सामूहिक सुरक्षा की वह व्यापक अवधारणा है, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को परिभाषित किया है. डोनाल्ड ट्रम्प का दृष्टिकोण एक राष्ट्रवादी और हित-आधारित विदेश नीति तथा संस्थागत सहयोग के स्थायी महत्व के बीच मूलभूत तनाव को उजागर करता है.

हालांकि उनकी बयानबाज़ी यूरोप को अधिक आत्मनिर्भर बनने की दिशा में प्रेरित कर सकती है-जो लंबे समय से अमेरिकी उद्देश्य रहा है-लेकिन यह परिवर्तन अनिश्चितताओं और जोखिमों से भरा होगा. जब NATO इस परिवर्तनशील दौर से गुजर रहा है, तब मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि संयुक्त राज्य अमेरिका गठबंधन में बना रहेगा या नहीं, बल्कि यह है कि वह किस प्रकार का सहयोगी बनना चाहता है. इसका उत्तर न केवल यूरोप की सुरक्षा के भविष्य को निर्धारित करेगा, बल्कि आने वाले दशकों में वैश्विक व्यवस्था की रूपरेखा भी तय करेगा.

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