EU और भारत के बीच कार्बन बॉर्डर टैक्स (CBAM) विवाद में सिर्फ विरोध-प्रतिकार नहीं है बल्कि यह व्यापार, क्लीन एनर्जी और जलवायु कार्रवाई को जोड़ने वाला जटिल मसला है. जानिए कि कौन से नए और समझदारी भरे उपाय इसे दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद बना सकते हैं.
पिछले महीने फाइनेंशियल टाइम्स ने खबर दी कि यूरोपियन यूनियन (EU) भारत की उस मांग को ठुकराने की तैयारी में है जिसमें भारत ने कार्बन बॉर्डर टैक्स से छूट मांगी थी. रिपोर्ट में यह भी था कि अगर ऐसा हुआ तो साल के अंत तक दोनों के बीच ट्रेड डील करने की कोशिशों में और भी मुश्किलें आएंगी.
लेकिन मीडिया और नेताओं की तरफ से CBAM यानी कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म को लेकर जो बातें कही जाती हैं, अक्सर वे जरूरत से ज्यादा आसान बनाकर पेश की जाती हैं. इससे ऐसा लगता है कि जैसे इस स्थिति में एक पक्ष का फायदा होगा तो दूसरे का नुकसान तय है जबकि सच यह है कि अगर थोड़ा नया और समझदारी भरा तरीका अपनाया जाए तो दोनों के लिए यह फायदेमंद समझौता हो सकता है.
CBAM से सीधे-सीधे छूट मिलना आसान नहीं है लेकिन भारत ने काफी सोच-समझकर सुझाव दिया है. भारत चाहता है कि वह अपने यहां कार्बन एक्सपोर्ट लेवी यानी निर्यात पर कार्बन शुल्क लगाए ताकि जिन सामानों पर CBAM लागू होता है, उनका टैक्स भारत की सीमा पर ही वसूला जा सके. यह पूरी समस्या का हल तो नहीं है लेकिन बातचीत शुरू करने के लिए एक मजबूत आधार जरूर बन सकता है.
भारत का यह कहना सही है कि CBAM को घरेलू स्तर पर लागू किया जा सकता है. वहीं EU की भी यह बात सही है कि अगर ऐसा करना है तो कुछ जरूरी शर्तें पूरी करनी होंगी, तभी यूरोप में लगने वाले इस टैक्स की जगह भारत का सिस्टम मान्य होगा.
भारत चाहता है कि वह अपने यहां कार्बन एक्सपोर्ट लेवी यानी निर्यात पर कार्बन शुल्क लगाए ताकि जिन सामानों पर CBAM लागू होता है, उनका टैक्स भारत की सीमा पर ही वसूला जा सके. यह पूरी समस्या का हल तो नहीं है लेकिन बातचीत शुरू करने के लिए एक मजबूत आधार जरूर बन सकता है.
कम से कम इतना तो जरूरी होगा कि वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) के बराबरी वाले नियमों के तहत भारत का यह निर्यात शुल्क उसी लेवल पर तय हो, जितना टैक्स EU की सीमा पर ऐसे ही सामानों से लिया जाता है यानी निर्यात होने वाली चीजों में कितना कार्बन उत्सर्जन शामिल है, उसका हिसाब पूरी तरह साफ और पारदर्शी होना चाहिए ताकि EU के कार्बन रिकॉर्ड से उसका मिलान हो सके. कीमत भी लगभग बराबर रखनी होगी. हालांकि 2026 में जब CBAM पूरी तरह लागू होगा तो यह कीमत कम होगी लेकिन 2030 तक इसमें काफी बढ़ोतरी होने की संभावना है.
सबसे जरूरी बात यह है कि अगर समझौता करना है तो पहले यह मानना होगा कि भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) अभी EU की एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम (ETS) के बराबर नहीं है. ETS वह सिस्टम है जिस पर CBAM टिका है. ETS में कुल कार्बन उत्सर्जन की एक तय सीमा होती है और कंपनियों को ज्यादातर सर्टिफिकेट नीलामी में खरीदने पड़ते हैं. वहीं CCTS में उत्सर्जन की तीव्रता यानी इंटेंसिटी के लक्ष्य तय होते हैं और कंपनियों को सर्टिफिकेट आवंटन के जरिए मिलते हैं.
इसी फर्क की वजह से EU के राजनयिकों ने कहा है कि इस पर चर्चा हो सकती है कि भारत में अगर कार्बन की कोई प्रभावी कीमत वसूली जाती है तो उसे CBAM से घटाया कैसे जाए लेकिन वे इससे आगे नहीं बढ़े हैं. भारत भी जानता है कि यूरोपियन कमीशन CBAM के नियमों के तहत यह तय करने के लिए तकनीकी दिशा-निर्देश तैयार कर रहा है कि दूसरे देशों में उत्सर्जन पर चुकाई गई कीमत को CBAM सर्टिफिकेट में कैसे बदला जाए. दोनों पक्ष मानते हैं कि इस मुद्दे पर और भी बड़े सवालों का जवाब देना होगा.
EU को यह भरोसा होना चाहिए कि भारत अगर कार्बन एक्सपोर्ट लेवी लगाता है तो वह पैसा उद्योगों को वापस नहीं दिया जाएगा बल्कि सच में कार्बन कम करने के काम आएगा. दूसरी तरफ भारत चाहेगा कि यूरोप यह माने कि CBAM दरअसल एक ऐसा खर्च है जो ट्रेड पार्टनर्स पर डाल दिया जाता है. साथ ही इसकी महत्वाकांक्षा और जटिलता का असर यह भी हो सकता है कि कम आय वाले देशों के छोटे उत्पादक इससे ज्यादा प्रभावित हों.
यहीं पर शायद नए समाधान की गुंजाइश है. क्या भारत यह वादा कर सकता है कि वह अपने यहां CBAM जैसे टैक्स से जो पैसा जुटाएगा, उसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन वाले उद्योगों को साफ ऊर्जा की तरफ ले जाने वाले फंड में डालेगा? और क्या EU इस फंड में अतिरिक्त क्लाइमेट फाइनेंस देकर मदद कर सकता है?
एक और व्यावहारिक तरीका यह हो सकता है कि पारदर्शिता बढ़ाने और नियमों का पालन आसान बनाने के लिए भारत, EU को ऐसा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद करे जिससे उत्सर्जन को ट्रैक और वेरिफाई करना आसान हो जाए.
सली चुनौती यह है कि EU के मानक जब विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर असर डालते हैं तो उनका दायरा और स्तर सही तरीके से तय किया जाए. ब्रसेल्स में बनी नीतियां जब अलग-अलग हालात, संसाधनों और क्षमताओं वाले देशों से टकराती हैं तो मुश्किलें पैदा होना तय है. इसलिए CBAM को लेकर जो खटास है, उससे आगे बढ़ने के लिए दोनों पक्षों को थोड़ा झुकना होगा, थोड़ा समझौता करना होगा, और एक-दूसरे की जरूरतों को समझना होगा.
अगर इस तरह का पूरा पैकेज तैयार होता है तो इससे ग्रीन इंडस्ट्री में निवेश की ऊंची लागत और रोजमर्रा के खर्च जैसी दिक्कतों को कम करने में मदद मिल सकती है. साथ ही क्लाइमेट जस्टिस, अलग-अलग देशों की नीतियों के बीच तालमेल और साझा जिम्मेदारी जैसे बड़े मुद्दों पर भी आगे बढ़ा जा सकता है. ऐसा ‘लेवी फंड’ शुरुआत में 2030 तक के लिए बनाया जा सकता है और बाद में दोनों पक्ष मिलकर इसकी समीक्षा कर सकते हैं.
अगर यूरोपियन यूनियन, भारत के सुझाव का जवाब सकारात्मक और रचनात्मक तरीके से देती है, तो वह दिखाएगी कि CBAM का मकसद सच में वैश्विक जलवायु कार्रवाई में नेतृत्व करना है. साथ ही यह सितंबर में अपनाए ‘न्यू स्ट्रैटेजिक EU-इंडिया एजेंडा’ को भी आगे बढ़ाएगा.
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि दांव पर सिर्फ CBAM नहीं है. यह तो जलवायु कूटनीति के बड़े मैदान का सिर्फ एक हिस्सा है, जहां EU और भारत के बीच सहयोग की बहुत संभावनाएं हैं.
मुझे नहीं लगता कि फाइनेंशियल टाइम्स का यह संकेत सही है कि इतना छोटा मुद्दा मौजूदा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को पटरी से उतार सकता है. इसके बजाय EU और भारत CBAM के समाधान पर काम कर सकते हैं. मसलन, अगले साल होने वाली EU-भारत लीडर्स समिट में रणनीतिक एजेंडा के तहत ग्रीन इकोनॉमी पार्टनरशिप पर एक समझौता ज्ञापन यानी MoU किया जा सकता है.
CBAM एक ऐसी पहेली है जिसे सुलझाना आसान नहीं है. जलवायु संकट के लिहाज से यह सही कदम हो सकता है लेकिन सिर्फ सही काम करना ही अच्छे नतीजे की गारंटी नहीं देता. असली चुनौती यह है कि EU के मानक जब विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर असर डालते हैं तो उनका दायरा और स्तर सही तरीके से तय किया जाए. ब्रसेल्स में बनी नीतियां जब अलग-अलग हालात, संसाधनों और क्षमताओं वाले देशों से टकराती हैं तो मुश्किलें पैदा होना तय है. इसलिए CBAM को लेकर जो खटास है, उससे आगे बढ़ने के लिए दोनों पक्षों को थोड़ा झुकना होगा, थोड़ा समझौता करना होगा, और एक-दूसरे की जरूरतों को समझना होगा, तभी रास्ता निकलेगा.
यह लेख मूल रूप से सस्टेनेबल व्यूज में प्रकाशित हुआ था .
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Professor Jesse Scott is a Senior Fellow at the Observer Research Foundation, as well as adjunct faculty at the Hertie School in Berlin since 2019. ...
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