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अभी कुछ दिन पहले ही अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया में आठ लड़ाईयां खत्म करने का दावा कर रहे थे, उन्होंने यह भी कहा था की राष्ट्रपति बनते ही रूस-युक्रेन युद्ध रुकवा देंगे, पर अब बाज़ी पलट गयी है. वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप शायद एक शुरुआत भर है. आशंका है जगह जगह जंग के हालत बनेंगे.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया में तनाव बढ़ाते चले जा रहे हैं. उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतिक टीम (एनएसएस) ने पश्चिमी गोलार्ध में 'हड़पों और विस्तार करो' लक्ष्य का एलान किया, तब दुनिया ने शायद यह सोचा नहीं होगा कि यह एक गंभीर और तेजी से फैलने वाली बात हो जाएगी. वेनेजुएला के बारे में ट्रंप ने घोषित अमेरिकी रणनीति को राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा करने के लिए 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व' के जरिए नाटकीय ढंग से पलट दिया है.
ट्रंप हफ्तों से वेनेजुएला और मादुरो पर नजरें गड़ाए हुए थे. पहले उन्होंने राजधानी कराकस के पास अमेरिका का सबसे बड़ा नौसैनिक बेड़ा तैनात किया और सीआईए को वहां हत्याकांड मचाने की इजाजत दी. ट्रंप की इस कार्रवाई ने अमेरिका के अंदर और बाहर, दोनों जगह कई चिंताएं पैदा कर दी हैं. वेनेजुएला में इस ऑपरेशन की वैधता को लेकर सवाल उठ रहे हैं और दुनिया दो गुटों में बंट गई है. अमेरिका के अंदर की बात करें, तो कांग्रेस में जल्द ही प्रमुख संवैधानिक और निगरानी सवालों पर बहस हो सकती है, क्योंकि वहां के सांसद बंटे हुए दिख रहे हैं. अमेरिका की विदेश रणनीति पर अब तक हावी रहा मोनरो सिद्धांत ढलता लग रहा है और उसकी जगह एक नए ट्रंप सिद्धांत के हावी होने के काले बादल मंडरा रहे हैं. यह नया सिद्धांत दुनिया भर में अमेरिकी प्रभाव को फिर से परिभाषित कर सकता है. इस दिशा में निकोलस मादुरो को हटाना और जेल में डालना अमेरिकी सैन्य शक्ति का नया प्रदर्शन है.
अमेरिका ने एक विशाल बेड़ा इकट्ठा किया और बिना किसी अमेरिकी सैनिक की जान गंवाए वेनेजुएला में अपना लक्ष्य हासिल कर लिया. 1823 में राष्ट्रपति जेम्स मोनरो द्वारा स्थापित सिद्धांत की जगह ट्रंप ने एक अपना 'डॉनरो सिद्धांत' चलाया, जिसमें अन्य महाशक्तियों को पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका के प्रभाव वाले क्षेत्र में दखल न देने की चेतावनी दी गई. ट्रंप ने मार-ए-लागो में कहा, मोनरो सिद्धांत एक बड़ी बात है, लेकिन हमने इसे बहुत पीछे छोड़ दिया है. हमारी नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के तहत, पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी प्रभुत्व पर फिर कभी सवाल नहीं उठाया जाएगा. उन्होंने कहा कि कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो को अपनी जान बचानी पड़ेगी और यह भी संकेत दिया कि वह मेक्सिको के साथ भी कुछ करेंगे. क्यूबा भी निस्संदेह अमेरिकी एजेंडे में है, जिसे रूबियो संचालित कर रहे हैं.
वेनेजुएला के बारे में ट्रंप ने घोषित अमेरिकी रणनीति को राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा करने के लिए 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व' के जरिए नाटकीय ढंग से पलट दिया है.
ट्रंप की नीयत साफ तौर पर सामने आ गई है कि दूसरे देशों की खनिज संपदा पर उनकी गिद्ध-दृष्टि है. वह पहले ही यूक्रेन के प्राकृतिक संसाधनों पर गिद्ध-दृष्टि डाल चुके हैं और उन्होंने वेनेजुएला के विशाल तेल भंडारों पर नियंत्रण की अपनी इच्छा को भी नहीं छिपाया है. उनकी इस इच्छा से ग्रीनलैंड और डेनमार्क में यह डर और गहरा हो जाएगा कि ट्रंप अपने उत्तर के देशों के साथ-साथ दक्षिण के देशों पर भी नजरें गड़ाएंगे. अमेरिका ने ग्रीनलैंड को अपने देश में मिला लेने की अपनी इच्छा नहीं छोड़ी है. आर्कटिक में उसकी रणनीतिक स्थिति के साथ-साथ उन प्राकृतिक संसाधनों पर नजर है, जो अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ पिघलने से ज्यादा सुलभ होने लगे हैं
ऑपरेशन मादुरो से इस वैश्विक सिद्धांत पर करारा प्रहार हुआ है कि दुनिया को चलाने का सबसे अच्छा तरीका अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना है. ट्रंप उन कानूनों को नजरअंदाज कर सकते हैं, जो उन्हें पसंद नहीं हैं. वैश्विक कानून के सिद्धांत का समर्थन करने वाले अमेरिका के ब्रिटेन जैसे प्रमुख यूरोपीय सहयोगी प्रधानमंत्री कीर स्टारमर प्रतिक्रिया देने में बगलें झांक रहे हैं. वे एक ओर, अंतरराष्ट्रीय कानून के शासन सिद्धांत का समर्थन करते हैं, तो दूसरी ओर, ट्रंप को भी नाराज नहीं करना चाहते हैं, हालांकि, वह साफ-साफ यह भी नहीं कह पा रहे हैं कि यह मादुरो ऑपरेशन संयुक्त राष्ट्र चार्टर या सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है.
अमेरिका की चौधराहट: निशाने पर कई देश - विगत छह दशक में देखें, तो अमेरिका ने पांच बार ही युद्ध की औपचारिक घोषणा की है, जबकि वह दुनिया में दस से ज्यादा देशों में सीधी और बड़ी सैन्य कार्रवाई कर चुका है. छोटे हस्तक्षेपों की सूची बहुत लंबी है और उसका परोक्ष हस्तक्षेप तो शायद दुनिया के तमाम संघर्षों में नजर आ जाता है. वेनेजुएला के बाद उसकी नजर क्यूबा, कोलंबिया, ग्रीनलैंड पर है. अभी कुछ ही दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति अपने शांति प्रयासों के लिए नोबेल सम्मान मांग रहे थे, लेकिन अब एक साथ अनेक देशों को धमकाते हुए अशांति में योगदान देने लगे हैं.
रूस की महत्वाकांक्षा : यूक्रेन पर शिकंजे की कोशिश: रूस की साम्राज्यवादी मानसिकता बीते एक दशक से सामने आती रही है. फरवरी 2014 में रूस और यूक्रेन के बीच खींचतान की शुरुआत हुई थी और फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर सीधे हमला बोल दिया. इस हमले में हजारों लोग मारे जा चुके हैं. यूक्रेन के अनेक इलाकों पर रूस का पहले भी कब्जा था और अब रूस अपने इलाके के विस्तार में लगा है. यूक्रेन को भड़काने में अमेरिका, नाटो और यूरोपीय देशों का बड़ा हाथ रहा है. अमेरिका अब यूक्रेन की ज्यादा मदद नहीं कर रहा है, इससे भी रूस की महत्वाकांक्षा बढ़ती जा रही है.
चीन की आक्रामकता-करीबी देशों पर ललचाई निगाह: चीन की वाम सरकार के साम्राज्यवादी इरादे किसी से छिपे नहीं हैं. तिब्बत पर कब्जे से ताइवान को कब्जाने के इरादे तक, चीन की नीतियां दुनिया के अनेक देशों को चिंता में डाल रही हैं. चीन भारत की ओर भी अपनी सीमा के विस्तार का मंसूबा रखता है और तनाव बढ़ाता रहता है. चीन का आधिकारिक मत है कि ताइवान चीन का अभिन्न अंग है और पुनर्मिलन अपरिहार्य है. बीजिंग ने इस लक्ष्य को पाने के लिए सैन्य बल के प्रयोग से इनकार नहीं किया है. चीन भी अमेरिका की तरह ही वैश्विक कानूनों को नहीं मान रहा है.
दहशत फैलाती कट्टरता- देशों में सांप्रदायिकता का जहर: ईरान तनाव का एक बड़ा कारण बना हुआ है. फलस्तीन से पाकिस्तान तक, सांप्रदायिक कट्टरता लगातार खतरे पैदा कर रही है. ईरान आतंकी संगठन हमास की मदद करता रहा है. अमेरिका के साथ भी उसके रिश्ते तनावपूर्ण हैं. हालांकि, ईरान में हालात बिगड़ रहे है, आशंका जताई जा रही है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई अपने शासन के पतन की स्थिति में मॉस्को भाग जाएंगे. आफ्रीका और लातीन अमेरिका के अनेक देशों में तरह-तरह की कट्टरता को बढ़ावा मिल रहा है.
और तमाशबीन संयुक्त राष्ट्र, सिर्फ नसीहत: दुनिया में जगह-जगह युद्ध के हालात हैं और 80 साल का हो चुका संयुक्त राष्ट्र केवल मौखिक बयानबाजी तक सिमटता जा रहा है. अमेरिका, चीन और रूस जैसे वीटो पावर वाले देश संयुक्त राष्ट्र की बातों पर कान नहीं दे रहे हैं. पिछले सप्ताहांत वेनेजुएला की घटना, रूस-यूक्रेन युद्ध तथा गाजा में जारी मानवीय संकट के सामने संयुक्त राष्ट्र लाचार हो गया है. सवाल उठ रहे हैं कि यदि संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के अपने पहले वादे को पूरा नहीं कर सकता, तो क्या उसका कोई भविष्य है?
ट्रंप के दुस्साहस ने इस बात को पुष्ट किया है कि बल का प्रयोग वह केंद्रीय तंत्र बना हुआ है, जिसके माध्यम से देश एक-दूसरे के साथ अपने संबंधों की शर्तों को परिभाषित करते हैं.
चीन ने यद्यपि अमेरिकी कार्रवाई की निंदा करते हुए कहा है कि अमेरिका की दबंगई से अंतरराष्ट्रीय कानून व वेनेजुएला की संप्रभुता का गंभीर उल्लंघन हुआ है और लैटिन अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्र में शांति व सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है. अमेरिका को दूसरे देशों की संप्रभुता और सुरक्षा का उल्लंघन करना बंद कर देना चाहिए. हालांकि, वह अमेरिकी कार्रवाई में अपने लिए एक अवसर देख रहा है. वह ताइवान को अपना बागी प्रांत मानता है और यह घोषणा कर चुका है कि इसे बीजिंग के नियंत्रण में वापस लाना उसकी राष्ट्रीय प्राथमिकता है.
ट्रंप ने कोलंबिया और ईरान के खिलाफ कड़ी चेतावनी जारी की है और कार्रवाई के संकेत दिए हैं. बल प्रयोग की यह बढ़ती प्रवृत्ति वैश्विक समुदाय के लिए ऐसी आशंकाओं को बहुत चिंताजनक बनाती है. ईरान में, इस्लामिक शासन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन जारी रहने से पश्चिम एशिया में नए सिरे से सैन्य कार्रवाई की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, भले ही ट्रंप व्यापार कनेक्टिविटी फिर से शुरू करने और अब्राहम समझौते के दूसरे चरण को फिर से शुरू करने का संकेत दे रहे हों. ईरान के क्षेत्रीय सहयोगी कमजोर हो गए हैं और गाजा की स्थिति अनसुलझी है. ऐसे में, यह क्षेत्र वॉशिंगटन में बैठे कुछ लोगों को अमेरिकी हस्तक्षेप के लिए सही मौका लग सकता है.
कूटनीति सैन्य बल से ही तय होती है. बल का प्रयोग अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांत और व्यवहार, दोनों का अभिन्न अंग रहा है, जो वैश्विक व्यवस्था की अराजक प्रकृति और देशों की सुरक्षा, शक्ति और प्रभाव की लगातार खोज में निहित है. भले ही वैश्विक संस्थाओं और कानूनी ढांचों ने हिंसा को नियंत्रित करने की अपनी महत्वाकांक्षा का विस्तार किया है, फिर भी बल सरकारों के निर्णायक साधन के रूप में काम करता रहता है. देश इस पर न केवल मुख्य हितों की रक्षा करने और संभावित विरोधियों को रोकने के लिए, बल्कि रणनीतिक माहौल को सक्रिय रूप से आकार देने के लिए भी निर्भर रहते हैं. इस अर्थ में बल का प्रयोग जबरदस्ती और दबाव के साधन के रूप में विशेष महत्व रखता है, जो समकालीन भू-राजनीति में इसकी स्थायी प्रासंगिकता को रेखांकित करता है.
ट्रंप के दुस्साहस ने इस बात को पुष्ट किया है कि बल का प्रयोग वह केंद्रीय तंत्र बना हुआ है, जिसके माध्यम से देश एक-दूसरे के साथ अपने संबंधों की शर्तों को परिभाषित करते हैं. इस रणनीति में बल प्रयोग पर निर्भरता बढ़ने की संभावना है, क्योंकि इससे रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज होती है और विकसित हो रही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में बल प्रयोग पर नियंत्रण कमजोर पड़ता जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र की कमजोरी दुनिया पर भारी पड़ने वाली है, क्योंकि अमेरिका ने जो नया दौर शुरू किया है, वह शायद जल्दी खत्म नहीं होगा.
हर्ष पंत ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के प्रमुख हैं.
यह लेख हिंदुस्तान अखबार में प्रकाशित हो चुका है
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Professor Harsh V. Pant is Vice President - ORF and Studies at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with ...
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