Published on Apr 10, 2026 Commentaries 0 Hours ago

सूडान का गृहयुद्ध अब सिर्फ अंदरूनी लड़ाई नहीं रहा बल्कि खाड़ी देशों, रूस और अमेरिका के दखल से यह एक बड़े प्रॉक्सी वॉर में बदलता जा रहा है. जानिए कैसे इसका असर नील नदी विवाद, लाल सागर की सुरक्षा और पूरे पूर्वोत्तर अफ्रीका की स्थिरता पर पड़ रहा है जिससे मानवीय संकट और गहरा हो रहा है.

सूडान संकट: गृहयुद्ध से आगे बढ़ता प्रॉक्सी वॉर

Image Source: Luis Tato/AFP via Getty Images

लगभग तीन वर्षों की लड़ाई के बाद सूडान का युद्ध अब केवल आंतरिक संघर्ष नहीं रहा है. क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता, खाड़ी देशों की महत्वाकांक्षाएँ और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा जैसे कई आपस में जुड़े कारकों से प्रेरित यह युद्ध अब एक बहु-स्तरीय संघर्ष में बदल गया है. अब यह मिस्र और इथियोपिया के बीच नील नदी को लेकर चल रहे लंबे विवाद में एक ‘प्रॉक्सी युद्ध’ का रूप ले सकता है जो दोनों देशों और पूरे क्षेत्र के लिए खतरनाक है. अब ईरान खाड़ी क्षेत्र में चल रहे संघर्ष को बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य तक फैलाने की धमकी दे रहा है-जो लाल सागर के निचले हिस्से का एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है-जिससे क्षेत्रीय हालात को नजरअंदाज करना दुनिया के लिए और कठिन हो गया है.

सूडान की भौगोलिक स्थिति इस बाहरी हस्तक्षेप को काफी हद तक समझाती है. लाल सागर और साहेल क्षेत्र के संगम पर स्थित और सात देशों से घिरा हुआ सूडान अफ्रीका के सबसे अस्थिर क्षेत्रों के केंद्र में है. इसकी कृषि क्षमता, खनिज संसाधन और लाल सागर का महत्वपूर्ण तट इसे संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाते हैं. ये सभी अपने-अपने हित साधने में लगे हैं, अक्सर सूडान में नागरिक शासन की स्थापना की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाते हुए.

सूडान गृहयुद्ध का असर

सूडान के गृहयुद्ध ने खाड़ी देशों की रुचि खाद्य सुरक्षा और निवेश मार्गों को सुरक्षित करने में बढ़ा दी है जिसके चलते वे अलग-अलग गुटों का समर्थन कर रहे हैं. रूस, पहले वैगनर समूह और अब अफ्रीका कॉर्प्स के जरिए, खासकर सोने के खनन क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है. साथ ही, रूस पोर्ट सूडान में एक नौसैनिक अड्डा स्थापित करने का इच्छुक है ताकि वह बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य मार्ग को सुरक्षित कर सके.

लाल सागर और साहेल क्षेत्र के संगम पर स्थित और सात देशों से घिरा हुआ सूडान अफ्रीका के सबसे अस्थिर क्षेत्रों के केंद्र में है. इसकी कृषि क्षमता, खनिज संसाधन और लाल सागर का महत्वपूर्ण तट इसे संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाते हैं. ये सभी अपने-अपने हित साधने में लगे हैं, अक्सर सूडान में नागरिक शासन की स्थापना की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाते हुए.

संयुक्त राज्य अमेरिका ने शुरुआत में संघर्ष विराम के लिए नेताओं पर दबाव डालकर प्रभाव डालने की कोशिश की. पहले कुछ दूरी बनाए रखने के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बाद में मिस्र, सऊदी अरब और यूएई के साथ मिलकर मध्यस्थता करने में रुचि दिखाई, जिसे उनके नोबेल शांति पुरस्कार पाने के प्रयास से भी जोड़ा गया. प्रॉक्सी युद्ध का खतरा लगातार बढ़ रहा है, और बीच में फंसा सूडान उन प्रतिस्पर्धी हितों के टकराव का मैदान बन सकता है. यह युद्ध अब्देल फतह अल-बुरहान (सूडानी सशस्त्र बलों के प्रमुख) और मोहम्मद हमदान डागालो (रैपिड सपोर्ट फोर्सेस के नेता) के बीच सत्ता संघर्ष से शुरू हुआ था. पिछले वर्ष यह संघर्ष और बढ़ गया, जब पड़ोसी दक्षिण सूडान के लड़ाके भी इसमें शामिल हो गए.

अब यह युद्ध केवल खार्तूम या दारफुर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्व की ओर, इथियोपिया की सीमा के पास स्थित संवेदनशील क्षेत्रों की ओर बढ़ रहा है. यह क्षेत्र ग्रांड इथियोपियाई पुनर्जागरण बांध (GERD) के बेहद करीब है, जहाँ एक दशक से अधिक समय से मिस्र और इथियोपिया के बीच नील नदी के जल को लेकर तनाव बना हुआ है. इस युद्ध के कारण दस लाख से अधिक सूडानी शरणार्थी मिस्र की ओर बढ़े हैं और उत्तरी सूडान में सशस्त्र समूहों की संख्या बढ़ी है. मिस्र की मुख्य चिंता नील राजनीति है, क्योंकि अस्थिर सूडान GERD पर उसकी जल सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है.

The Spillover From Sudan

The Grand Ethiopian Renaissance Dam (GERD) in Guba, Ethiopia, in September 2025, after Ethiopia inaugurated Africa’s biggest hydroelectric dam (Amanuel Sileshi/Bloomberg via Getty Images)

इसी वजह से मिस्र एक सतर्क पर्यवेक्षक से सक्रिय भागीदार में बदल गया है. हाल के महीनों में मिस्र ने अपनी दक्षिण-पश्चिमी सीमा को मजबूत किया है, निगरानी क्षमताओं को बढ़ाया है और कई रिपोर्टों के अनुसार उत्तर-पश्चिमी सूडान में आरएसएफ से जुड़े आपूर्ति मार्गों पर हमले भी किए हैं. काहिरा का बुरहान के प्रति समर्थन किसी वैचारिक समानता से कम और एक एकीकृत सूडानी राज्य को बनाए रखने से अधिक जुड़ा है, जो नील कूटनीति में एक स्थिर साझेदार बन सके.

अब सूडान का युद्ध केवल गृहयुद्ध नहीं रहा, बल्कि यह पूर्वोत्तर अफ्रीका की ‘दरार रेखा’ बन गया है, जहाँ जल राजनीति, सीमा विवाद और महाशक्तियों की रणनीतियाँ आपस में जुड़कर एक-दूसरे को मजबूत कर रही हैं. इससे लाल सागर की सुरक्षा खतरे में है, व्यापार मार्ग बाधित हैं, गैर-राज्यीय और बाहरी शक्तियों के लिए नए अवसर खुल रहे हैं और मानवीय संकटों से निपटना और जटिल हो गया है. 

इथियोपिया GERD को राष्ट्रीय विकास की आधारशिला और गर्व का प्रतीक मानता है, लेकिन यह संभावित कमजोरी भी है. बांध सूडान सीमा के पास है, जिससे सीमा-पार अस्थिरता संवेदनशील है. मिस्र और इथियोपिया पर आरोप-प्रत्यारोप गहरे अविश्वास को दर्शाते हैं, जिसमें RSF की आवाजाही और आपूर्ति शामिल है.

अफ्रीका की स्थिरता पर सवाल

प्रॉक्सी युद्ध का खतरा सूडान में लगातार बढ़ रहा है. मिस्र चाहता है कि सूडान अस्थिर न हो और इथियोपिया के साथ गठबंधन न बनाए, जबकि इथियोपिया अपने घेराव से बचते हुए GERD की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है. इस बीच फंसा सूडान उन टकराते हितों का केंद्र बन चुका है. खाड़ी देशों की भागीदारी इस जटिल स्थिति को और बढ़ा देती है. आरएसएफ की सैन्य गतिविधियां यूएई से जुड़े आपूर्ति नेटवर्क पर निर्भर हैं, जबकि मिस्र को सऊदी अरब और कतर जैसे साझेदारों का समर्थन प्राप्त है. जैसे-जैसे पारंपरिक तस्करी मार्ग दबाव में हैं, इथियोपिया और ब्लू नाइल के रास्ते नए मार्गों के रूप में उभर सकते हैं.

सूडान के लिए वर्तमान युद्ध और बाहरी हस्तक्षेप के परिणाम अत्यंत गंभीर हैं. बाहरी समर्थन ने समझौते और राजनीतिक समाधान की संभावनाओं को कम किया है, सैन्य संघर्ष को बढ़ावा दिया है और देश के विखंडन की प्रक्रिया को तेज किया है. दक्षिण दारफुर में RSF द्वारा समानांतर सरकार की घोषणा पहले ही वास्तविक विभाजन की दिशा में संकेत देती है. यदि यह संघर्ष एक पूर्ण प्रॉक्सी युद्ध में बदलता है, तो विभाजन और गहरा होगा और किसी स्थायी राजनीतिक समाधान तक पहुँचना कठिन हो जाएगा. अब सूडान का युद्ध केवल गृहयुद्ध नहीं रहा, बल्कि यह पूर्वोत्तर अफ्रीका की ‘दरार रेखा’ बन गया है, जहाँ जल राजनीति, सीमा विवाद और महाशक्तियों की रणनीतियाँ आपस में जुड़कर एक-दूसरे को मजबूत कर रही हैं. इससे लाल सागर की सुरक्षा खतरे में है, व्यापार मार्ग बाधित हैं, गैर-राज्यीय और बाहरी शक्तियों के लिए नए अवसर खुल रहे हैं और मानवीय संकटों से निपटना और जटिल हो गया है. नील नदी, जो सदियों से जीवन और सभ्यता का स्रोत रही है, अब तेजी से विभाजन की रेखा बनती जा रही है.


यह लेख मूल रूप से लोवी इंस्टीट्यूट में प्रकाशित हुआ था. 
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Author

Samir Bhattacharya

Samir Bhattacharya

Dr. Samir Bhattacharya is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), where he works on geopolitics with particular reference to Africa in the changing ...

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