अमेरिका की नई राष्ट्रीय रक्षा रणनीति ने कई बातें कही हैं लेकिन जो नहीं कहा गया, वही सबसे ज़्यादा अहम है. क्वॉड की चुप्पी, सहयोगियों पर बढ़ता बोझ और इंडो-पैसिफिक पर नया ज़ोर- ये लेख समझाता है कि भारत के लिए इसका मतलब क्या है और अब किस दिशा में सोचना ज़रूरी हो गया है.
पश्चिमी गोलार्ध की रक्षा और अमेरिकी होमलैंड को सुरक्षित करने पर NSS के ज़ोर से NDS (जो अमेरिकी रक्षा मंत्रालय का मार्गदर्शन करने के लिए है) बहुत अलग नहीं है. मादुरो को पकड़ने और ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने की ट्रंप की लगातार धमकियों में ये स्पष्ट रूप से दिखा. अमेरिका के द्वारा NDS को पश्चिमी गोलार्ध की मज़बूत रक्षा के साथ जोड़ने के निर्णय के पीछे जो भी प्रेरणा हो लेकिन दुनिया में अमेरिकी रक्षा रणनीति को लेकर NDS का संकुचित दृष्टिकोण NSS से मेल खाता है. NDS के तीन पहलू अलग हैं.
पहला, सहयोगियों और साझेदारों के बीच ज़्यादा बोझ बांटना ताकि अमेरिका को दुनिया के सबसे बड़े सुरक्षा देने वाले देश की भूमिका से मुक्त किया जा सके. NDS ये बताने में स्पष्ट है कि सहयोगी देश अमेरिका के लिए बोझ बन गए हैं; इसमें ये कहा गया है कि सहयोगियों को “निर्भर” देश में बदलने के लिए पहले के प्रशासन ज़िम्मेदार हैं. इसे ठीक करने के लिए NDS ये साफ करता है कि सहयोगियों एवं साझेदारों को अपनी रक्षा का ज़्यादा बोझ ख़ुद उठाना चाहिए, विशेष रूप से यूरोप में रूस के ख़िलाफ.
यूरोप से आगे दक्षिण कोरिया को भी इसी तरह (भले ही यूरोप की तरह उसकी कड़ी आलोचना नहीं की गई है) उत्तर कोरिया के किसी भी हमले के ख़िलाफ़ अपनी रक्षा के लिए बोझ का बड़ा हिस्सा उठाने को कहा गया है. पश्चिम एशिया में भी सहयोगियों एवं साझेदारों से कहा गया है कि वो अपनी रक्षा के लिए और कदम उठाएं. यहां ईरान को सबसे बड़े ख़तरे के रूप में देखा जाता है.
अमेरिका के द्वारा NDS को पश्चिमी गोलार्ध की मज़बूत रक्षा के साथ जोड़ने के निर्णय के पीछे जो भी प्रेरणा हो लेकिन दुनिया में अमेरिकी रक्षा रणनीति को लेकर NDS का संकुचित दृष्टिकोण NSS से मेल खाता है. NDS के तीन पहलू अलग हैं.
NDS का दूसरा प्रमुख पहलू “शक्ति के ज़रिए शांति” का इसका तर्क है. ये इंडो-पैसिफिक में ट्रंप प्रशासन की रक्षा रणनीति का मूल आधार है. NDS में इसे और स्पष्ट किया गया है. मूल रूप से “शक्ति के ज़रिए शांति” अमेरिकी सेना को ‘अस्वीकृति’ (डिनायल) के मज़बूत प्रतिरोध के माध्यम से फर्स्ट आईलैंड चेन (FIC)- चीन को रोकने के लिए एक समुद्री सीमा- की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध करती है. इसका अर्थ है विरोधी को अपना लक्ष्य पूरा करने की क्षमता से वंचित करना. इस तरह NDS सहयोगियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करती है कि वो अपना संसाधन लगाएं जो इंडो-पैसिफिक में सामूहिक सुरक्षा में बढ़ोतरी करेगा.
NDS के अनुसार अस्वीकृति आधारित रक्षा बदले की धमकियों की तुलना में आक्रामकता को अधिक असरदार ढंग से रोक सकती है. इसका उद्देश्य पूरी तरह टकराव का सामना किए बगैर चीन को रोकना है. ये चीन के प्रति सम्मान का संकेत देता है और शायद इसका कारण अमेरिका पर उसकी व्यापारिक बढ़त है.
तीसरा, NDS के प्रमुख उद्देश्यों में से एक अमेरिका के रक्षा उद्योग आधार (DIB) को “सुपरचार्ज” करना है ताकि अमेरिकी सैन्य ताकत को मज़बूत किया जा सके. राष्ट्रीय संसाधनों को बढ़ाने एवं जुटाने और DIB को मज़बूत करने की ये प्रतिबद्धता नई नहीं है. पहले के प्रशासनों ने भी ऐसा किया है लेकिन ये दिखाता है कि चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति के सामने रक्षा तकनीक की चुनौतियों से ट्रंप प्रशासन कितना अवगत है.
भारतीय नज़रिए से देखें तो दो प्रमुख बातें पूरी तरह गायब थीं. क्वॉड्रिलैटरल डायलॉग में अमेरिका की भूमिका पर कोई ज़ोर या उसका कोई उल्लेख नहीं था. NSS के विपरीत NDS इंडो-पैसिफिक में चीन की आक्रामकता को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा मुहैया कराने वाले और आधार के रूप में क्वॉड की भूमिका पर चुप है.
मूल रूप से “शक्ति के ज़रिए शांति” अमेरिकी सेना को ‘अस्वीकृति’ (डिनायल) के मज़बूत प्रतिरोध के माध्यम से फर्स्ट आईलैंड चेन (FIC)- चीन को रोकने के लिए एक समुद्री सीमा- की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध करती है. इसका अर्थ है विरोधी को अपना लक्ष्य पूरा करने की क्षमता से वंचित करना.
इस उल्लेखनीय चूक की एक ख़तरनाक व्याख्या ये है कि चीन के साथ अमेरिका आमने-सामने की व्यवस्था की तरफ झुक रहा है. इससे अमेरिका के सहयोगी और साझेदार चीन के दबाव या सीधे आक्रमण के प्रति असुरक्षित हो रहे हैं. हालांकि NDS में क्वॉड को दी गई कम अहमियत इस तथ्य को छिपाती है कि दिसंबर में इंडो-पैसिफिक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क (IPLN) के हिस्से के रूप में इसके चारों साझेदारों ने फील्ड ट्रेनिंग एक्सरसाइज़ का आयोजन किया था.
IPLN का उद्देश्य इंडो-पैसिफिक के देशों को आपात स्थिति में तुरंत एवं समय पर जवाब देने में सक्षम बनाना और सैन्य सहायता मुहैया कराना है. अमेरिका और क्वॉड के प्रत्येक सदस्य (जिनमें भारत शामिल है) के बीच द्विपक्षीय रक्षा भागीदारी लगातार बनी हुई है. फिर भी NSS के विपरीत NDS में क्वॉड का कोई ज़िक्र नहीं है.
NDS में भारत का विशेष रूप से उल्लेख नहीं है. इंडो-पैसिफिक में भारत की भूमिका को लेकर NSS में छोटा सा ज़िक्र है लेकिन NDS स्पष्ट रूप से अमेरिकी होमलैंड और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को प्राथमिकता देती है और यूरेशिया में स्थित सहयोगियों एवं साझेदारों से मांग करती है कि वो उसकी रक्षा की मुख्य ज़िम्मेदारी उठाएं जिसमें अमेरिका की भूमिका ज़्यादा-से-ज़्यादा समर्थन देने वाले देश की हो.
भारत को लंबे समय के हिसाब से सोचने और इंडो-पैसिफिक में नौसैनिक ताकत प्रदर्शित करने के लिए ज़्यादा संसाधन आवंटित करने की आवश्यकता है.
इस हिसाब से NDS इस मामले में सटीक है कि ट्रंप प्रशासन दुनिया भर में अमेरिकी ताकत को किस तरह से तैनात करने की योजना बना रहा है. उसका लक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र यानी इंडो-पैसिफिक में ताकत केंद्रित करना है. ये भारत को अपनी रक्षा क्षमताओं को मज़बूत करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है.
आने वाले बजट में भारत को अपने पिछले बजटीय आवंटनों की तुलना में रक्षा बजट बढ़ाने की आवश्यकता होगी. भले ही NDS इंडो-पैसिफिक को राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानती हो लेकिन भारत सरकार को अमेरिकी प्रतिबद्धता को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए. भारत को लंबे समय के हिसाब से सोचने और इंडो-पैसिफिक (विशेष रूप से मलक्का के पूर्व और पश्चिमी पैसिफिक में) में नौसैनिक ताकत प्रदर्शित करने के लिए ज़्यादा संसाधन आवंटित करने की आवश्यकता है.
ट्रंप के युग में क्षेत्रीय सुरक्षा में योगदान करने की अधिक तत्परता भारत को अमेरिका में एक ऐसे प्रशासन के द्वारा प्रतिकूल कार्रवाई से बचा सकती है जिसने अमेरिकी विदेश नीति की बुनियादी मान्यताओं को ठुकराने की तैयारी दिखाई है.
यह लेख मूल रूप से मिंट में प्रकाशित हुआ था.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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Kartik is a Senior Fellow with the Strategic Studies Programme. He is currently working on issues related to land warfare and armies, especially the India ...
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