हाल ही में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के आपातकालीन टैरिफ पर बड़ा फैसला सुनाया है जिससे वैश्विक व्यापार में नई अनिश्चितता पैदा हो गई है, जानें क्या यह टैरिफ जंग का अंत है या किसी नए दौर की शुरुआत?
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का टैरिफ पर निर्णय अनिश्चितता के एक नए दौर की शुरुआत का संकेत दे सकता है. ‘लिबरेशन डे’ (मुक्ति दिवस) पर अनायास बना व्यंग्य उस समय बिल्कुल उपयुक्त प्रतीत हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स ने 6-3 के बहुमत से डोनाल्ड ट्रम्प के आपातकालीन टैरिफ के विरुद्ध फैसला सुनाया. इस विधायी प्रश्न का मूल मुद्दा यह था कि क्या इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर एक्ट (IEEPA) राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार देता है. अदालत ने लगभग हर उस देश से आयातित वस्तुओं पर लगाए गए टैरिफ के श्री ट्रंप के निर्णय को अमान्य ठहराया, यह स्पष्ट करते हुए कि IEEPA राष्ट्रपति को असीमित मात्रा, अवधि और दायरे में एकतरफा टैरिफ लगाने की शक्ति प्रदान नहीं करता. यद्यपि यह निर्णय यह आभास दे सकता है कि ट्रंप टैरिफ का अप्रत्याशित दौर समाप्त हो गया है, किंतु एक नया चरण उभरता दिखाई दे रहा है.
दूसरे ट्रंप प्रशासन के आक्रामक कार्यपालिका रुख को देखते हुए यह कल्पना करना कठिन है कि कार्यपालिका किसी अन्य शाखा के समक्ष झुकेगी. धारा 122 के तहत लगाए गए ये 15 प्रतिशत टैरिफ, पूर्व घोषित 10 प्रतिशत के बाद, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का प्रतिकार करने और पूर्व टैरिफ से अपेक्षित आर्थिक लाभ की भरपाई करने के दोहरे उद्देश्य को साधने के लिए हैं. व्यावहारिक स्तर पर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध ट्रंप की प्रतिक्रिया के वास्तविक समय के प्रभावों का आकलन करना अभी कठिन है, विशेषकर क्योंकि नया निर्णय सभी क्षेत्रों पर समान रूप से लागू नहीं होता. कुछ कृषि उत्पाद, बीफ, विदेशी ऑटोमोबाइल, एल्युमिनियम और इस्पात जैसे उत्पाद या तो पूर्व छूट के अंतर्गत आते हैं या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में होने के कारण वर्तमान टैरिफ संघर्ष से आंशिक रूप से संरक्षित रह सकते हैं. परिणामस्वरूप उत्पन्न अनिश्चितता अमेरिका के भीतर उपभोक्ताओं तथा विश्वभर के देशों को प्रभावित करेगी.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध ट्रंप की प्रतिक्रिया के वास्तविक समय के प्रभावों का आकलन करना अभी कठिन है, विशेषकर क्योंकि नया निर्णय सभी क्षेत्रों पर समान रूप से लागू नहीं होता.
अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले देशों, खासकर भारत, के लिए न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच चल रहा यह टकराव गंभीर विचार का विषय है. सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है क्योंकि इसने कार्यपालिका की शक्तियों पर कुछ हद तक नियंत्रण स्थापित किया है. फिर भी यह मान लेना कि न्यायपालिका हर बार कार्यपालिका के फैसलों को रोक देगी, व्यावहारिक नहीं है. वर्तमान में अदालत में छह रूढ़िवादी और तीन उदारवादी न्यायाधीश हैं, जिससे कई मामलों में शक्ति संतुलन अलग दिशा ले सकता है. ऐसे में केवल न्यायिक हस्तक्षेप पर भरोसा करना जोखिम भरा हो सकता है. इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन के पास ऐसे कई कानूनी प्रावधान हैं जिनके माध्यम से वह व्यापार और टैरिफ से जुड़े फैसले ले सकता है. इन कानूनों का दायरा व्यापक है और उनका प्रभाव वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर पड़ सकता है.
ट्रंप के टैरिफ को निरस्त करने के इस निर्णय का श्रेय काफी हद तक उन दो रूढ़िवादी न्यायाधीशों को दिया गया है, जिन्होंने मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स के साथ मत मिलाया-न्यायमूर्ति नील एम. गोरसच और एमी कोनी बैरेट. ये घटनाक्रम अमेरिकी शासन प्रणाली के भीतर एक मंथन को दर्शाते हैं और प्रतीत होता है कि यह आंतरिक पुनर्संतुलन का परिणाम है, बाहरी दबाव का कम. अधिकतम यह कहा जा सकता है कि दंडात्मक टैरिफ के संदर्भ में अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व स्थिति पर विचार ने अदालत की सोच को प्रभावित किया हो.
ट्रंप के आपातकालीन टैरिफ समाप्त करने का नया निर्णय व्यापारिक साझेदारों और कंपनियों के बीच भ्रम और अनिश्चितता उत्पन्न करेगा. श्री ट्रंप द्वारा देशों को अपने-अपने व्यापार समझौतों का पालन करने की चेतावनी इस ओर संकेत करती है कि वे देश, जिन्हें अमेरिका के साथ अपेक्षाकृत कम अनुकूल समझौते करने पड़े, अवसर मिलते ही पूर्व स्थिति में लौटने का प्रयास कर सकते हैं.
ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को दरकिनार करने के लिए ‘अन्य विकल्पों’ के उपयोग की स्पष्ट चेतावनी दी है. उनके पास तीन प्रमुख कानूनी साधन हैं-1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122, जो भुगतान संतुलन घाटे के आधार पर टैरिफ लगाने की अनुमति देती है; उसी अधिनियम की धारा 301, जो ‘अनुचित व्यापार’ प्रथाओं के विरुद्ध टैरिफ लगाने की अनुमति देती है.
इंडोनेशिया जैसे देश, जिन्होंने अमेरिका पर शून्य टैरिफ लगाने पर सहमति दी है, इस अनिश्चितता को अवसर के रूप में देख सकते हैं. किंतु ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को दरकिनार करने के लिए ‘अन्य विकल्पों’ के उपयोग की स्पष्ट चेतावनी दी है. उनके पास तीन प्रमुख कानूनी साधन हैं-1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122, जो भुगतान संतुलन घाटे के आधार पर टैरिफ लगाने की अनुमति देती है; उसी अधिनियम की धारा 301, जो ‘अनुचित व्यापार’ प्रथाओं के विरुद्ध टैरिफ लगाने की अनुमति देती है; और 1962 के यूएस ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट की धारा 232, जिसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर विशिष्ट क्षेत्रों पर टैरिफ लगाया जा सकता है. इन कानूनों की व्यापकता को कम करके नहीं आंका जा सकता. इन्हें पुनः अदालत में चुनौती दी जा सकती है, किन्तु एक बात स्पष्ट है-IEEPA की सीमाबद्धता ने टैरिफ के राजनीतिक हथियारीकरण को आघात पहुँचाया है. ट्रंप प्रशासन के प्रति अनुकूल मानी जाने वाली न्यायपालिका से आया यह निर्णय अधिक महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक है.
यह फैसला कुछ देशों को सामान्य लग सकता है, लेकिन यह कार्यपालिका की असीमित शक्ति पर रोक का संकेत है. इससे ट्रंप प्रशासन को झटका लगा है और उनका आर्थिक-राजनीतिक एजेंडा, खासकर मध्यावधि चुनाव से पहले, कठिन हो गया है. आगे और बड़े फैसलों का रास्ता खुल सकता है. भारत के लिए जन्मसिद्ध नागरिकता का मुद्दा अहम है, जो दोनों देशों के जन-संपर्क संबंधों को बदल सकता है.
यह लेख मूल रूप से बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित हुआ था.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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Vivek Mishra is Deputy Director – Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. His work focuses on US foreign policy, domestic politics in the US, ...
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