अमेरिका-ईरान का दो हफ्ते का युद्धविराम असली समाधान नहीं बल्कि बढ़ते टकराव को रोकने के लिए लिया गया एक अस्थायी “ब्रेक” है. होर्मुज़ जलमार्ग खोलने के बदले हमले रुके हैं लेकिन परमाणु और क्षेत्रीय विवाद अब भी जस के तस हैं. जानिए, क्या यह शांति की शुरुआत है या अगले टकराव की तैयारी?
दो सप्ताह का अमेरिका-ईरान युद्धविराम मौजूदा संकट का समाधान कम और एक तीव्र संघर्ष का सुव्यवस्थित विराम अधिक है. फरवरी 2026 में ईरान पर अमेरिका और इज़रायल के हमलों से शुरू हुआ यह संघर्ष अब तनाव घटाने वाले नाजुक चरण में प्रवेश कर चुका है, जिसकी मुख्य वज़ह कूटनीतिक अवसरों के साथ-साथ रणनीतिक आवश्यकता है. देखा जाए, तो यह समझौता एक सौदे पर आधारित है- ईरान द्वारा होर्मुज़ जलमार्ग को तुरंत खोलने के बदले अमेरिकी (और इज़रायली) हमले रोक दिए जाएंगे. होर्मुज़ वैश्विक ऊर्जा आवागमन का एक महत्वपूर्ण रास्ता है, जिसे तेहरान ने बंद कर दिया था. इससे तेल बाज़ार में उथल-पुथल मच गई थी.
समझौते की रूपरेखा भी इसकी अस्थायी प्रकृति की तरफ़ संकेत करती है. दो हफ़्ते का वक़्त अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि टिकाऊ समाधान तलाशने का एक ‘कूटनीतिक ठहराव’ है. होर्मुज़ से सुरक्षित और अबाध आवागमन सुनिश्चित करने की ईरान की प्रतिबद्धता- जो उसकी सैन्य कार्रवाई और ओमान के साथ टोल के संभावित बंटवारे से जुड़ी हुई है- अमेरिका के उस फ़ैसले की तरह है, जिसमें वाशिंगटन ने अपने हितों की रक्षा का अधिकार बनाए रखते हुए आक्रामक अभियानों को रोकने का एलान किया है. यानी, यह संघर्ष का समाधान नहीं, बल्कि संकट का प्रबंधन है.
देखा जाए, तो यह समझौता एक सौदे पर आधारित है- ईरान द्वारा होर्मुज़ जलमार्ग को तुरंत खोलने के बदले अमेरिकी हमले रोक दिए जाएंगे. होर्मुज़ वैश्विक ऊर्जा आवागमन का एक महत्वपूर्ण रास्ता है, जिसे तेहरान ने बंद कर दिया था. इससे तेल बाज़ार में उथल-पुथल मच गई थी.
हालांकि, दोनों पक्षों के बुनियादी मतभेद अब भी बने हुए है. ईरान का 10 सूत्री प्रस्ताव, जिसमें प्रतिबंधों में राहत और मुआवज़े से लेकर उसके परमाणु अधिकारों की मान्यता और अमेरिकी सेना की वापसी तक की मांगें शामिल हैं, वाशिंगटन के उद्देश्य से बिल्कुल उलट है, क्योंकि अमेरिका कड़े परमाणु प्रतिबंध लगाने, अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम को सौंपने, प्रॉक्सी नेटवर्क पर अंकुश लगाने और इज़रायल की वैधता को मानने पर ज़ोर देता है. ये कोई हल्के मतभेद नहीं हैं. इनसे क्षेत्रीय व्यवस्था प्रभावित होती है, जिसे दोनों पक्ष अपने-अपने हित में करना चाहते हैं. इज़रायल का रुख़ मामले को और जटिल बना देता है, क्योंकि वह ईरान के साथ युद्धविराम का समर्थन तो करता है, लेकिन हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ अभियान जारी रखना चाहता है.
वाशिंगटन और तेहरान, दोनों ने इस विराम को अपनी-अपनी जीत बताने की कोशिश की है, जबकि यह बेहद नाजुक है, क्योंकि युद्धविराम की घोषणा के बाद भी शुरू-शुरू में इसके उल्लंघन की ख़बरें आती रहीं. वास्तव में, यह सीजफ़ायर आपसी अविश्वास पर आधारित है, न कि आपसी विश्वास पर.
इसे पूरे घटनाक्रम से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अंतरराष्ट्रीय संकटों को लेकर अपनाई जाने वाली रणनीतिक शैली का पता भी चलता है. वह आक्रामक रणनीति पर विश्वास करते हैं, जहां तनाव बढ़ाने का मक़सद विरोधियों को बातचीत के लिए विवश करना है. एक स्पष्ट समय-सीमा तय करके- जिसमें व्यापक सैन्य कार्रवाई की धमकी भी दी गई थी- ट्रंप ने तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश की. ऐसा करके, उन्होंने अपने सख़्त सैन्य विकल्पों का प्रयोग किए बिना ही, तुरंत विनाशकारी स्थिति को रोकने में सफलता हासिल कर ली. ख़तरे के बेहद करीब पहुंचने के बाद उससे पीछे हटने की यह क्षमता ही उनके ‘ताक़त के जरिये शांति’ वाले सिद्धांत की बुनियाद है.
सहयोगी देशों को भले ही वाशिंगटन द्वारा निर्णायक कदम उठाने के इरादे से तसल्ली मिल रही हो, लेकिन वे अब इस बात को लेकर सावधान होंगे कि संकट समाधान के अमेरिकी रवैये से कितनी अस्थिरता फैलती है. वहीं, विरोधी देश इन सीमाओं को आजमाने के लिए ज़्यादा उत्सुक हो सकते हैं. वे समझ गए होंगे कि दबाव पड़ने पर बातचीत के माध्यम से तनाव कम किया जा सकता है.
होर्मुज़ के फिर से खुलने और ईरान के बातचीत की मेज़ पर लौटने को ट्रंप अपनी सफलता बता सकते हैं. रणनीतिक नज़र से देखें, तो इन घटनाक्रमों से उन्हें यह कहने का मौका मिलता है कि दबावपूर्ण कूटनीति को यदि भरोसेमंद सैन्य ताक़त और मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति का साथ मिले, तो नतीजे अपने हक़ में किए जा सकते हैं. वैश्विक बाज़ार से मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया ने भी उनकी इस धारणा को मज़बूत किया है.
फिर भी, इस सफलता को इसके गहरे और दीर्घकालिक नतीजों के संदर्भ में देखना ज़रूरी है. अमेरिका की घरेलू राजनीति की बात करें, तो ट्रंप तीखे बोलते रहे हैं, जिससे उनके बयानों की बार-बार आलोचना होती रही है. धमकियों के अनुपात और तनाव बढ़ने के ख़तरों को लेकर जताई गई चिंताओं ने न केवल रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स के बीच, बल्कि उनकी अपनी पार्टी के भीतर भी मतभेदों को उजागर किया है. फिर, लंबे समय तक चलने वाले सैन्य अभियानों से अमेरिकी जनता बेरुख़ी दिखाती रही है. इस कारण भी जोखिम भरी इन रणनीतियों की स्थिरता पर सवाल उठने लगे हैं.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके अर्थ और भी ज़्यादा जटिल हैं. अल्टीमेटम और ख़तरे की हद तक जाने की रणनीति भले ही तुरंत काम कर जाए, लेकिन इससे भरोसेमंद और स्थिरता लाने वाले देश के तौर पर अमेरिका की साख़ को नुक़सान पहुंचने का ख़तरा है. सहयोगी देशों को भले ही वाशिंगटन द्वारा निर्णायक कदम उठाने के इरादे से तसल्ली मिल रही हो, लेकिन वे अब इस बात को लेकर सावधान होंगे कि संकट समाधान के अमेरिकी रवैये से कितनी अस्थिरता फैलती है. वहीं, विरोधी देश इन सीमाओं को आजमाने के लिए ज़्यादा उत्सुक हो सकते हैं. वे समझ गए होंगे कि दबाव पड़ने पर बातचीत के माध्यम से तनाव कम किया जा सकता है.
इस अर्थ में, ट्रंप की रणनीति से तुरंत लाभ तो मिलता है, लेकिन भविष्य में कूटनीतिक नुक़सान का ख़तरा भी बना रहता है. यह एक बदलते भू-राजनीतिक माहौल में सामरिक सफलता और व्यवस्थागत स्थिरता के बीच मौजूद तनाव को उजागर करता है.
अब देखना यही है कि यह मौका ज़्यादा टिकाऊ समझौते में बदलता है या फिर टकराव के एक और दौर की शुरुआत होगी? जाहिर है, इस्लामाबाद के नतीजों से इसका जवाब मिलेगा। फिलहाल, युद्धविराम कोई अंतिम समाधान नहीं दिख रहा, यह लंबी रणनीतिक लड़ाई में महज़ अगला कदम है.
इससे भी ज़्यादा बड़ी बात यह है कि संघर्ष के मूल कारणों को सुलझाने में युद्धविराम ज़्यादा कुछ नहीं करता. परमाणु मुद्दा, प्रॉक्सी की भूमिका और प्रतिबंधों का सिलसिला, ये अब भी गंभीर विवाद के विषय बने हुए हैं. ईरान ने संकेत दिया है कि वह इसे अमेरिका दख़लंदाज़ी का सबूत मानता है. इसलिए, दो सप्ताह के इस विराम को एक रणनीतिक ठहराव समझना ही सबसे अच्छा है. यानी, एक ऐसा विराम, जो कूटनीतिक प्रयासों के लिए अवसर तो पैदा करता है, लेकिन उसकी सफलता की गारंटी नहीं देता.
ट्रंप इसे अपनी जीत के तौर पर पेश कर रहे हैं, लेकिन यह गहरे भू-राजनीतिक टकरावों को सुलझाने में ज़ोर-जबर्दस्ती की सीमा का भी संकेत है. अब देखना यही है कि यह मौका ज़्यादा टिकाऊ समझौते में बदलता है या फिर टकराव के एक और दौर की शुरुआत होगी? जाहिर है, इस्लामाबाद के नतीजों से इसका जवाब मिलेगा। फिलहाल, युद्धविराम कोई अंतिम समाधान नहीं दिख रहा, यह लंबी रणनीतिक लड़ाई में महज़ अगला कदम है.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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