मिडिल ईस्ट के इस संघर्ष में नुकसान सिर्फ चीन का नहीं बल्कि भारत समेत एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर ज्यादा पड़ सकता है. जानें क्यों, तेल आपूर्ति, खाड़ी में बसे लाखों भारतीयों और समुद्री व्यापारिक रास्तों पर बढ़ता खतरा भारत के लिए बड़ी चिंता बन सकता है.
मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष के संदर्भ में चीन की भूमिका पर लगातार चर्चा हो रही है. कई विशेषज्ञों का तर्क है कि इस संघर्ष में चीन एक महत्वपूर्ण कारक है और उसका सबसे बड़ा नुकसान हो रहा है. वे कहते हैं कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने, ईरानी तेल की आपूर्ति रुकने और चीन के निवेश के अवमूल्यन जैसे परिणाम चीन के लिए गंभीर झटका हैं. इसके अलावा, आलोचकों का दावा है कि चीन द्वारा उपलब्ध कराए गए सैन्य उपकरण, विशेष रूप से YLC-8 श्रृंखला के वायु रक्षा रडार-अमेरिका और इज़राइल के हमलों के सामने बुरी तरह विफल रहे लेकिन यह कथा तथ्यात्मक रूप से गलत है और क्षेत्रीय दांव-पेंच का गलत आकलन करती है. वास्तव में, इस संघर्ष से प्रभावित देशों में चीन शायद सबसे कम प्रभावित है और उसका दांव भी सीमित है. इसके विपरीत भारत, दक्षिण कोरिया और जापान जैसी प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाएँ इस संघर्ष का प्रत्यक्ष और भारी बोझ झेल रही हैं.
आलोचकों का दावा है कि चीन द्वारा उपलब्ध कराए गए सैन्य उपकरण, विशेष रूप से YLC-8 श्रृंखला के वायु रक्षा रडार-अमेरिका और इज़राइल के हमलों के सामने बुरी तरह विफल रहे लेकिन यह कथा तथ्यात्मक रूप से गलत है और क्षेत्रीय दांव-पेंच का गलत आकलन करती है. वास्तव में, इस संघर्ष से प्रभावित देशों में चीन शायद सबसे कम प्रभावित है और उसका दांव भी सीमित है.
हथियारों के हस्तांतरण के संदर्भ में, अटकलों को छोड़कर इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि बीजिंग ने तेहरान को बड़े वायु रक्षा रडार-विशेषकर YLC-8 श्रृंखला-की आपूर्ति की है. जनवरी 2026 में यह दावा भी किया गया कि चीनी Y-20 सैन्य परिवहन विमान इन रडारों को ईरान लेकर गए, लेकिन यह केवल अनुमान है. इस आकार के प्लेटफॉर्म को छिपाना कठिन होता है और उनकी तैनाती आमतौर पर उपग्रह चित्रों में दिखाई दे जाती है, जैसा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देखा गया था. 2007 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1747 के तहत ईरान पर प्रतिबंध लगने के बाद संबंध बदल गया. चीन ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया था. इसके बाद दोनों देशों के बीच खुला हथियार व्यापार लगभग रुक गया और पहले से किए गए अनुबंधों की आपूर्ति 2015 तक पूरी होकर समाप्त हो गई.
ड्रोन के मामले में भी स्थिति अलग है. 2022 में यूक्रेन में पकड़े गए शाहेद ड्रोन की जांच में पाया गया कि उनके लगभग 80 प्रतिशत पुर्जे पश्चिमी कंपनियों-जैसे टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स-से अवैध तस्करी के माध्यम से आए थे. चीन से केवल इंजन और वोल्टेज कन्वर्टर प्राप्त हुए थे. वास्तव में ईरान का ड्रोन उद्योग काफी हद तक स्वदेशी है, जिसने कब्जे में आए ड्रोन-जैसे एमआईएम स्ट्रीकर, स्कैनईगल और RQ-170-की रिवर्स इंजीनियरिंग से बहुत लाभ उठाया है. इसके अलावा तेहरान के दबाव के बावजूद चीन ने कोई प्रमुख लड़ाकू विमान ईरान को नहीं दिया, क्योंकि वह क्षेत्र के अरब देशों की संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखता है.
हालाँकि चीन ने BeiDou-3 उपग्रह प्रणाली के माध्यम से कुछ सहायता अवश्य दी है. 2015 में ईरान में ग्राउंड-रेफरेंस सिस्टम और अंतरिक्ष डेटा संग्रह केंद्र स्थापित करने के लिए एक समझौता हुआ था, जिसे 2021 में 25 वर्षीय समझौते के तहत औपचारिक रूप दिया गया. इससे ईरान को BeiDou के एन्क्रिप्टेड, उच्च-सटीकता वाले सैन्य संकेतों तक पहुँच मिली. जून 2025 में हुए 12-दिवसीय युद्ध के दौरान ईरान में व्यापक GPS जामिंग हुई, जिससे लगभग 1,000 नागरिक और सैन्य जहाज, कृषि प्रणालियाँ और महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक नेटवर्क प्रभावित हुए. इसके बाद 23 जून को ईरान ने पूरी तरह BeiDou प्रणाली पर स्थानांतरण कर दिया और नागरिक व सैन्य उपयोग के लिए GPS बंद कर दिया.
चीन की दूसरी सहायता मिज़ारविज़न नामक बीजिंग स्थित उपग्रह खुफिया कंपनी के माध्यम से दिखाई देती है. यह कंपनी सोशल मीडिया पर मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों-जैसे नौसेना के जहाजों, ईंधन भरने वाले विमानों और मिसाइल रक्षा प्रणालियों-की लगभग वास्तविक समय की निगरानी संबंधी जानकारी और चित्र सार्वजनिक कर रही है. ईरान पर हमले वाले दिन इस कंपनी ने दक्षिणी इज़राइल के ओव्दा एयरबेस पर तैनात 11 एफ-22 लड़ाकू विमानों की तस्वीरें भी जारी की थीं. यह कंपनी औपचारिक रूप से निजी है, लेकिन यह एक ‘ग्रे ज़ोन’ में काम करती है और चीन की खुफिया क्षमताओं की अप्रत्यक्ष झलक देती है. इसका परिणाम यह है कि युद्ध का पारंपरिक ‘फॉग ऑफ वॉर’ धीरे-धीरे ‘ग्लास बैटलफील्ड’ में बदल रहा है, जहां सैन्य गतिविधियों को लगभग वास्तविक समय में ट्रैक और विश्लेषित किया जा सकता है.
रूस से आयात घटने के बाद यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से आपूर्ति बाधित होती है या सऊदी अरब, इराक, कतर और कुवैत जैसे उत्पादकों का निर्यात रुकता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव पड़ सकता है.
एक अन्य आम दावा यह है कि यह युद्ध चीन की ऊर्जा सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा. लेकिन उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि इसका प्रभाव सीमित है. चीन वास्तव में ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और लगभग 80 प्रतिशत तेल अप्रत्यक्ष मार्गों से खरीदता है. फिर भी चीन के कुल कच्चे तेल आयात में ईरानी तेल की हिस्सेदारी केवल लगभग 12–15 प्रतिशत है.
इसके अलावा चीन ने रूस, अंगोला, ब्राज़ील, सऊदी अरब और अफ्रीका व लैटिन अमेरिका के अन्य उत्पादकों से ऊर्जा आयात में विविधता ला ली है. इसलिए मध्य पूर्व में अस्थिरता कीमतों और समुद्री मार्गों को प्रभावित कर सकती है. भारत के लिए 2025 में लगभग 130 अरब डॉलर की वार्षिक प्रेषण राशि का करीब 40 प्रतिशत केवल खाड़ी देशों से आया. इसके अलावा लगभग एक करोड़ भारतीय नागरिक इस क्षेत्र में रहते और काम करते हैं, इसलिए यदि संघर्ष बढ़ता है तो बड़े पैमाने पर निकासी एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती बन सकती है.
ऊर्जा के मामले में भी भारत की निर्भरता खाड़ी के कच्चे तेल पर काफी अधिक है. रूस से आयात घटने के बाद यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से आपूर्ति बाधित होती है या सऊदी अरब, इराक, कतर और कुवैत जैसे उत्पादकों का निर्यात रुकता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव पड़ सकता है. इसके अतिरिक्त आईरिस Dena जहाज के डूबने की घटना यह दिखाती है कि यह संघर्ष कितनी तेजी से भारतीय हितों के करीब पहुँच रहा है और अप्रत्याशित रूप से फैल सकता है. कहा जा सकता है कि इस संघर्ष का वास्तविक बोझ चीन पर नहीं, बल्कि भारत और अन्य प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर अधिक पड़ रहा है.
यह लेख मूल रूप से द वीक में प्रकाशित हुआ था.
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Atul Kumar is a Fellow in Strategic Studies Programme at ORF. His research focuses on national security issues in Asia, China's expeditionary military capabilities, military ...
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