Author : Harsh V. Pant

Published on Apr 04, 2026 Commentaries 2 Days ago

सच्चाई यही है कि अतिशयोक्ति और इनकार से अलग हटकर, वर्तमान हालात का संतुलित और यथार्थ मूल्यांकन ही इस वैश्विक उथल-पुथल में सही दिशा दे सकता है. 

आज की जंग, कल के महायुद्ध का संकेत

दुनिया के तमाम हिस्सों में जारी लंबे संघर्षों को देखने के बावजूद फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि हम तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर हैं, लेकिन वह मान लेना भी उतना ही गलत होगा कि विश्व व्यवस्था में कोई सार्थक संतुलन बचा हुआ है. हम आज एक खंडित, प्रतिस्पर्धी बहुध्रुवीय व्यवस्था का लगातार विकास देख रहे हैं. लिहाजा, यह महायुद्ध की और भले न बढ़ती दिखे, पर परस्पर जुड़े संघर्षों को एक ऐसी श्रृंखला है, जिनमें सभी एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं. इससे स्थिरता का वह एहसास टूटता हुआ दिख रहा है, जो शीत युद्ध के बाद महसूस ही यह था. अब संघर्ष निरंतर चल रहे हैं, भले ही उनको पूर्ण युद्ध न कहा जाए.

पूर्वी यूरोप से लेकर पश्चिम एशिया और अफ्रीका से लेकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक यह तस्वीर साफ है. हर जगह संकट बढ़ता जा रहा है. रूस-यूक्रेन युद्ध एक थका देने वाली जंग के रूप में जारी है, जिसमें यूरोपीय देश प्रत्यक्ष रूप  शामिल न होते हुए भी भारी नुकसान झेल रहे हैं. इसमें पश्चिमी देशों की बड़ी भागीदारी हथियार और खुफिया सूचनाएं मुहैया कराने में है, फिर भी नाटो इसका सीधा-सीधा हिस्सा नहीं है, जो बड़ी ताकतों द्वारा बरती जा रही सावधानी को दर्शाता है. यह सीमित दायरे में चल रही एक गहरी प्रतिद्वंद्विता बन गई है.

हम आज एक खंडित, प्रतिस्पर्धी बहुध्रुवीय व्यवस्था का लगातार विकास देख रहे हैं. लिहाजा, यह महायुद्ध की और भले न बढ़ती दिखे, पर परस्पर जुड़े संघर्षों को एक ऐसी श्रृंखला है, जिनमें सभी एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं. इससे स्थिरता का वह एहसास टूटता हुआ दिख रहा है, जो शीत युद्ध के बाद महसूस ही यह था.

हालांकि, पश्चिम एशिया में हालात कहीं ज्यादा अस्थिर हैं. ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल के सैन्य टकराव ने क्षेत्रीय अस्थिरता को काफी अधिक बढ़ा दिया है. इसका व्यापक प्रभाव लेबनान, खाड़ी के तमाम देशों और प्रमुख समुद्री मार्गों पर पड़ रहा है. बड़े देश जहां टूट रही व्यवस्था को संभालने से अधिक ध्यान विरोधों पक्ष की क्षमताओं को कमजोर करने पर लगा रहे हैं. जबकि, यह बात कमोबेश सभी जानते हैं कि तनाव यदि अनियंत्रित हुआ, तो उसका नतीजा इस क्षेत्र के बाहर के देशों को भी भुगतना पड़ेगा.

अन्य देश भी प्रभावित  

यूक्रेन ईरान के अलावा, सुडान, म्यांमार व अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में भी कई तरह के संघर्ष चल रहे हैं, जो राज्य-सत्ता के संकट को दशति हैं. दुखद है कि बाहरी दखल से ये संकट और गहरा गए हैं. ये भी अस्थिरता बढ़ा सकते हैं, लेकिन हां, यह काफी हद तक स्थानीय स्तर तक ही सीमित हैं और अब तक किसी महाशक्ति के टकराव का अखाड़ा नहीं बने हैं.
रही बात हिंद-प्रशांत क्षेत्र की, तो यह दीर्घकालिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है. यहां चीन का रुख संयमित होने के साथ-साथ आक्रामक बना हुआ है, जो 'दबाव की रणनीति' को अहमियत देने की उसकी प्राथमिकता को दर्शाता है. चाहे ताइवान जलडमरूमध्य हो या दक्षिण चीन सागर, बीजिंग सैन्य संघर्ष को जन्म देने चाली सीमाओं तक जाकर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को परखने में जुटा है.

ऐसा नहीं है कि इन भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के आपस में जुड़े होने की बात इसलिए कही जाती है, क्योंकि इनमें गहरा समन्वय है, बल्कि सह-संबंध वह कारण है, जो इन्हें एक-दूसरे से जोड़ता है. दरअसल, पश्चिम एशिया में यदि पश्चिमी देश व्यस्त जाते हैं, तो रूस को लाभ मिलेगा. यहां चीन परखने और पड़ताल करने में जुटा है, जबकि ईरान को भौगोलिक स्थिति का फायदा मिलता है. सच यही है कि 20वीं सदी में जिस तरह के गठबंधन थे, देशों के वे रिश्ते आज नहीं दिखते. इतना ही नहीं, आज को बहुध्रुवीयता लचीली और बेहद अवसरवादी है जिसमें 'गठबंधन वाली राजनीति' का स्पष्ट अभाव है. ऐसे में, खतरा बढ़ गया है और उस मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है, जहां तीसरे विश्व युद्ध को लेकर आशंकाओं के गहराने की बात कही जाती है.

हाल के वर्षों में अर्थव्यवस्था को लेकर एक-दूसरे देशों पर निर्भरता कम हुई है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और वित्तीय व्यवस्थाओं पर हमले से तनाव अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है. पश्चिम एशिया में अभी यही हो रहा है. होर्मुज जलमार्ग ही नहीं, कई दूसरे समुद्री रास्तों पर भी रुकावटें बनी हुई हैं, जिनसे तमाम देशों में नाराजगी बढ़ती दिख रही है.

कहने के लिए युद्ध‌ को बढ़ाने पर संरचनात्मक प्रतिबंध अब भी बने हुए हैं. वैश्विक संस्थाएं इन प्रयासों में जुटी हैं कि तनाव इस सीमा तक न बढ़ सकें, जहां से लौटना असंभव हो जाए. इतना ही नहीं, परमाणु शक्ति भी महाशक्तियों को एक-दूसरे के खिलाफ कड़े कदम उठाने से रोकती है, मगर सच यह भी है कि अर्थिकी पर चोट किसी को भी भड़का सकती है. हाल के वर्षों में अर्थव्यवस्था को लेकर एक-दूसरे देशों पर निर्भरता कम हुई है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और वित्तीय व्यवस्थाओं पर हमले से तनाव अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है. पश्चिम एशिया में अभी यही हो रहा है. होर्मुज जलमार्ग ही नहीं, कई दूसरे समुद्री रास्तों पर भी रुकावटें बनी हुई हैं, जिनसे तमाम देशों में नाराजगी बढ़ती दिख रही है. ऊर्जा बाजार में दिख रही बाधाओं ने यह बता दिया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था किस हद तक नाजुक हो चुकी है.

कूटनीति और रणनीति की ज़रूरत 

निरंतर संघर्ष और सीमित तनाव का जो संयोजन अभी विश्व में दिख रहा है, उसने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि टकराव कभी भी बड़ा रूप ले सकता है. यह ऐसा संक्रमण-काल है, जिसमें अनिश्चितता, गलत अनुमान के जोखिम और कमजोर पड़ते मापदंड सुर्खियों में हैं. इसलिए, हम न तो अति-आत्मविश्वास में पड़ें है और न ही बेवजह घबराएं. दुनिया किसी विश्व युद्ध की और बढ़ती बेशक न दिख रही हो, लेकिन यह उससे पूरी तरह से सुरक्षित भी नहीं है. ऐसे में, हम प्रतिस्पर्धी को इस तरह संभालें कि यह किसी भयानक तबाही में तब्दील न हो सके. और ऐसा, निरंतर कूटनीति, भरोसेमंद समाधान और इस समझ के जरिये संभव है कि आज की बिखरी हुई व्यवस्था में संयम बरतना कमजोरी की निशानी नहीं, बल्कि रणनीतिक समझदारी का प्रतीक है. दुयोंग से इस समझ की कमी दिख रही है.

भविष्य में किस मार्ग पर हम बढ़ेंगे, यह आज नहीं कहा जा सकता. इसे तो राजनेताओं, संस्थाओं और समाजों के फैसलों से आकार दिया जाएगा. मगर हकीकत यही है कि अतिशयोक्ति या इनकार के बजाय मौजूदा वक्त के निष्पक्ष और यथार्थवादी मूल्यांकन से ही भू-राजनीतिक उथल-पुथल के इस दौर में आगे बढ़ने का सबसे भरोसेमंद रास्ता निकल सकेगा.


यह लेख हिंदुस्तान में प्रकाशित हो चुका है. 

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