Author : Aditya Sharma

Issue BriefsPublished on May 23, 2024
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अंतरराष्ट्रीय कानून में कैसी है गोरखा लड़ाकुओं के हालात: विस्तृत पड़ताल!

  • Aditya Sharma

    ये लेख उन गोरखाओं की स्थिति पर चर्चा करता है, जो नागरिक, लड़ाकुओं और भाड़े के सैनिकों के तौर पर रूस की सेना और वैगनर समूह में शामिल हुए हैं. गोरखा भारत और ब्रिटेन की नियमित सेना का हिस्सा रहे हैं. ऐसे में सवाल ये है कि इन देशों से द्विपक्षीय समझौता किए बिना इन गोरखाओं को रूसी सेना और वैगनर समूह में शामिल होने और संघर्ष में उतरने पर क्या वही दर्जा हासिल होगा जो भारत और ब्रिटेन की सेना में मिलता है. अगर नहीं, तो फिर मौज़ूदा अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था के तहत गोरखाओं की स्थिति क्या होगी? इस लेख में वर्तमान स्थितियों से पैदा हुई सुरक्षा चुनौतियों, गोरखाओं के आंदोलन की पीछे की वज़ह और वैगनर समूह की प्रकृति पर चर्चा की गई है. इसके साथ ही इस मुद्दे पर भी बात की गई है कि वैगनर समूह और गोरखाओं को संबोधित करने के लिए "भाड़े के सैनिक" शब्द उचित क्यों नहीं है. लेखक के मुताबिक गोरखा अब भी सेना का हिस्सा तो हैं लेकिन उन्हें लड़ाकुओं की अलग श्रेणी में डाल दिया गया है.

Attribution:

आदित्य शर्मा अंतरराष्ट्रीय कानून में कैसी है गोरखा लड़ाकुओं की स्थिती: विस्तृत पड़ताल!’ ओआरएफ़ इश्यू ब्रीफ नंबर 685, जनवरी 2024, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन

प्रस्तावना

गोरखा या गुरखा नेपाल के पहाड़ी शहर गोरखा [1] से आने वाली एक लड़ाकू नस्ल है. युद्ध के मैदान में अपनी बहादुरी से इन्होंने युद्ध और शांति के समय काफी सम्मान अर्जित किया है. ऐसे में जब ये ख़बर आई कि गोरखा लोग रूस की सेना[2]  में शामिल हो रहे हैं तो इसने अब तक खुद को इस युद्ध से अलग रखने वाले और 'तटस्थ' देश नेपाल को ही नहीं बल्कि ब्रिटेन और भारत को भी चिंता में डाल दिया. इसकी वजह ये है कि ब्रिटेन और भारत साल 1800 की शुरूआत से ही इन गोरखाओं को अपनी सेना में शामिल करते आ रहे हैं. इससे भी ज़्यादा चिंतित करने वाली बात ये है कि इन गोरखाओं को विवादित माने जाने वाले वैगनर समूह [a],[3] के ज़रिए रूसी सेना में भर्ती किया जा रहा है. इससे ऐसा लग रहा है कि उन्हें नियमित सेना से अलग श्रेणी में रखा जा रहा है. इससे ना सिर्फ इनकी अखंडता पर सवाल खड़े होते हैं बल्कि ये भारतीय उपमहाद्वीप की सामरिक सुरक्षा के लिए चिंता पैदा करने वाली बात है.

ये सही है कि गोरखाओं के रूसी सेना में शामिल होने के कई संभावित कारण हो सकते हैं, खासकर तब जबकि रूस खुद इस सशस्त्र संघर्ष में एक पक्ष है.[4] गोरखाओं ने  200 साल तक ब्रिटिश सेना के साथ कई युद्ध लड़े. इसमें प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध भी शामिल है. उसके बाद से ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी के रूप में उन्हें 14 देशों में तैनात किया गया है. यहां वो शांति स्थापित रखने में, मानवीय सहायता देने में, आतंकवाद विरोधी कार्रवाई में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ड्रग्स के अवैध व्यापार का मुकाबला करने में सहयोग देते हैं.[5] हालांकि, ब्रिटेन की सेना में गोरखाओं का सफर संघर्ष रहित नहीं रहा.

अगस्त 2021 में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने उन वरिष्ठ गोरखाओं के समर्थन में डाउनिंग स्ट्रीट की तरफ मार्च किया, जो समान पेंशन की मांग को लेकर 13 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे थे.[6] ये लोग हर स्तर पर खुद के साथ ब्रिटिश रेजिमेंट की तरह बर्ताव करने की मांग भी कर रहे थे.[7]  ये पहला मौका नहीं था जब गोरखाओं ने अपने साथ किए जा रहे ऐतिहासिक पक्षपात के ख़िलाफ प्रदर्शन किया हो.[8] इससे ये संकेत मिले कि युवा गोरखाओं के लिए अब ब्रिटिश सेना अब उतनी पसंदीदा नहीं रही. हालांकि, इसका ये मतलब नहीं है कि ब्रिटिश सेना में गोरखा शामिल नहीं हो रहे या उन्हें भर्ती नहीं किया जा रहा है.

वहीं अगर बात भारत की करें तो भारत के साथ गोरखाओं का जुड़ाव 1947 में ब्रिटेन, नेपाल और भारत के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते से भी पुराना है. इस जुड़ाव की जड़ें 1809-1814 के बीच महाराज रणजीत सिंह[9] द्वारा की गई भर्तियों तक जाती हैं.[10]  भारत ने ब्रिटेन की तरह गोरखाओं को सेना में कमीशन देने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया. इसका ये असर हुआ कि कई गोरखा भारतीय सेना में वरिष्ठ पदों तक पहुंचे. भारतीय सेना में गोरखाओं के लिए वेतनमान, पेंशन और दूसरी समानताओं को लेकर कभी किसी तरह का विवाद नहीं हुआ. जब नेपाल का रक्षा बजट 420 मिलियन डॉलर हुआ करता था, तब भारतीय सेना से वेतन और पेंशन के तौर पर गोरखा सैनिक नेपाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में 620 मिलियन डॉलर का योगदान करते थे.[11]

लेकिन अब दो कारण ऐसे हैं, जिनकी वजह से भारतीय सेना को लेकर गोरखाओं में पहले जैसी रुचि नहीं रही. पहली वज़ह तो है नेपाल की स्थानीय राजनीति. नेपाल की वामपंथी ताकतें नहीं चाहती कि गोरखा युवा भारतीय सेना में शामिल होकर चीन की सेना के ख़िलाफ तैनात हों.[12] दूसरी वज़ह अग्निपथ योजना से जुड़ी है.[13] अग्निपथ स्कीम की तहत भारत सरकार सेना में भर्ती युवाओं को मुआवज़े के तौर 'सेवा निधि' देकर चार साल बाद घर भेज देती है. गोरखा युवा चाहते हैं कि उन्हें सेना में भर्ती होने के बाद सेवानिवृति के बाद ताउम्र पेंशन मिले. ये उनकी आय का नियमित स्रोत बने. लेकिन अग्निपथ स्कीम के बाद अब पेंशन ख़त्म हो गई है, इसलिए अब भारतीय सेना गोरखा युवाओं के लिए रोज़गार का आकर्षक विकल्प नहीं रही. नेपाल की केपी शर्मा ओली सरकार ने अग्निपथ योजना को चीन के साथ अपनी दूरी कम करने के एक अवसर के तौर पर देखा. चीन ने भी गोरखाओं को लेकर अपनी कड़वाहट कम की है. चीन पहले इन गोरखाओं को "छोटे शैतान" [14]कहता था लेकिन अब वो उन्हें अपनी सेना यानी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में भर्ती कर रहा है.[15]

हालांकि, बिना ठोस आंकड़ों के फिलहाल ये कहना जल्दबाज़ी होगा कि गोरखा भारत और ब्रिटेन में जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उसी वजह से वो रूसी सेना और वैगनर समूह में शामिल हो रहे हैं, लेकिन इस संभावना को ख़ारिज करना भी नासमझी होगा कि बेहतर आय और अवसरों की तलाश में गोरखा अब रूसी सेना और वैगनर समूह में जा रहे हैं.

लेकिन रूस की क्यों? इसका आसान जवाब ये है कि रूस फिलहाल संघर्ष में उलझा है और वो इन गोरखाओं को भर्ती कर रहा है. इस काम के लिए गोरखा उन्हें उपयुक्त लग रहे हैं. हाल में आई एक खोजी रिपोर्ट के मुताबिक एक दर्जन से ज़्यादा नेपाली युवा आवांगार्ड के रूसी सैनिक परिसर और बेलारूस के बारानाविची शहर में प्रशिक्षण ले रहे हैं.[16] ब्रिटेन और भारत के विपरीत रूसी सेना में गोरखा किसी समझौते के तहत सम्मिलत नहीं हो रहे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस में नेपाल के दूतावास ने कहा कि जो भी नेपाली युवा रूस की सेना में शामिल हो रहे हैं, वो निजी स्तर पर ऐसा कर रहे हैं.

नेपाली दूतावास का ये ढीला-ढाला बयान इसलिए भी हैरान करता है क्योंकि कुछ ही महीने पहले नेपाल ने यूक्रेन पर रूस के हमले के ख़िलाफ लाए गए संयुक्त राष्ट्र के निंदा प्रस्ताव का समर्थन किया था और ये मांग की थी कि रूस के यूक्रेन से अपनी सेना हटा लेनी चाहिए. इससे ये संकेत मिले कि अब तक रूस-यूक्रेन युद्ध पर 'तटस्थ' रहने की नीति में नेपाल बदलाव ला रहा है.[17] अगर नेपाल सरकार इस मामले में दख़ल नहीं देती तो हालात और ख़राब हो सकते हैं. इतना ही नहीं इस वक्त नेपाल की बेरोज़गारी दर 11 प्रतिशत से अधिक है.[18] अब नेपाल के अधिकारियों को इस बात की चिंता सता रही है कि नेपाली युवाओं के लिए रूसी सेना में शामिल होना एक आकर्षक विकल्प बना रहेगा और वो इसमें भर्ती होते रहेंगे.[19]

लड़ाके या नागरिक?

ऐतिहासिक रूप से देशों को ही युद्ध के मैदान में असली पक्ष माना जाता है. उन्हीं की सेना को ताकत के इस्तेमाल का वैध रूप माना जाता है.[20]  आज इस स्थिति का बचाव करने के लिए आधुनिक युद्ध की वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ करना होगा. ये बात माननी होगी कि अब देश अपने नागरिकों की सेना के साथ युद्ध में उतरते हैं. ऐसे में ये सवाल खड़ा होता है कि रूसी सेना और वैगनर समूह में शामिल होने वाले और गोरखा जैसे तीसरे देश के नागरिकों की क्या स्थिति होगा. क्या मौज़ूदा हालात में गोरखाओं की स्थिति बदल जाएगी?

नागरिक[21]  और लड़ाकों[22]  के बीच के अंतर पर ही अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों[23] की नींव टिकी है. इसी के आधार पर सामान्य अंतरराष्ट्रीय नियम बनते हैं.[24] सशस्त्र संघर्ष में एक लड़ाके को वैधानिक रूप से सेना के सदस्य के तौर पर परिभाषित किया गया है. अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से एक लड़ाके को उस स्थिति में आपराधिक अभियोजन से छूट मिलती है, अगर उसने युद्ध के किसी नियम या रीति-रिवाज का उल्लंघन ना किया हो. जो सामान्य परिस्थितियों में नागरिक कानून के तहत आ सकते हैं.[25] इस तरह इन लड़ाकों को सीधे युद्ध में शामिल होने की अनुमति मिलती है. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र संघर्ष में युद्धस्थिति में सीधे तौर पर शामिल, नागरिक भी, जो सामान्य स्थिति में संरक्षित वर्ग में शामिल होते हैं, वो भी सीधे हमले की सूरत में असुरक्षित माने जाते हैं. इसलिए अगर गोरखाओं को लड़ाका होने की योग्यता हासिल करनी है, उन्हें लड़ाकों और युद्धबंदियों को मिलने वाले विशेषाधिकार प्राप्त करने हैं तो इसके लिए उन्हें संघर्ष में शामिल किसी एक पक्ष की सेना का सदस्य होना ज़रूरी है.[26] ऐसे में अगर गोरखा रूसी सेना में शामिल होते हैं. युद्ध में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं तो उनके साथ लड़ाके के तौर पर ही बर्ताव किया जाएगा. फिर चाहे वो किसी भी देश के नागरिक हों या फिर नेपाल और रूस के बीच समझौता हो.

जहां तक वैगनर समूह का सवाल है, वो खुद को एक 25,000 सैनिकों की क्षमता वाली निजी सैन्य कंपनी कहती है.[27] इसमें रूसी सेना के कुछ पूर्व वरिष्ठ सैनिक भी शामिल हैं. यहां ये बात समझनी महत्वपूर्ण है कि सभी निजी सैन्य कंपनियां वैगनर समूह की तरह काम नहीं करती. यही बात वैगनर समूह की स्थिति तय करने में अहम भूमिका निभाती है. युद्ध में निजी सेना का इस्तेमाल करना रूस के लिए कोई नई बात नहीं है. सोवियत संघ का ये इतिहास रहा है कि उसने विदेशों में इस तरह की परोक्ष सेना का उपयोग किया है.[28] रूस की आपराधिक संहिता के मुताबिक वहां के नागरिकों को भाड़े के सैनिक के तौर पर काम करने की मंजूरी नहीं है, लेकिन राज्य संचालित उद्यमों को निजी सशस्त्र बल और सुरक्षा फाउंडेशन रखने की अनुमति है.[29] इससे दो सवाल खड़े होते हैं, जो एक-दूसरे से जुड़े हैं. क्या वैगनर समूह सशस्त्र बल के दायरे में आता है और क्या इसके सदस्यों का लड़ाका माना जा सकता है.

पहले सवाल का जवाब सकारात्मक हो सकता है लेकिन सभी निजी सेना और सुरक्षा कंपनियों के मामले में ऐसा नहीं हो सकता. यूक्रेन-रूस युद्ध में वैगनर समूह की सीधी भागीदारी स्पष्ट रूप से दिख रही है, लेकिन रूस ने वैगनर समूह के साथ अपने सीधे संबंधों को कभी स्वीकार नहीं किया. ऐसे में जवाबदेही साबित करने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. लेकिन रूस में तख्त़ापलट की नाकाम कोशिश के बाद दुनिया ने वैगनर समूह के कॉरपोरेट ढांचे में दरारें आती देखी. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को ये बात स्वीकार करनी पड़ी कि वैगनर ग्रुप भले ही निजी कंपनी के तौर पर पंजीकृत हो लेकिन इसे रूस की सरकार से आर्थिक मदद मिलती है.[30] इस कुबूलनामे ने रूस (युद्धरत पक्ष) और वैगनर समूह (निजी सैन्य कंपनी) के बीच संबंध स्थापित करने में अहम भूमिका (भले ही निर्णायक ना हो) निभाई. ऐसा कहने के बाद भी ये समझना ज़रूरी है कि समकालीन अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों में ना सिर्फ देशों की नियमित सेना को बल्कि सभी तरह की संगठित सेनाओं को सशस्त्र बल के तौर पर परिभाषित किया गया है जो युद्धरत पक्ष की तरफ से संघर्ष में शामिल होते हैं.[31]

इस संदर्भ में देखे तो एक निजी ठेकेदार या सेना, जो युद्ध में सीधे शामिल नहीं है, उसे नागरिक माना जाएगा. उसे लड़ाकुओं को मिलने वाले विशेषाधिकर नहीं मिलेंगे.[32] इसलिए ये स्थापित करना ज़रूरी होता है कि निजी सैन्य कंपनी संघर्ष में शामिल एक पक्ष की तरफ से युद्ध में भाग ले रही है. ये निजी सैन्य कंपनियों और उसमें शामिल लड़ाकों की स्थिति को भी दर्शाता है, फिर चाहे वो किसी तीसरे देश के नागरिक ही क्यों ना हों. इस तरह देखा जाए तो हर परिस्थिति कई चीजों पर निर्भर करती है.[33]  यूक्रेन-रूस युद्ध में अब तक जो सबूत मिले हैं, उनके आधार पर ये कहा जा सकता है कि वैगनर समूह रूस की तरफ से इस युद्ध में शामिल है. इसे रूस की अनियमित या परोक्ष सेना माना जा सकता है. ऐसे में इस समूह के जो सदस्य, गोरखा भी, इस युद्ध में सीधे तौर पर शामिल हैं, उन्हें वैध सैनिक लक्ष्य माना जा सकता है और वो युद्धबंदी के दर्जे के हक़दार होंगे.[34]

भाड़े के सैनिक?

आधुनिक हथियारों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल ने युद्धक्षेत्र की कानूनी जटिलताओं को और बढ़ा दिया है. इसके अलावा कानूनी शब्दकोष के उच्च मानदंड, जो युद्धरत पक्षों को कई रियायत मुहैया कराते हैं, भी इसकी वास्तविक प्रासंगिकता और व्यावहारिक उपयोग पर सवाल उठाते हैं. ऐसी ही एक कमी 'भाड़े के सैनिकों' की परिभाषा है. वैगनर समूह को परिभाषित करने के लिए ये एक कानूनी मिथ्या नाम है. किसी भी व्यक्ति को भाड़े का सैनिक तब कहा जा सकता है जब वो छह आवश्यक शर्तों को पूरा करे.

12 अगस्त 1949 के जिनेवा सम्मेलन के अतिरिक्त प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 47(2) और अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र संघर्ष के पीड़ितों के संरक्षण के 8 जून 1977 के अतिरिक्त प्रोटोकॉल-I के हिसाब से उस व्यक्ति को भाड़े का सैनिक कहा जा सकता है (क) जिसे सशस्त्र संघर्ष में भाग लेने के लिए स्थानीय या फिर विदेशी में विशेष रूप से भर्ती किया गया हो (ख) युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होता है. (ग) संघर्ष में भाग लेने के लिए निजी लाभ से प्रेरित हो, संघर्ष में शामिल किसी एक पक्ष द्वारा उसे अपनी सेना में समान रैंक और एक जैसा काम करने वाले लड़ाकों का तुलना में बहुत ज़्यादा आर्थिक मुआवाज़ा देने का वादा किया गया हो (घ) संघर्ष में शामिल दोनों पक्षों में से किसी भी देश का नागरिक ना हो, ना ही संघर्ष में शामिल किसी पक्ष द्वारा नियंत्रित इलाके का नागरिक हो (च) संघर्ष में शामिल पक्ष की सेना का सदस्य ना हो और (छ) किसी ऐसे देश द्वारा नहीं भेजा गया है. जो संघर्ष में पक्ष ना हो और उसके सशस्त्र बल के सदस्य को तौर पर आधिकारिक ड्यूटी पर हो.[35]

जिनेवा सम्मेलन के अतिरिक्त प्रोटोकॉल I के अनुच्छेद 47(1) के मुताबिक जो व्यक्ति उपरोक्त छह शर्तों को पूरा करते हुए भाड़े के सैनिक की योग्यता हासिल करता है उसे अतिरिक्त प्रोटोकॉल I  के अनुच्छेद Article 47(2) के हिसाब से लड़ाका या युद्धबंदी के अधिकार नहीं होंगे.[36]  हालांकि इस बात की संभावना बहुत कम है कि एक निजी सैन्य कंपनी को भाड़े के सैनिक माना जाए क्योंकि ऐसा मानने के लिए जो आवश्यकताएं पूरी करनी होती हैं, उनमें से कुछ शर्तों को अगर दरकिनार भी कर दिया जाए, तब भी [37]अनुच्छेद 47 इसे कम प्रासंगिक बना देता है[38]

चूंकि, वैगनर समूह में रूस के नागरिक शामिल हैं और रूस इस संघर्ष में एक पक्ष है. इसलिए वैगनर समूह छह शर्तों में से एक शर्त पूरी नहीं करता. ऐसे में इस समूह के सदस्यों को भाड़े के सैनिक की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. ऐसे में अगर विदेशी नागरिकों को वैगनर समूह में शामिल कर इसका विस्तार किया जाता है, तब भी उन्हें भाड़े का सैनिक नहीं माना जा सकता. अगर इसे और सरल शब्दों में कहें तो सशस्त्र संघर्ष में एक पक्ष होने की वजह से अगर गोरखा रूसी सेना में भी शामिल होते हैं तो उन्हें भाड़े के सैनिक नहीं माना जा सकता क्योंकि जैसा कि हमने ऊपर बताया कि रूसी सेना हो या फिर वैगनर समूह, इन दोनों में रूसी नागरिक शामिल हैं. इसलिए इन्हें भाड़े के लड़ाकों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.

भाड़े की सैनिक की परिभाषा में कानूनी असंगतता का एक और उदाहरण है. अतिरिक्त प्रोटोकॉल I का अनुच्छेद 47(2) कहता है कि भाड़े के सैनिक संघर्ष के किसी पक्ष के सशस्त्र बल के हिस्सा नहीं हो सकते. लेकिन अतिरिक्त प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 43(1) में कहा गया है कि सशस्त्र बल में सभी शामिल हैं. फिर चाहे वो संगठित सशस्त्र बल हों, कोई समूह या फिर ऐसी कोई इकाई जो किसी पक्ष के कमांड के अधीन हो. अगर अनुच्छेद 43(1) और अनुच्छेद 47(2) को संयुक्त रूप से देखें तो ये व्यक्तियों और समूहों को भाड़े के सैनिक के तौर पर वर्गीकृत होने से छूट देता है. आख़िरकार भाड़े के सैनिक का मक़सद युद्धरत पार्टी की तरफ से जंग में भाग लेना होगात है. एक समूह, जैसे कि गोरखा, के संगठित होने और एक कमांड के तहत एकजुट होने की संभावना अधिक होती है. ये कमांड उस युद्धरत पक्ष के प्रति जिम्मेदार होती है, जिसके लिए वो लड़ रहे हैं.

अनुच्छेद 47(2) के उपखंड (c) में स्पष्ट रूप से ये कहा गया है कि किसी व्यक्ति को ‘भाड़े का सैनिक’ की परिभाषा में लाने के लिए कुछ सबूतों की ज़रूरत होती है. "इसके लिए ये ज़रूरी है कि वो व्यक्ति अपने निजी लाभ की इच्छा से प्रेरित होकर युद्ध में शामिल हो रहा हो" और "उस लड़ाके को नियमित सेना में समान रैंक और समान काम वाले सैनिक या अफ़सर से कहीं ज्य़ादा आर्थिक मुआवज़ा मिल रहा हो". लेकिन भाड़े के सैनिक की ये परिभाषा इस पूरे अनुच्छेद को ही निरर्थक बना देती है. यही वज़ह है कि अतिरिक्त प्रोटोकॉल अपनाने की प्रक्रिया के लिए जो राजनयिक सम्मेलन आयोजित किए गए, उनमें कई देशों ने इस बात पर चिंता जताई थी कि जिस व्यक्ति पर भाड़े के सैनिक होने का आरोप लगाया जा रहा है. उसे साबित करने के लिए ये शर्त ना जोड़ी जाए कि उसे नियमित सेना की तुलना में बहुत अधिक पैसे दिए जा रहे हों.[39]  इस ऊंची सीमा और इस परिभाषा के प्रतिबंधात्मक पैमानों की वजह से ही अतिरिक्त प्रोटोकॉल I के अनुच्छेद 47 को अव्यावहारिक माना जा रहा है.

निष्कर्ष

नेपाल की मौजूदा स्थिति समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए चिंता का विषय है. अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देते हुए चीन हिमालय क्षेत्र में रणनीतिक नियंत्रण स्थापित करने और कब्ज़े वाले तिब्बत में अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए गोरखाओं को अपनी सेना में भर्ती कर रहा है. हालांकि चीन लंबे वक्त से गोरखाओं को अपनी सेना में भर्ती करने की कोशिश करता रहा है लेकिन पहले उसके प्रयासों को अस्वीकार कर दिया गया लेकिन नेपाल की मौजूदा सत्ता चीन के अनुकूल है. चीन में राजनातिक और सामाजिक माहौल में भी उथल-पुथल है. इसकी वज़ह से पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में गोरखाओं की भर्ती का रास्ता आसान हो गया है.[40]

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रूसी सेना में भर्ती इन लड़ाकों में से कुछ नेपाली सेना[41]  के सेवानिवृत सैनिक हैं. इन्हें युद्ध लड़ने के लिए कोई अतिरिक्त प्रशिक्षण नहीं देना पड़ा है. ख़ास बात ये है कि इस युद्ध में गोरखा दोनों तरफ यानी यूक्रेन और रूस की तरफ से लड़ रहे हैं.[42]  इससे भी ये साबित होता है कि गोरखाओं के इस संघर्ष में शामिल होने की वजह नैतिक नहीं बल्कि पैसा है. अब सवाल ये है कि क्या गोरखा इस युद्ध में नागरिकता नीति[43] की वज़ह से शामिल हो रहे हैं या फिर आकर्षक भुगतान के कारण.[44]  नागरिकता नीति का अर्थ यूक्रेन या रूस की नागरिकता मिलने के लालच से है. अगर ये बात सच है कि नेपाल सरकार इन गोरखाओं को नियंत्रित करने में अक्षम है, जो अपनी व्यक्तिगत क्षमता[45] से समझौते कर रहे हैं तो इसे देखते हुए ऐसा लगता है कि इस युद्ध में शामिल गोरखाओं को नियमित सैनिक की बजाए भाड़े के सैनिक मानना चाहिए.

मध्य एशिया के लिए भाड़े के सैनिकों की समस्या नई नहीं है.[46] हालांकि ये पहली बार है जब भारतीय उपमहाद्वीप को इस तरह की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. ये सच है कि इस मामले में नेपाल का उदासीन रवैया यूक्रेन-रूस युद्ध को लेकर उसकी 'रचनात्मक तटस्थता' की नीति पर सवाल उठाता है. जिस युद्ध में नेपाल एक पक्ष नहीं है, जिन देशों के साथ नेपाल ने द्विपक्षीय समझौता नहीं किया है, उस युद्ध में अपने नागरिकों को आसान शिकार बनने से रोकने के लिए नेपाल को जल्द से जल्द कोई ठोस कदम उठाने चाहिए.

भारत और नेपाल के लोगों के बीच सदियों से सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंध रहे हैं. ऐसे में भारत को भी इस मुद्दे पर अपनी भूमिका निभानी चाहिए. दोनों देशों के साझा इतिहास में गोरखाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. भारत और पाकिस्तान के बीच 1947–48, 1965 और 1971 के युद्ध और चीन के साथ 1962 की जंग में गोरखा सैनिकों ने अदम्य बहादुरी दिखाई है.[47] ऐसे में भारत को उन गोरखाओं की चिंताओं को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए जो अब भी भारतीय सेना में काम कर रहे हैं.

गोरखाओं के पास युद्ध लड़ने और युद्ध के मैदान में वीरता दिखाने का एक समृद्ध इतिहास और विरासत रही है. ऐसे में उनकी तुलना किसी ऐसे व्यक्ति या समूह से नहीं की जा सकती जो संघर्ष में शामिल होने को प्रेरित रहते हैं. गोरखाओं ने कई साल तक अलग-अलग युद्धों में बहादुरी दिखाकर अपनी एक छवि बनाई है. उनकी "खुकरी" बहादुरी और शौर्य की प्रतीक रही है. ये सच है कि यूक्रेन-रूस युद्ध की बदलती वास्तविकताओं की वज़ह से कई दूसरे देश में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसमें शामिल हो रहे हैं. मध्यपूर्व यानी गाज़ा और इज़रायल में संघर्ष का जो नया मोर्चा खुला है, उसके बाद माना जा रहा है कि और भी ज़्यादा विदेशी लड़ाके यूक्रेन-रूस युद्ध में शामिल हो सकते हैं और हालात और ख़राब होने की आशंका है. ऐसे वक्त में जब अंतरराष्ट्रीय कानून आधुनिक काल के युद्धों को लड़ने के तरीकों में बदलाव की चुनौती से जूझ रहे हैं, तब ये और भी ज़रूरी हो जाता है कि "भाड़े के सैनिक" शब्द की कानूनी समझ और परिभाषा पर फिर से विचार किया जाए, क्योंकि इसकी मौजूदा परिभाषा तो निरर्थक हो गई है. जब तक नई परिभाषा नहीं बनती तब तक अगर कोई अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत गोरखाओं की स्थिति के बारे में जानना चाहता है तो उन्हें वो लड़ाकों और भाड़े के सैनिकों के बीच ही कहीं मिलेंगे.

Endnotes

[a] वैगनर समूह या पीएमसी वैगनर की स्थापना 2014 में की गई. 2022 से ये रूप में एक निजी सैन्य कंपनी के रूप में पंजीकृत है. इसका नेतृत्व रूस के कुलीन वर्ग से आने वाले येवगिनी प्रेगोझिन कर रहे थे. 2023 में एक हवाई हादसे में उनकी मौत हो गई.

[1]  “Who are the Gurkhas?,” BBC, July 27, 2010, https://www.bbc.com/news/uk-10782099.

[2] “Investigation Reveals Nepali Soldiers Undergoing Training At Russian Military Camps,” Outlook, June 26, 2023, http://www.outlookindia.com/international/investigation-reveals-nepali-soldiers-undergoing-training-at-russian-military-camps-news-298099.

[3] Manish Kumar Jha, “Nepali Gurkhas rush to join Wagner group amid citizenship offer and opportunities,”  Financial Express, June 30, 2023, https://www.financialexpress.com/business/defence-nepali-gurkhas-rush-to-join-wagner-group-amid-citizenship-offer-and-opportunities-3147825/#.

[4] Article 2, Geneva Conventions, 1949 read with Article 2, Paragraph 4 of the Additional Protocol I.

[5] The Gurkha Brigade Association, Brigade of Gurkha History, https://www.gurkhabde.com/history/.

[6]  “Gurkha group ends Downing Street hunger strike after talks agreed,” BBC, August 19, 2021, https://www.bbc.co.uk/news/uk-england-hampshire-5827426.

[7] “Gurkha veterans on hunger strike outside Downing Street,” BBC, August 11, 2021, https://www.bbc.co.uk/news/uk-58159773.

[8] Tim I Gurung, “Why the Gurkhas are once again staging a hunger strike in the heart of London,” The Record Nepal, July 30, 2021, https://www.recordnepal.com/why-the-gurkhas-are-once-again-staging-a-hunger-strike-in-the-heart-of-london.

[9]  Vijaya Kumar Tiwary and Vijay Kumar Tiwary, “The Recruitment of the Gurkhas in the British Army, their role in British Empire,” Proceedings of the Indian History Congress 70 (2009): 802–13, https://www.jstor.org/stable/44147727.

[10] “8 interesting facts about Gorkha Rifles,” The Times of India, November 9, 2017, https://timesofindia.indiatimes.com/india/8-interesting-facts-about-gorkha-rifles/articleshow/61575704.cms?frmapp=yes&from=mdr.

[11] “China‘Keen’ To Recruit Gurkha Soldiers Into PLA; Will It Become 3rd Country After UK & India To Hire The Fearless Men?,” The EurAsia Times, May 3, 2023,  https://eurasiantimes.com/china-keen-to-recruit-gurkha-soldiers-into-pla-will-it-become/.

[12] Vijay Gokhale, “India’s Fog of Misunderstanding Surrounding Nepal–China Relations,” Carnegie India, October 4, 2021, https://carnegieindia.org/2021/10/04/india-s-fog-of-misunderstanding-surrounding-nepal-china-relations-pub-85416.

[13] Terms and Conditions: Agnipath Scheme for service in Indian Army, June 2022, https://joinindianarmy.nic.in/writereaddata/Portal/Notification/861_1_Terms_and_Conditions_for_Agnipath_Scheme.pdf.

[14] Vijay Gokhale, “India’s Fog of Misunderstanding Surrounding Nepal–China Relations”.

[15] “Explained: Is China trying to recruit Nepal’s famed Gorkhas into its army?,” Firstpost, May 5, 2023, https://www.firstpost.com/explainers/explained-is-china-trying-to-recruit-nepals-famed-gorkhas-into-its-army-12551502.html.

[16] Maxim Edwards, Youri van der Weide, Michael Sheldon, Aric Toler and Dennis Kovtun, “Russia's Foreign Fighters: Geolocating the Nepalis Training in the Russian Army,”  Bellingcat, June 23, 2023, https://www.bellingcat.com/news/2023/06/23/russias-foreign-fighters-geolocating-the-nepalis-training-in-the-russian-army/.

[17] Lekhanath Pandey, “Ukraine war: Why Nepal chose to go against Russia, Lekhanath Pandey,” DW, March 23, 2023, https://www.dw.com/en/ukraine-war-why-nepal-chose-to-go-against-russia/a-61234019

[18]  International Labour Organization, “ILO Modelled Estimates and Projections database ( ILOEST )”, the World Bank Group, 2022, https://data.worldbank.org/indicator/SL.UEM.TOTL.ZS?locations=NP.

[19] Ritu Sharma, “Fierce Gurkhas Are Joining PMC Wagner In Lure Of Russian Citizenship; Ex-Nepal Army General Says ‘Concerning Trend’,” The EurAsia Times, June 25, 2023, https://eurasiantimes.com/gorkha-soldiers-joining-pmc-wager-in-lure-of-russian-citizenship/.

[20] Chia Legnardt, “Chapter 12-Private Military Companies” in Research handbook on international conflict and security law: jus ad bellum, jus in bello and jus post bellum, ed. Christian Henderson and Nigel D. White, Edward Elgar Publishing Limited, 2013, 421.

[21] अतिरिक्त प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 50 के मुताबिक – 1. "नागरिक वो व्यक्ति है जो तीसरे जिनेवा सम्मेलन के अनुच्छेद 4A (1), (2), (3), (6) और इस प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 43 में बताई गई किसी भी श्रेणी से संबंधित नहीं है. अगर फिर भी किसी व्यक्ति के नागरिक होने पर संदेह तो फिर उसे नागरिक माना जाएगा, 2. नागरिक जनसंख्या में वो सभी व्यक्ति शामिल हैं, जो नागरिक हैं, 3. नागरिक आबादी के भीतर ऐसे व्यक्ति जो नागरिक की परिभाषा के तहत नहीं आते, उन्हें भी नागरिक के चरित्र से वंचित नहीं किया जा सकता".

[22] अतिरिक्ति प्रोटोकॉल 1 के अनुच्छेद 43(2) के मुताबिक 'युद्ध के किसी एक पक्ष के सशस्त्र बलों के सदस्य (तीसरे कन्वेंशन के अनुच्छेद 33 के तहत आने वाले मेडिकल कर्मचारियों और पादरी या धर्मगुरु के अलावा ) लड़ाके हैं. यानी उनके पास युद्ध में प्रत्यक्ष तौर पर शामिल होने का अधिकार है'.

[23]  Nils Melzer, “Chapter 12-The Principle of Distinction Between Civilians and Combatants,” in The Oxford Handbook of International Law in Armed Conflict, ed. Andrew Clapham, and Paola Gaeta, Oxford University Press, 2015, 296–331.

[24] International Law Commission, “Report on State Responsibility,” Yearbook of the International Law Commission, 2001, vol II, part 2, Draft Article 40, Commentary, 112.

[25] American University Law Review, ‘The status of Combatants in Non-International Armed Conflicts under Domestic Law and Transnational Practice’, W.A. Solf, 1983.

[26] अतिरिक्त प्रोटोकॉल 1 का अनुच्छेद 43(1) के मुताबिक 'संघर्ष में किसी पक्ष के सशस्त्र बलों में सभी संगठित सशस्त्र बल, समूह या इकाइयां शामिल होती हैं. जो एक कमांड के तहत उस पक्ष में शामिल लोगों के काम के लिए जिम्मेदार होती हैं. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उस पक्ष का प्रतिनिधित्व सरकार या किसी ऐसे आधिकारिक अफसर द्वारा किया जाता है जिसे दूसरे पक्ष ने मान्यता ना दी हो. ऐसे सशस्त्र बल एक आंतरिक अनुशासनात्मक व्यवस्था के तहत होंगे. ये दूसरी बातों के अलावा युद्ध या सशस्त्र संघर्ष में लागू अंतर्राष्ट्रीय नियमों का पालन करेंगे'.

[27] Paul Kirby, “Wagner chief's 24 hours of chaos in Russia,” BBC, June 24, 2023, https://www.bbc.co.uk/news/world-europe-66006880.

[28] “Band of Brothers: The Wagner Group and the Russian State,” Center for Strategic and International Studies, September 21, 2020, https://www.csis.org/blogs/post-soviet-post/band-brothers-wagner-group-and-russian-state.

[29] “Band of Brothers: The Wagner Group and the Russian State”

[30] Pjotr Sauer, “Putin tells security staff they prevented civil war as Prigozhin lands in Belarus,” The Guardian, June 27, 2023, https://www.theguardian.com/world/2023/jun/27/jet-linked-yevgeny-prigozhin-flies-belarus-fsb-drops-investigation-russia-wagner.

[31] Melzer, “Chapter 12-The Principle of Distinction Between Civilians and Combatants”

[32] ICRC, Interpretive Guidance on the Notion of Direct Participation in Hostilities, 2009.

[33] Ramin MahnadThe status and protection of third-country nationals in international armed conflict,” Humanitarian Law and Policy, October 6, 2022, https://blogs.icrc.org/law-and-policy/2022/10/06/third-country-nationals-international-armed-conflict/.

[34] James Cockayne, “Chapter 25-Private Military and Security Companies” in The Oxford Handbook of International Law in Armed Conflict, ed. Andrew Clapham, and Paola Gaeta, Oxford University Press, 2015, 624–655.

[35] Article 47(2), Protocol Additional to the Geneva Conventions of 12 August 1949, and relating to the Protection of Victims of International Armed Conflicts (Protocol I), 8 June 1977.

[36] Article 47(1), Protocol Additional to the Geneva Conventions of 12 August 1949, and relating to the Protection of Victims of International Armed Conflicts (Protocol I), 8 June 1977.

[37] Article 47, Protocol Additional to the Geneva Conventions of 12 August 1949, and relating to the Protection of Victims of International Armed Conflicts (Protocol I), 8 June 1977.

[38] Legnardt, “Chapter 12-Private Military Companies”

[39] Customary Law, Rule 108, International Humanitarian Law Database, https://ihl-databases.icrc.org/en/customary-ihl/v1/rule108#title-1

[40] Vijay Gokhale, “India’s Fog of Misunderstanding Surrounding Nepal–China Relations”

[41] Sharma, “Fierce Gurkhas Are Joining PMC Wagner In Lure Of Russian Citizenship; Ex-Nepal Army General Says ‘Concerning Trend’”

[42] Birat Anupam, “Why Nepalis Are Fighting on Both Sides of the Russia-Ukraine War,” The Diplomat, June 17, 2023, https://thediplomat.com/2023/06/why-nepalis-are-fighting-on-both-sides-of-the-russia-ukraine-war/.

[43] The Russian Federation, "The Federal Assembly of the Russian Federation, Foreign citizens serving in the Russian army under contract to be able to obtain citizenship of Russia under a simplified procedure,” The State Duma, September 20, 2022, http://www.duma.gov.ru/en/news/55276/.

[44] “Nepali Gurkhas enlist as contract soldiers for Russia's Wagner Group in Ukrainian conflict,” MyIndMakers, June 27, 2023, https://www.myind.net/Home/viewArticle/nepali-gurkhas-enlist-as-contract-soldiers-for-russias-wagner-group-in-ukrainian-conflict or “Investigation Reveals Nepali Soldiers Undergoing Training At Russian Military Camps,” Outlook, June 26, 2023, http://www.outlookindia.com/international/investigation-reveals-nepali-soldiers-undergoing-training-at-russian-military-camps-news-298099.

[45]  “Nepali Gurkhas Joining Ukraine War as Contract Soldiers for Russia Under Wagner: Reports,” Statecraft, June 28, 2023, https://www.statecraft.co.in/article/nepali-gurkhas-joining-ukraine-war-as-contract-soldiers-for-russia-under-wagner-reports#:~:text=According%20to%20reports%2C%20Nepali%20Gurkhas,opportunities%20in%20the%20Indian%20Army.

[46] William B. Farrell, “Central Asia’s New Foreign Fighters Problem: The Russia-Ukraine War,” United States Institute of Peace, September 8, 2022, https://www.usip.org/publications/2022/09/central-asias-new-foreign-fighters-problem-russia-ukraine-war.

[47] Vijay Gokhale, “India’s Fog of Misunderstanding Surrounding Nepal–China Relations”

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