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वेनेज़ुएला में मादुरो की गिरफ्तारी और अमेरिका का हस्तक्षेप देश और क्षेत्र की राजनीति बदल रहा है. इस आर्टिकल से समझें कि अमेरिका की यह कार्रवाई क्यों हुई और इसका असर क्या हो सकता है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने नए साल की शुरुआत में एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को कराकस में एक सैन्य कार्रवाई के दौरान हिरासत में ले लिया. यह कदम ऐसे समय पर आया है जब ट्रंप सत्ता में आते समय “हमेशा चलने वाले युद्धों” को खत्म करने का वादा कर चुके थे. अब वे यह कहते दिख रहे हैं कि अमेरिका वेनेज़ुएला को तब तक चलाएगा, जब तक वहां “सुरक्षित और व्यवस्थित सत्ता परिवर्तन” नहीं हो जाता. इस तरह “अमेरिका फर्स्ट” की नीति अब एक संकटग्रस्त दक्षिण अमेरिकी देश के पुनर्निर्माण तक फैलती दिख रही है.
मादुरो पर ड्रग्स और हथियारों से जुड़े आरोप लगाए गए हैं और उन्हें न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन स्थित मेट्रोपॉलिटन डिटेंशन सेंटर में रखा गया है. वेनेज़ुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज ने इस कार्रवाई को “सशस्त्र आक्रमण” बताते हुए देश की रक्षा का संकल्प जताया है. ट्रंप ने अमेरिकी सैनिकों की तैनाती से भी इनकार नहीं किया और कहा कि “हम ज़मीन पर सैनिक भेजने से नहीं डरते.”
2017 से 2021 के दौरान अमेरिका और वेनेज़ुएला के रिश्ते पहले ही गहरे तनाव से गुज़र चुके हैं. इस अवधि में अमेरिका ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर तानाशाही रवैया अपनाने, व्यापक मानवाधिकार उल्लंघन करने और गंभीर भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाए. 2018 के विवादित राष्ट्रपति चुनाव के बाद अमेरिका ने मादुरो की वैधता को मानने से इनकार कर दिया. इसके अगले ही वर्ष, 2019 में, वॉशिंगटन ने विपक्षी नेता जुआन गुआइदो को वेनेज़ुएला का अंतरिम राष्ट्रपति मान्यता दे दी. इस कदम ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक टकराव को और तेज़ कर दिया.
वेनेज़ुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज ने इस कार्रवाई को “सशस्त्र आक्रमण” बताते हुए देश की रक्षा का संकल्प जताया है.
इसी दौर में अमेरिका ने वेनेज़ुएला पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए, जिनका मुख्य निशाना देश का तेल क्षेत्र रहा, जो उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. इन प्रतिबंधों के तहत सरकारी संपत्तियों को फ्रीज़ किया गया, तेल निर्यात पर रोक लगी और प्रमुख अधिकारियों को वैश्विक वित्तीय प्रणाली से बाहर कर दिया गया. अमेरिका का तर्क था कि इन दबावों से लोकतंत्र की बहाली का रास्ता खुलेगा, लेकिन व्यवहार में इन कदमों ने वेनेज़ुएला की पहले से जर्जर अर्थव्यवस्था को और बदहाल कर दिया. महंगाई चरम पर पहुँची, खाद्य और दवाओं की भारी कमी हुई और लाखों लोग देश छोड़ने को मजबूर हो गए.
हालिया सैन्य हस्तक्षेप, जिसे ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व’ नाम दिया गया है, अमेरिका की नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है. आर्थिक और कूटनीतिक दबाव से आगे बढ़ते हुए अब अमेरिका ने सीधे सैन्य कार्रवाई का रास्ता चुना है. राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका इस क्षेत्र में अपने हितों की रक्षा के लिए अपने प्रभाव और ताक़त का खुलकर इस्तेमाल करने को तैयार है. यह कदम न केवल वेनेज़ुएला के भविष्य पर असर डालेगा, बल्कि पूरे लैटिन अमेरिका में शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है.
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे वेनेज़ुएला के विशाल तेल भंडार को एक अहम कारण माना जा रहा है. वेनेज़ुएला दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार वाले देशों में शामिल है, लेकिन वर्षों की बदहाली, निवेश की कमी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण उसका तेल क्षेत्र लगभग ठप हो चुका है. राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि अमेरिकी तेल कंपनियाँ वेनेज़ुएला के जर्जर तेल ढांचे को सुधारने में प्रमुख भूमिका निभाएँगी और तेल उत्पादन को दोबारा गति देंगी. ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि इससे न केवल वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था को सहारा मिलेगा, बल्कि देश को राजस्व के स्थायी स्रोत भी मिल सकेंगे.
राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका इस क्षेत्र में अपने हितों की रक्षा के लिए अपने प्रभाव और ताक़त का खुलकर इस्तेमाल करने को तैयार है. यह कदम न केवल वेनेज़ुएला के भविष्य पर असर डालेगा, बल्कि पूरे लैटिन अमेरिका में शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है.
इसके साथ ही अमेरिका की रणनीति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक भी है. वॉशिंगटन चीन, रूस और ईरान जैसे देशों के बढ़ते प्रभाव को अपने ‘निकटवर्ती क्षेत्र’ से बाहर करना चाहता है. बीते वर्षों में इन देशों ने वेनेज़ुएला को कर्ज़, तकनीकी सहयोग और राजनीतिक समर्थन दिया है, जिससे अमेरिका की पारंपरिक पकड़ कमजोर हुई. मौजूदा हस्तक्षेप को इस प्रभाव को सीमित करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है.
हालांकि मादुरो की गिरफ्तारी के बावजूद वेनेज़ुएला की समस्याएँ खत्म नहीं हुई हैं. देश आज भी गहरी संस्थागत कमजोरी, प्रशासनिक अव्यवस्था और गंभीर मानवीय संकट से जूझ रहा है. स्वास्थ्य सेवाएँ चरमराई हुई हैं, खाद्य सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बनी हुई है और बड़ी संख्या में लोग गरीबी में जी रहे हैं. ऐसे हालात में सत्ता परिवर्तन के बाद भी लंबे समय तक राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता बने रहने का ख़तरा है, जो अमेरिका की योजनाओं के लिए भी चुनौती बन सकता है.
हाल के दिनों में ट्रंप ने सीरिया और नाइजीरिया में हवाई हमलों की मंज़ूरी दी है. इससे पहले ईरान, यमन, सोमालिया और इराक में भी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई देखी गई. यह दिखाता है कि शांति के वादों के बावजूद, अमेरिका की विदेश नीति में सैन्य ताक़त अब भी एक प्रमुख साधन बनी हुई है.
कुल मिलाकर, वेनेज़ुएला में अमेरिका की यह कार्रवाई यह संकेत देती है कि वैश्विक राजनीति में वर्चस्व और हितों की रक्षा के लिए अमेरिका बल प्रयोग से पीछे हटने वाला नहीं है. दुनिया की अन्य बड़ी शक्तियाँ इस घटनाक्रम को ध्यान से देख रही हैं.
हर्ष पंत ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के प्रमुख हैं.
यह लेख मूल रूप से एनडीटीवी में प्रकाशित हुआ था.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President - ORF and Studies at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with ...
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