Author : Samriddhi Vij

Issue BriefsPublished on Sep 04, 2025
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The Rise Of Soft Power In The Gulf A Comparative Analysis Of Gcc Strategies

खाड़ी देशों की बढ़ती सॉफ्ट पावर यात्रा का एक तुलनात्मक विश्लेषण

  • Samriddhi Vij

    गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल यानी खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सदस्य देश हाल के वर्षों में वैश्विक स्तर पर सॉफ्ट पावर के क्षेत्र में प्रमुख और महत्वाकांक्षी खिलाड़ी बनकर उभरे हैं. ये खाड़ी देश आर्थिक विविधीकरण और भू-राजनीतिक उथल-पुथल से पैदा होने वाले विपरीत हालातों का बखूबी सामना करते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी छवि को नए सिरे गढ़ने की कोशिश में जुटे हैं और इसके लिए तमाम तरह के उपायों को अमल में ला रहे हैं. इस इश्यू ब्रीफ़ में इस बात की विस्तार से चर्चा की गई है कि खाड़ी सहयोग परिषद के ये देश अलग-अलग सेक्टरों में किस प्रकार अपनी सॉफ्ट पावर को विकसित कर रहे हैं. इसके अलावा इस लेख में इसका भी मूल्यांकन किया गया है कि इन खाड़ी देशों की ओर से वैश्विक स्तर अपने दबदबे को बढ़ाने के लिए जो रणनीतियां अपनाई गई हैं, उनका क्या असर पड़ रहा है और वे कितनी सफल साबित हो रही हैं. इस इश्यू ब्रीफ़ में खाड़ी देशों की सरकारों की ओर से इस दिशा में उठाए गए क़दमों और नीतियों का भी विश्लेषण किया गया है, साथ ही सॉवरेन वेल्थ फंड्स, मीडिया माध्यमों, सांस्कृतिक संस्थानों और विकास सहायता से जुड़े फ्रेमवर्क्स जैसे सहयोगी इकोसिस्टम की भी पड़ताल की गई है. इस लेख में जीसीसी के सदस्य देशों द्वारा सॉफ्ट पावर के रूप में उभरने के लिए अपनाए गए अलग-अलग रास्तों का तुलनात्मक विश्लेषण भी किया गया है और इसके ज़रिए यह पता लगाने की कोशिश की गई है कि इन देशों की किन रणनीतियों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज़्यादा प्रभाव क़ायम किया है और किस क़दम पर दुनिया सबसे अधिक भरोसा कर रही है. इसके अलावा, इस इश्यू ब्रीफ़ में यह भी सुझाव दिए गए हैं कि जीसीसी के जो सदस्य खाड़ी देश सॉफ्ट पावर में पिछड़े हुए हैं, उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सॉफ्ट पावर क्षमता बढ़ाने के लिए क्या रणनीति अपनाना चाहिए और क्या क़दम उठाने चाहिए.

Attribution:

समृद्धि विज, “खाड़ी देशों की बढ़ती सॉफ्ट पावर यात्रा का एक तुलनात्मक विश्लेषण” ओआरएफ इश्यू ब्रीफ़ नंबर 830, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन, सितंबर 2025.

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प्रस्तावना

राजनीति विज्ञानी जोसेफ नाई ने 1990 के दशक के आख़िर में सॉफ्ट पावर की अवधारणा पेश की थी.[1]  सॉफ्ट पावर एक प्रकार का प्रभाव है, जिसे ख़ासकर दूसरे देशों को राजनीतिक, नैतिक या सांस्कृतिक आकर्षण के ज़रिए बगैर किसी ज़ोर-ज़बरदस्ती या वित्तीय प्रोत्साहन के अपनी इच्छानुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करके हासिल किया जाता है. जोसेफ नाई के मुताबिक़ हार्ड पावर के ज़रिए जहां दूसरे देशों को सैन्य और आर्थिक माध्यमों से अपने प्रभाव में लिया जाता है, वहीं सॉफ्ट पावर के ज़रिए कोई देश अपनी सांस्कृतिक धरोहर, राजनीतिक मूल्यों और नैतिकता वाली लचीली विदेश नीतियों का उपयोग कर दूसरे देशों पर अपना प्रभाव जमाता है.

संस्कृति, राजनीतिक नज़रिया और विदेश नीति बुनियादी रूप से सॉफ्ट पावर के तीन प्रमुख पहलू हैं.[2]  इसमें संस्कृति एक बेहद अहम पहलू है. ज़ाहिर है कि किसी देश की संस्कृति, जिसमें कला, सांस्कृतिक परंपराएं और जनप्रिय मीडिया शामिल होता है, वो देखा जाए तो पूरी दुनिया में उसकी बेहतर तस्वीर पेश कर सकता है और उसके वैश्विक प्रभाव को बढ़ा सकता है. उदाहरण के तौर पर कोरिया के संगीत और वहां की फिल्मों को लें, तो पूरे विश्व में इनकी लोकप्रियता ने देश की सॉफ्ट पावर को सशक्त करने में अहम योगदान दिया है.[3] इसके अलावा, जब कोई देश मानवाधिकारों का सख़्ती से पालन करता है और क़ानून व्यवस्था को तवज्जो देता है, तो इससे वैश्विक स्तर पर उसकी साख मज़बूत होती है और दूसरे देशों का भरोसा भी उस पर बढ़ता है. आख़िर में, अगर कोई देश ऐसी नीतियां बनाता है और उन पर अमल करता है, जो बुनियादी रूप से सही होती हैं, साथ ही किसी दूसरे देश के हितों की अनदेखी नहीं करती हैं, तो यह भी उसकी की सॉफ्ट पावर को बढ़ाने में मददगार हो सकता है.[4]

सॉफ्ट पावर को लेकर हाल के सालों में जो भी घटनाक्रम सामने आए हैं, उनसे यह साबित होता है कि कोई देश जब किसी दूसरे राष्ट्र में आर्थिक निवेश करता है, तो वो तभी सॉफ्ट पावर बढ़ाने में कारगर होते हैं. यानी जब वित्तीय निवेश को दीर्घकालिक प्रभाव स्थापित करने, विकास में सहयोग करने और उस देश की बेहतरी के लिए किया जाता है, तो निवेश करने वाले राष्ट्र की सॉफ्ट पावर में इज़ाफा करता है. अगर इस तरह के आर्थिक निवेश तात्कालिक फायदे के लिए किए जाते हैं, तो उनसे सॉफ्ट पावर के लिहाज़ के कोई ख़ास फायदा नहीं होता है.[5] सॉफ्ट पावर के रूप में खाड़ी देशों की ओर से उठाए गए क़दमों पर नज़र डाली जाए, तो उदाहरण के तौर पर संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, बहरीन, ओमान, कुवैत और क़तर ने इस दिशा काफ़ी कुछ किया है. इन देशों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित संस्थानों और निकायों जैसे कि स्पोर्टस क्लब, विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक संस्थानों में सॉवरेन वेल्थ फंड्स के ज़रिए निवेश किया है. इसके अलावा, इन खाड़ी देशों ने वैश्विक दक्षिण के राष्ट्रों में विकास परियोजनाओं और इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाओं का वित्तपोषण किया है. ज़ाहिर है कि इस प्रकार के वित्तीय निवेश जिन देशों में किए जाते हैं, वे वहां रहने वाले नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार लाने का काम करते हैं. यानी सॉफ्ट पावर के रूप में स्थापित करने के मकसद से किए जाने वाले उपाय ज़ाहिर तौर पर हार्ड पावर को रूप में स्थापित करने के लिए उठाए जाने वाले क़दमों से बिलकुल अलग होते हैं. कोई भी देश हार्ड पावर के तहत ज़ाहिर तौर पर दूसरे देशों पर प्रतिबंध थोपने, सैन्य सहायता और शर्तों के साथ मदद करने जैसी रणनीतियां अपनाता है. इन रणनीतियों का मकसद कहीं न कहीं दूसरे देश को ज़बदस्ती या मज़बूर करके अपने प्रभाव में लेना होता है.

सॉफ्ट पावर के तहत जो भी निवेश किया जाता है या फिर क़दम उठाया जाता है, वो स्वैच्छिक होता है यानी उसके पीछे को दबाव नहीं होता है. इसके तहत किए गए निवेश तभी कारगर साबित होते हैं, जब इनसे कोई जोख़िम न हो और दोनों ही पक्षों को इससे लाभ हो, साथ ही ये किसी देश को वैश्विक स्तर पर रचनात्मक और सकारात्मक ताक़त के रूप में उसकी छवि को बदलने वाले हों. इसके उलट, कोई भी आर्थिक निवेश या क़दम तब हार्ड पावर की श्रेणी में आ जाता है, जब उसका इस्तेमाल लेन-देन की नीयत से किया जाता है. जैसे कि जब वित्तीय सहायता का मकसद एकतरफा राजनयिक फायदे के लिए किया जाता है, यानी किसी देश में अपना वर्चस्व बनाने के लिए किया जाता है या फिर आर्थिक निवेश का इस्तेमाल किसी देश की रणनीतिक संपत्तियों और संस्थानों तक पहुंच के लिए किया जाता है. कहने का मतलब है कि सॉफ्ट पावर और हार्ड पावर के तहत किए जाने वाले निवेश की प्रकृति में ही अंतर नहीं होता है, बल्कि उसके पीछे छिपे इरादों और उससे होने वाले अनुभव में भी अंतर होता है.

इस लेख में इसका भी मूल्यांकन किया गया है कि इन खाड़ी देशों की ओर से वैश्विक स्तर अपने दबदबे को बढ़ाने के लिए जो रणनीतियां अपनाई गई हैं, उनका क्या असर पड़ रहा है और वे कितनी सफल साबित हो रही हैं.

सॉफ्ट पावर का मूल्यांकन बेहद कठिन होता है, क्योंकि इसका ठीक से वर्णन नहीं किया जा सकता है, इसलिए इसे समझना बड़ी चुनौती है. पारंपरिक तौर पर देखा जाए तो किसी देश के दूसरे देशों में मौज़ूद सांस्कृतिक संस्थानों की संख्या, अंतर्राष्ट्रीय छात्रों की मेज़बानी और वैश्विक स्तर पर लोगों की उसके बारे में राय-विचार से सॉफ्ट पावर का आकलन किया जाता रहा है. हालांकि, अब सॉफ्ट पावर का मूल्यांकन करने के लिए ज़्यादा सटीक और व्यापक सूचकांक सामने आए हैं. उदाहरण के तौर पर ग्लोबल सॉफ्ट पावर इंडेक्स (GSPI).[6] वर्ष 2020 से ब्रांड फाइनेंस द्वारा हर साल जीएसपीआई जारी किया जाता है. ग्लोबल सॉफ्ट पावर इंडेक्स 55 अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े आंकड़ों के आधार पर 193 देशों की सॉफ्ट पावर की रैंकिंग करता है. जीएसपीआई का मकसद संस्कृति, व्यापार और कूटनीति में किसी देश की ख़ासियतों को शामिल करके बेहतर तरीक़े से उनकी सॉफ्ट पावर का मूल्यांकन करना है. इन विशेषताओं में देश की "मज़बूत और स्थिर अर्थव्यवस्था", "कला और मनोरंजन के क्षेत्र में प्रभाव", "दुनिया में पसंद किए जाने वाले खान-पान", और "ज़रूरतमंद देशों के लिए मदद करने की मंशा" शामिल हैं.

जीएसपीआई की शुरुआत के बाद से ही खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य राष्ट्रों के प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार दिखाई दिया है. यह बदलाव दिखाता है कि सॉफ्ट पावर के रूप में पूरी दुनिया में इन देशों का दबदबा बढ़ा है और उनके द्वारा शुरू की गई रणनीतिक पहलें असरकारक साबित हो रही हैं. साल 2020 से 2025 तक ग्लोबल सॉफ्ट पावर इंडेक्स रैंकिंग (तालिका 1 देखें) पर नज़र डालें तो पता चलता है कि जीसीसी सदस्य देशों की सॉफ्ट पावर के रूप में प्रगति अलग-अलग रही है. यह रैंकिंग दिखाती है कि वैश्विक स्तर पर वे कितने प्रभावशाली तरीक़े से कूटनीतिक पहलों और सांस्कृतिक व आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ा रहे हैं और उन्हें मज़बूती प्रदान कर रहे हैं. GSPI रैंकिंग में सबसे बड़ी छलांग यूएई ने लगाई है. वर्ष 2020 में यूएई का स्थान 18वां था, लेकिन 2023 में वह दसवें नंबर पर पहुंचकर दुनिया के शीर्ष दस सॉफ्ट पावर राष्ट्रों में शामिल हो गया है और 2025 तक उसने अपने इस स्थान को बरक़रार रखा है. इसी प्रकार से सऊदी अरब 2020 में 26वें स्थान पर था और साल 2024 में जीएसपीआई रैंकिंग में 18वें स्थान पर पहुंच गया. वर्ष 2025 में सऊदी अरब की रैंकिंग में थोड़ी गिरावट दर्ज़ की गई है और वो 20वें स्थान पर आ गया. क़तर ने भी अपनी वैश्विक सॉफ्ट पावर रैंकिंग में काफ़ी सुधार किया है. साल 2020 में क़तर 31वें स्थान पर था, जो कि वर्ष 2024 में 21वें स्थान पर पहुंच गया था, हालांकि साल 2025 में वह 22वें स्थान पर आ गया.

 

 

तालिका 1. ग्लोबल सॉफ्ट पावर रैंकिंग (2020-25)

 देश

2020[7]

2021[8]

2022[9]

2023[10]

2024[11]

2025[12]

संयुक्त अरब अमीरात

18

17

15

10

10

10

किंगडम ऑफ सऊदी अरब

26

24

24

19

18

20

बहरीन

आंकड़े उपलब्ध नहीं

65

68

50

51

51

कुवैत

आंकड़े उपलब्ध नहीं

42

36

35

37

40

ओमान

आंकड़े उपलब्ध नहीं

51

49

46

49

49

कतर

31

26

26

24

21

22

 

स्रोत: ब्रांड फाइनेंस, “ग्लोबल सॉफ्ट पावर इंडेक्स

यानी किसी देश की सॉफ्ट पावर को समझने के लिए और उसका सटीक मूल्यांकन करने के लिए काफ़ी पैनी नज़र की ज़रूरत होती है. इसके लिए पारंपरिक रूप से केवल सांस्कृतिक और कूटनितिक क़दमों को ही नहीं देखा जाता है, बल्कि आर्थिक निवेश के लिहाज़ से किसी देश ने पूरी दुनिया में क्या पहलें की हैं और उनका वैश्विक स्तर पर कितना असर पड़ा है, इसका भी आकलन किए जाने की आवश्यकता होती है. खाड़ी देशों को मामले में देखा जाए तो इन देशों ने वैश्विक स्तर पर अपने बारे में दूसरे देशों का दृष्टिकोण बदलने के लिए और खुद को एक सहयोगी राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के लिए न केवल सॉवरेन वेल्थ फंड्स का इस्तेमाल किया है, बल्कि रणनीतिक लिहाज़ से अहम वैश्विक संस्थानों में निवेश भी बढ़ाया है. वैश्विक सॉफ्ट पावर सूचकांक में इन खाड़ी देशों की प्रगति बताती है कि उनके द्वारा कितनी सफलता से अपने इन संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है. हालांकि, यह बात अलग है कि इन खाड़ी देशों की सफलता की दर अलग-अलग है. जीएसपीआई में जीसीसी के देशों के बीच रैंकिंग में अंतर बताता है कि उनकी सॉफ्ट पावर रणनीतियों का प्रभाव भिन्न है. यानी इससे यह पता चलता है कि इन देशों ने जो विदेश नीति अपनाई है, जिन राजनीतिक मूल्यों को तवज्जो दी है, साथ ही दूसरे देशों में जो सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध बनाए हैं, उनका प्रभाव एक समान नहीं है, बल्कि अलग-अलग है.

खाड़ी देशों के लिए सॉफ्ट पावर के विकल्प

किसी देश के लिए खुद को सॉफ्ट पावर के रूप में स्थापित करने के लिए चार मामलों में यानी सांस्कृतिक स्वीकार्यता, राजनीतिक मूल्य, विदेश नीति एवं आर्थिक निवेश में प्रभावी तरीक़े से अग्रसर होना होता है और खाड़ी देश इन सभी चारों श्रेणियों में अपनी ओर से पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं. हालांकि, ऐसा नहीं है कि सभी खाड़ी देशों को इन सभी में विशेषज्ञता हासिल है, बल्कि हर देश की अपनी कुछ ख़ासियत है. सबसे पहले बात करते हैं यूएई की, जो कि खाड़ी देशों की सॉफ्ट पावर रैंकिंग में शीर्ष पर है. यूएई के सरकारी स्रोतों से मिले आंकड़ों[13] के मुताबिक़ वर्ष 2023 में दूसरे देशों में यूएई का निवेश 262 बिलियन अमेरिकी डॉलर के आंकड़े को पार कर गया. देखा जाए तो यूएई के विदेशी निवेश की 2016 से औसत वार्षिक वृद्धि दर 13.4 प्रतिशत रही है. इतना ही नहीं, साल 2022 के बाद से यूएई सबसे ज़्यादा विदेशी निवेश करने वाला खाड़ी देश भी है. इसके लिए यूएई ने काफ़ी प्रयास किए हैं और एक्सपो, कॉप28 एवं वर्ल्ड गवर्नमेंट समिट जैसे वैश्विक आयोजनों की मेज़बानी करके उसने विदेशी निवेश में यह उपलब्धि हासिल की है. यूएई जिस प्रकार से इस दिशा में आगे बढ़ रहा है, उससे लगता है कि आने वाले वर्षों में भी वह अग्रणी खाड़ी राष्ट्र बना रहेगा. हालांकि, सऊदी अरब एक और ऐसा खाड़ी देश है, जिसने पिछले कुछ वर्षों में खुद को सॉफ्ट पावर के रूप में स्थापित करने में लगातार प्रगति की है.

यूएई के विदेशी निवेश की 2016 से औसत वार्षिक वृद्धि दर 13.4 प्रतिशत रही है. इतना ही नहीं, साल 2022 के बाद से यूएई सबसे ज़्यादा विदेशी निवेश करने वाला खाड़ी देश भी है. इसके लिए यूएई ने काफ़ी प्रयास किए हैं और एक्सपो, कॉप28 एवं वर्ल्ड गवर्नमेंट समिट जैसे वैश्विक आयोजनों की मेज़बानी करके उसने विदेशी निवेश में यह उपलब्धि हासिल की है. यूएई जिस प्रकार से इस दिशा में आगे बढ़ रहा है

सऊदी अरब की बात करें, तो वह खुद को सॉफ्ट पावर के रूप में स्थापित करने के लिए अपनी आर्थिक ताक़त का भरपूर इस्तेमाल करता रहा है. इसको लेकर सऊदी अरब का नज़रिया न केवल बेहद पेचीदा है, बल्कि बहुआयामी भी है. देखा जाए तो यमन (2015) में सैन्य हस्तक्षेप[14] और 2018 में पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के बाद से सऊदी अरब की वैश्विक छवि को गहरा झटका लगा था. ऐसे में पूरी दुनिया में अपनी छवि को सुधारने के लिए सऊदी अरब का खुद को सॉफ्ट पावर के रूप में स्थापित करना रणनीतिक लिहाज़ से भी बेहद ज़रूरी है.[15] सऊदी अरब 1963 से ही मध्य पूर्व और उसके बाहर के देशों की वित्तीय मदद करने और उन्हें आर्थिक परेशानियों से बाहर निकालने के मामले में अग्रणी रहा है.[16] खाड़ी देशों की ओर से दूसरे राष्ट्रों को जितनी भी आर्थिक मदद की जाती है, उसमें सऊदी अरब की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत है. अनुमान के मुताबिक़ यह सहायता क़रीब 206 बिलियन अमेरिकी डॉलर की है. सऊदी अरब से सबसे ज़्यादा आर्थिक मदद पाने वाले देशों में इराक, मिस्र, पाकिस्तान और सीरिया का नाम शामिल है. यूनाइटेड नेशन्स ऑफिस फॉर दि कोऑर्डिनेशन ऑफ ह्यूमैनिटेरियन अफेयर्स (OCHA)[17] के मुताबिक़ 2025 में सऊदी अरब दुनिया के पांच शीर्ष मानवीय सहायता देने वाले वाले राष्ट्रों में से एक है और कई वर्षों से खाड़ी क्षेत्र से मानवीय आर्थिक मदद देने वाला अग्रणी देश बना हुआ है. पीआईएफ यानी सार्वजनिक निवेश कोष सऊदी अरब का सॉवरेन वेल्थ फंड[18] है और बताया जा रहा है कि हाल के वर्षों में इसका फोकस मुख्य रूप से विजन 2030 के तहत महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए देश के भीतर चल रहीं बड़ी परियोजनाओं पर ज़्यादा है. हो सकता है कि इसकी वजह से साल 2024 और 2025 में सऊदी अरब की ग्लोबल सॉफ्ट पावर रैंकिंग गिरी हो.

सॉफ्ट पावर रैंकिंग के मामले में क़तर खाड़ी देशों में तीसरे नंबर पर है. माना जाता है कि क़तर अपनी विदेश नीति का उपयोग अपनी सॉफ्ट पावर बढ़ाने के मकसद से करता है. अल-जज़ीरा मीडिया नेटवर्क क़तर की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हथियार है. विशेषज्ञों के मुताबिक़ अल-जज़ीरा मीडिया नेटवर्क क़तर के राजनीतिक दृष्टिकोण का समर्थक और प्रतिबिंब है.[19] कहने का मतलब है कि यह मीडिया नेटवर्क एक नए तरह के पैन-अरबिज़्म को यानी राजनीतिक इस्लाम और पैन-अरबिज़्म के मेलजोल को बढ़ावा देता है.[20] अल-जज़ीरा मीडिया नेटवर्क की शुरुआत 1996 में हुई थी और एक दशक बाद साल 2006 में इसका प्रसारण अंग्रेजी में होने लगा. अंग्रेजी भाषा अपनाने के बाद इस मीडिया नेटवर्क ने पूरी दुनिया में क़तर की विदेश नीति को प्रभावी तरीक़े से बढ़ाया है और अरब वर्ल्ड में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में क़तर की सॉफ्ट पावर को सशक्त किया है.

अपनी विदेश नीति के चलते क़तर विभिन्न गुटों और देशों के बीच मध्यस्थता भी करता रहा है. ख़ास तौर पर वर्ष 2007-08 में यमन की सरकार और हूती विद्रोहियों के बीच मध्यस्थता करने के बाद से[21] क़तर ने इस दिशा में तेज़ी से अपने क़दम बढ़ाए हैं. ज़ाहिर है कि क़तर ने दुनिया के कुछ बेहद जटिल संघर्षों को समाप्त करने के लिए शांति वार्ता की मेज़बानी की है. इसमें 7 अक्टूबर 2023 को संघर्ष शुरू होने के बाद हमास और इजराइल के बीच वार्ता की मध्यस्थता करने के अलावा अफ़ग़ानिस्तान और सूडान के लिए शांति वार्ता की मेज़बानी भी शामिल हैं. क़तर हर साल दोहा फोरम का आयोजन करता है, जिसका मकसद संवाद को बढ़ावा देना है और संघर्षरत देशों के बीच मध्यस्थता ऐसे ही आयोजनों का नतीज़ा है. हालांकि, सॉफ्ट पावर के लिए अपनी विदेश नीति में मध्यस्थता का इस्तेमाल करने वाला सबसे हाई-प्रोफाइल खाड़ी देश ओमान है. साल 2015 के ईरान परमाणु समझौते की क़ामयाबी का श्रेय ओमान को दिया जाता है. ऐसे ही प्रयासों की वजह से ओमान को 'अरब का स्विट्जरलैंड' भी कहा जाता है.[22] एक दशक बाद यानी 2025 में अमेरिका और ईरान एक बार फिर ओमान में बातचीत की मेज पर जुटे और तनाव कम करने के लिए एक समझौते पर विचार-विमर्श किया.[23]

राजनीतिक मूल्यों की बात की जाए तो इसमें सबसे आगे बहरीन का नाम आता है. बहरीन ने स्थानीय और वैश्विक स्तर पर सहनशीलता और बहुलवादी मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए काफ़ी कुछ किया है. 2025 में बहरीन के प्रस्ताव के बाद ही संयुक्त राष्ट्र महासभा में 28 जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया गया.[24] बहरीन की सरकार ने 2018 में किंग हमद ग्लोबल सेंटर फॉर कोएक्सिस्टेंस एंड टॉलरेंस की स्थापना[25] की थी और उसके प्रयासों से ही संयुक्त राष्ट्र ने अंतर्राष्ट्रीय शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व दिवस मनाए जाने की घोषणा की है. ज़ाहिर है कि बहरीन में हुए पर्ल स्क्वायर प्रोटेस्ट मूवमेंट[26] के बाद सरकार की ओर से उसे कुचलने के लिए जो कठोर कार्रवाई की गई थी, उससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहरीन की छवि को गहरी चोट लगी थी. ऐसे में बहरीन की ये कोशिश काफ़ी मायने रखती है, क्योंकि इससे दुनिया में उसकी छवि बदलती है. मुहर्रम के दौरान बहरीन में स्थानीय समुदाय के लिए मनाया जाने वाला शिया आशूरा सीजन[27] काफ़ी प्रसिद्ध है और इसमें ईसाई और यहूदी समुदायों के लोग भी हिस्सा लेते हैं. ज़ाहिर है कि आशूरा इमाम हुसैन की शहादत का प्रतीक है और शिया इस्लाम में एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना है, जिसे अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ाई  के लिए जाना जाता है. देखा जाए तो बहरीन शिया आशूरा का आयोजन करके धार्मिक सहिष्णुता और समावेशिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है.[28] फाउंडेशन ऑफ एथेनिक अंडरस्टैंडिंग के अध्यक्ष रब्बी मार्क श्नाइयर के मुताबिक़ बहरीन अरब प्रायद्वीप का इकलौता ऐसा देश है,[29] जहां स्वदेशी यहूदी समुदाय के लोग रहते हैं. इतना ही नहीं, धार्मिक सहिष्णुता और समावेशिता को लेकर बहरीन की प्रतिबद्धता इससे भी ज़ाहिर होती है[30] कि नवंबर 2022 में दिवंगत रोमन कैथोलिक धर्मगुरु पोप फ्रांसिस ने बहरीन का दौरा किया था और वहां 'मानव सह-अस्तित्व के लिए पूर्व और पश्चिम' नाम के सम्मेलन में हिस्सा लिया था.

 ज़ाहिर है कि क़तर ने दुनिया के कुछ बेहद जटिल संघर्षों को समाप्त करने के लिए शांति वार्ता की मेज़बानी की है. इसमें 7 अक्टूबर 2023 को संघर्ष शुरू होने के बाद हमास और इजराइल के बीच वार्ता की मध्यस्थता करने के अलावा अफ़ग़ानिस्तान और सूडान के लिए शांति वार्ता की मेज़बानी भी शामिल हैं. 

आख़िर में बात करते हैं जीसीसी के एक और सदस्य खाड़ी देश कुवैत की. कुवैत ने पूरे अरब जगत में अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों के ज़रिए एक अलग पहचान बनाई है. कुवैत की आज़ादी के पहले से ही वहां अल-अरबी नाम की एक मैगजीन प्रकाशित होती थी. मुख्य रूप से अरब जगत की संस्कृति, साहित्य, कला, राजनीति और समाज पर केंद्रित यह पत्रिका अरब देशों के घर-घर में जानी जाती थी.[31] यह मैगजीन टेलीविजन के आने से पहले ही लोगों को जानकारी और अरब संस्कृति से रूबरू करा रही थी. दुनिया में जब थियेटर और टेलीविजन लोकप्रिय हुए, तो कुवैत ने खाड़ी देशों में अपनी सबसे अलग पहचान क़ायम की थी. कुवैत के नाटकों और सोप ओपेरा ने अरब दुनिया के सांस्कृतिक परिदृश्य में व्यापक स्तर पर अपनी पहुंच बनाई. इन्हीं सब का नतीज़ा है कि अरब लीग एजुकेशनल, कल्चरल एंड साइंटिफिक ऑर्गेनाइजेशन (ALECSO) ने 2025 के लिए कुवैत को अरब संस्कृति और मीडिया की राजधानी[32] के रूप में चुना है. ज़ाहिर है कि कुवैत ने यह उपलब्धि[33] 2001 में ही हासिल कर ली थी. इसके अलावा, कुवैत का सांस्कृतिक विभाग विदेशों में कला और मीडिया में इस तरह के नेतृत्व को प्रदर्शित करने वाली प्रदर्शनियों की मेज़बानी करता है, ऐसी ही एक प्रदर्शनी फरवरी 2025 में[34] आयोजित की गई थी.

खाड़ी देशों की सॉफ्ट पावर को बढ़ाने के लिए नीतिगत सुझाव

खाड़ी सहयोग परिषद के राष्ट्रों के सॉफ्ट पावर के विकास का अध्ययन करने से न सिर्फ़ इसे हासिल करने के लिए अपनाए जाने वाले अलग-अलग विकल्पों के बारे में पता चलता है, बल्कि लागत-दक्षता, रणनीतिक फोकस और उनके प्राप्त होने वाले फायदों के बारे में भी काफ़ी कुछ जानकारी मिलती है. हालांकि, किसी विशेष पहल या रणनीति की वजह से ग्लोबल सॉफ्ट पावर इंडेक्स रैंकिंग पर क्या असर पड़ता है, इसके बारे में कोई सटीक संबंध तो पता नहीं चलता है, लेकिन विशेष कोशिशों और रैंकिंग में बदलाव के बीच संबंध का गहन विश्लेषण एक ज़रूरी नज़रिया ज़रूर प्रदान करता है, जिससे पता चल सकता है कि कौन सी रणनीतियां ज़्यादा कारगर साबित होती हैं.

सॉफ्ट पावर बनने में देखा जाए तो मूल्य और संस्कृति आधारित कूटनीति बेहद सटीक माध्यम साबित हुई है और इसमें कोई ख़ास निवेश भी नहीं करना पड़ता है. बहरीन ने अपनी सॉफ्ट पावर क्षमता को बढ़ाने के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत और बहुलवादी नज़रिए को केंद्र में रखा है और इस रणनीति के ज़रिए उसने इस दिशा में जहां काफ़ी प्रगति की है, वहीं इसमें कोई ज़्यादा ख़र्च भी नहीं हुआ है. बहरीन ने इसके लिए लगातार सभी धर्मों का सम्मान करने और उन्हें बढ़ावा देने की कूटनीति अपनाई है. उसकी इसी कूटनीति के तहत पोप फ्रांसिस ने बहरीन का दौरा किया था. साथ ही बहरीन के इन्हीं कूटनीतिक प्रयासों की वजह से संयुक्त राष्ट्र ने 'शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व दिवस' को मान्यता दी है. बहरीन ने इन्हीं सब क़दमों की वजह से वैश्विक सॉफ्ट पावर इंडेक्स रैंकिंग में ऊंचा स्थान पाया है. साल 2021 में बहरीन इस सूचकांक में 65वें नंबर पर था, जो कि 2024 में 51वें स्थान पर पहुंच गया, यानी वह 14 स्थान ऊपर आ गया. इससे पता चलता है कि बिना कोई बड़ा वित्तीय निवेश किए, केवल लक्षित और मूल्यों के आधार पर किए गए कूटनीतिक प्रयासों से सॉफ्ट पावर क्षमता बढ़ाने में सफलता मिल सकती है.

इसके अतिरिक्त, खाड़ी देशों की जीएसपीआई रैंकिंग का गहनता से अध्ययन करने से यह भी पता चलता है कि बड़े वैश्विक सम्मेलनों की मेज़बानी और टकराव में फंसे देशों के बीच मध्यस्थता जैसी पहलें भी सॉफ्ट पावर क्षमता बढ़ाने में सबसे अधिक कारगर होती हैं. यूएई का उदाहरण लें तो जीएसपीआई रैंकिंग में साल 2020 में वह 18वें स्थान पर था और 2023 तक वो 10वें स्थान पर पहुंच गया, यानी दुनिया के शीर्ष दस सॉफ्ट पावर राष्ट्रों में शामिल हो गया. इतना ही नहीं वर्ष 2024 और 2025 में भी यूएई ने अपनी 10वीं रैंकिंग को बरक़रार रखा. देखा जाए तो यूएई की सॉफ्ट पावर बनने की इस सफलता में एक्सपो 2020, अब्राहम समझौते, COP28 और ग्लोबल गवर्नमेंट समिट जैसे वैश्विक स्तर पर चर्चित और दिखाई देने वाले आयोजनों और प्रयासों का ही सबसे बड़ा योगदान है. इसी प्रकार से क़तर ने भी वैश्विक स्तर पर एक भरोसेमंद मध्यस्थ देश की भूमिका निभाई है, जिसमें ख़ास तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में शांति के प्रयासों और इजराइल-ग़ाजा संघर्ष को सुलझाने के लिए की गई कोशिशें शामिल हैं. इन्हीं प्रयासों की वजह से क़तर एक मज़बूत सॉफ्ट पावर के रूप में उभरा है और जीएसपीआई रैंकिंग में साल 2020 में 31वें स्थान से 2024 में 21वें स्थान पर पहुंच गया. ओमान की बात की जाए, तो अपनी कूटनीतिक विश्वसनीयता के बावज़ूद सॉफ्ट पावर रैंकिंग में 40 स्थान से ऊपर ही अटका हुआ है. इससे स्पष्ट होता है कि अगर कूटनीतिक प्रयास चुपचाप किए जाएं और दुनिया में उनका प्रचार व दिखावा नहीं किया जाए तो उससे कोई विशेष लाभ नहीं होता है.

खाड़ी देशों की वैश्विक सॉफ्ट पावर रैंकिंग के इस तुलनात्मक विश्लेषण से साफ है कि जो देश पिछड़े हुए हैं, उन्हें न केवल अपनी कोशिशों का प्रचार-प्रसार करने की ज़रुरत, बल्कि उसके लिए एक पूरा तंत्र विकसित करने की भी आवश्यकता है. जैसे कि कुवैत की वैश्विक सॉफ्ट पावर रैंकिंग साल 2023 में 35 थी, जो 2025 में गिरकर 40वें स्थान पर पहुंच गई. इसी तरह से ओमान ने वैश्विक रैंकिंग में साल 2023 में 46वें स्थान के साथ कुछ सफलता हासिल की, लेकिन फिर 2024 और 2025 में वह 49वें स्थान पर लुढ़क गया. जीएसपीआई रैंकिंग में ये उतार-चढ़ाव बताते हैं कि देशों की तरफ से रणनीतिक स्तर पर किए गए प्रयासों में समानता की कमी है. ज़ाहिर है कि जिस तरह से यूएई या फिर क़तर ने अपनी उपलब्धियों को बताने के लिए दुनिया भर की मीडिया में पहुंच बनाई, विश्व स्तरीय सम्मेलनों का आयोजन किया और रणनीतिक संवादों के ज़रिए अपने सॉफ्ट पावर बनने के मंसूबों को संस्थागत रूप प्रदान किया है, कुवैत और ओमान ने ऐसी कोशिशें नहीं की हैं. यानी ऐसे देशों को सॉफ्ट पावर से जुड़ी पहचान को सशक्त करने के लिए न केवल एक पुख्ता रणनीति बनाने की आवश्यकता है, बल्कि इसके लिए थिंक टैंक और दूसरे देशों में अपने सांस्कृतिक केंद्र स्थापित करने जैसे दूसरे क़दम उठाने की भी ज़रूरत है. ऐसा करने से ही ये देश अपनी सॉफ्ट पावर क्षमता का बखूबी प्रदर्शन कर पाएंगे और क़ामयाबी की सीढ़ियां चढ़ पाएंगे.

भविष्य में किसी भी देश के सॉफ्ट पावर के रूप में स्थापित होने के लिए सबसे टिकाऊ रणनीतियां वो होंगी, जिन्हें निर्बाध रूप से आगे बढ़ाया जाए और जो पूरी दुनिया में अच्छी तरह से दिखाई दें.

सॉफ्ट पावर बनने की सऊदी अरब की यात्रा को देखें, तो पता चलता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दूसरे देशों के साथ लगातार अच्छे संबंध बनाना कितना ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है. सऊदी अरब ने विजन 2030 के साथ अपने सॉवरेन वेल्थ इन्वेस्टमेंट यानी संप्रभु वित्तीय निवेश और मानव कल्याण के प्रयासों को जोड़कर सॉफ्ट पावर रैंकिंग इंडेक्स में अच्छी सफलता हासिल की है. साल 2020 में सऊदी अरब रैंकिंग में 26वें स्थान पर था और 2024 में 18वें स्थान पर पहुंच गया. हालांकि, 2025 में वह 20वें स्थान पर खिसक गया है और इसकी पड़ताल करने से इसके पीछे की वजह पता चलती है. माना जा रहा है कि सऊदी अरब की सॉफ्ट पावर रैंकिंग में यह गिरावट संभावित रूप से अपने देश में चल रही बड़ी-परियोजनाओं को प्राथमिकता देने की रणनीति की वजह से हुई है. इससे यह पता चलता है कि अपनी सॉफ्ट पावर क्षमता को बनाए रखने के लिए विदेशी निवेशों के ज़रिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार प्रयास करना और अपने कार्यों का व्यापक रूप से प्रचार करना बेहद अहम होता है. इसमें कमी आते ही उस देश की सॉफ्ट पावर वैश्विक रैंकिंग लड़खड़ाने लगती है. इसका मतलब यह है कि ग्लोबल सॉफ्ट पावर बनने के लिए व्यापक पैमाने पर प्रयास करना जितना अहम है, उतना ही महत्वपूर्ण अपनी कोशिशों का प्रचार-प्रसार करना है, यानी दुनिया के नज़रों में बने रहना है.

यही कारण है कि सॉफ्ट पावर क्षमता बढ़ाने के इरादे से की जाने वाली कोशिशों को संस्थागत स्वरूप प्रदान करना बेहद ज़रूरी है. ज़ाहिर है कि इन प्रयासों को विदेश नीति, सांस्कृतिक संबंधों, राजनीतिक मूल्यों और सॉवरेन निवेश प्रोत्साहन जैसे साधनों के ज़रिए आगे बढ़ाया जाता है और इनका एकमात्र मकसद वैश्विक सम्मेलनों और संपर्कों के माध्यम से रणनीतिक रूप से अपने पक्ष में नैरेटिव बनाना होता है.

निष्कर्ष

खाड़ी देश जिस प्रकार से क्षेत्रीय ताक़त से वैश्विक ताक़त बनने की ओर अग्रसर हैं, उसमें सॉफ्ट पावर की भूमिका बेहद अहम होती जा रही है. सॉफ्ट पावर क्षमता न केवल खाड़ी देशों के बारे में वैश्विक नज़रिए को बदल रही है, बल्कि उनके अपने राष्ट्रीय हितों को भी आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण साबित हो रही है. यूएई, सऊदी अरब और क़तर ने रणनीतिक निवेश, वैश्विक सम्मेलनों के आयोजन की कूटनीति और मीडिया में अपने प्रभाव को बढ़ाकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सॉफ्ट पावर के रूप में अपनी स्थिति को सशक्त किया है. वहीं बहरीन, ओमान और कुवैत जैसे देश अभी भी इसको लेकर संघर्ष कर रहे हैं और अपनी सॉफ्ट पावर क्षमता को बढ़ाने के रास्ते खोज रहे हैं. ऐसे में खाड़ी देशों की सॉफ्ट पावर के बीच के इस अंतर को न केवल गहराई से समझना अहम हो जाता है, बल्कि ऐसा क्यों हो रहा है और इसके पीछे क्या कारण है, इस पर भी विमर्श करना ज़रूरी हो जाता है.

कुल मिलाकर भविष्य में किसी भी देश के सॉफ्ट पावर के रूप में स्थापित होने के लिए सबसे टिकाऊ रणनीतियां वो होंगी, जिन्हें निर्बाध रूप से आगे बढ़ाया जाए और जो पूरी दुनिया में अच्छी तरह से दिखाई दें. इसके अलावा, उन रणनीतियों में नैतिकता और ईमानदारी हो, साथ ही उन्हें सरकारी स्तर पर या संस्थागत रूप से आगे बढ़ाया जाए और वैश्विक मंचों पर उनका अच्छी तरह से बखान किया जाए. ग्लोबल ऑर्डर यानी वैश्विक व्यवस्था जैसे-जैसे तेज़ी के साथ बहुध्रुवीय होती जा रही है, वैसे-वैसे खाड़ी देशों की सॉफ्ट पावर क्षमता भी बेहद महत्वपूर्ण होती जा रही है. कहने का मतलब है कि मौज़ूदा वैश्विक परिदृश्य में सॉफ्ट पावर के रूप में खाड़ी देशों की अपने मुताबिक़ धारणाओं को आकार देने एवं भरोसा पैदा करने की क्षमता उतनी ही अहम साबित हो सकती है, जितनी फिलहाल उनकी आर्थिक ताक़त महत्वपूर्ण है.


 

इस आर्टिकल में व्यक्त किए गए सभी विचार केवल लेखकों के हैं, तथा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन या उसके पदाधिकारियों और कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं.

Endnotes:-

 

[1] Joseph Nye, “Soft Power: The Origins and Political Progress of a Concept,” Palgrave Communications 3 (2017), https://doi.org/10.1057/palcomms.2017.8.

 

[2] Jonathan McClory, The New Persuaders: An International Ranking of Soft Power, Institute for Government, https://www.instituteforgovernment.org.uk/sites/default/files/publications/The%20new%20persuaders_0.pdf

 

[3] Minsung Kim, “The Growth of South Korean Soft Power and Its Geopolitical Implications,” Journal of Indo-Pacific Affairs (2022), https://www.airuniversity.af.edu/JIPA/Display/Article/3212634/the-growth-of-south-korean-soft-power-and-its-geopolitical-implications/

 

[4] “The New Persuaders: An International Ranking of Soft Power.”

 

[5] Daniele Carminati, “The Economics of Soft Power: Reliance on Economic Resources and Instrumentality in Economic Gains,” Economic and Political Studies (2021), https://doi.org/10.1080/20954816.2020.1865620.

 

[6] Brand Finance, “Global Soft Power Index,” Brand Finance, https://brandirectory.com/softpower

 

[7] Brand Finance, “Global Soft Power Index 2020,” Brand Finance, https://static.brandirectory.com/reports/brand-finance-nation-brands-2020-preview.pdf

 

[8] Brand Finance, “Global Soft Power Index 2021,” Brand Finance, https://mcy.gov.ae/ar/wp-content/uploads/sites/3/2024/08/Global-Soft-Power-Index-2021.pdf.

 

[9] Brand Finance, “Global Soft Power Index 2022,” Brand Finance,https://mcy.gov.ae/ar/wp-content/uploads/sites/3/2024/08/Global-Soft-Power-Index-2022.pdf.

 

[10] Brand Finance, “Global Soft Power Index 2023,” Brand Finance, https://mcy.gov.ae/ar/wp-content/uploads/sites/3/2024/08/Global-Soft-Power-Index-2023.pdf.

 

[11] Brand Finance, “Global Soft Power Index 2024,” Brand Finance, https://static.brandirectory.com/reports/brand-finance-soft-power-index-2024-digital.pdf

 

[12] Brand Finance, “Global Soft Power Index 2025,” Brand Finance, https://brandfinance.com/insights/global-soft-power-index-2025-the-shifting-balance-of-global-soft-power

 

[13] Ministry of Economy UAE, “Open Data,” https://www.moec.gov.ae/en/moec-opendata.

 

[14] Thomas Juneau, “Saudi Arabia’s Costly War in Yemen: A Neoclassical Realist Theory of Overbalancing,” International Relations (2024), https://doi.org/10.1177/00471178241231728

 

[15] “Jamal Khashoggi: All You Need to Know About Saudi Journalist's Death,” BBC News, 2021, https://www.bbc.com/news/world-europe-45812399

 

[16] “Gulf Bailout Diplomacy,” International Institute for Strategic Studies, 2023, https://www.iiss.org/research-paper/2023/11/Gulf-Bailout-Diplomacy/.

 

[17] Financial Tracking Service, Total Reported Funding 2025, United Nations Office for the Coordination of Humanitarian Affairs, 2025, https://fts.unocha.org/global-funding/overview/2025.

 

[18] Hadeel Al Sayegh, Iain Withers, and Anousha Sakoui, “Saudi Wealth Fund to Cut Overseas Investments,” Reuters, 2024, https://www.reuters.com/world/middle-east/financial-technology-leaders-attend-saudi-investment-conference-2024-10-29/.

 

[19] Philip Pherguson and Karim Pourhamzavi, “Al Jazeera and Qatari Foreign Policy: A Critical Approach,” Journal of Media Critiques (2015), https://www.ceeol.com/search/article-detail?id=496211.

 

[20] Sam Cherribi, The Symbolic World of al Jazeera (Oxford University Press EBooks, 2017), https://doi.org/10.1093/acprof:oso/9780199337385.003.0002.

 

[21] Sultan Barakat, “Qatari Mediation: Between Ambition and Achievement,” Brookings Doha Center, 2014, https://www.brookings.edu/wp-content/uploads/2016/06/final-pdf-english.pdf

 

[22] James Worrall, “‘Switzerland of Arabia’: Omani Foreign Policy and Mediation Efforts in the Middle East,” The International Spectator, 2021, https://doi.org/10.1080/03932729.2021.1996004.

 

[23]  Jon Gambrell, “Oman to Host Key Iran-US First Meeting,” AP News, 2025, https://apnews.com/article/iran-us-talks-oman-nuclear-program-5813e0814efcd99616428086de6ba0be.

 

[24] “UN Recognition of International Day of Peaceful Coexistence a Historic Achievement for Bahrain: Journalists,” Bahrain News Agency, 2025, https://www.bna.bh/en/news?cms=q8FmFJgiscL2fwIzON1%2BDknLYSBJpcwSG3CsSOCVDWs%3D.

 

[25] “King Hamad Global Center for Peaceful Coexistence,” King Hamad Global Centre for Peaceful Coexistence, https://khgc.org.bh/about-us.

 

[26] “Bahrain crackdown on protests in Manama's Pearl Square,” BBC News, 2011, https://www.bbc.com/news/world-middle-east-12755852

 

[27] “Bahrain Model in Tolerance, Pluralism,” Bahrain News Agency, 2025, https://www.bna.bh/en/ConstitutionalCourttoconsiderConstitutionalCase1/Bahrainmodelintolerancepluralism.aspx?cms=q8FmFJgiscL2fwIzON1%2BDtGb16aspIu5cn6Bh0Q6rcU%3D.

 

[28] “Bahrain’s Ashura Season: A Testament to Religious Freedom,” Citizens for Bahrain,

2025, https://www.citizensforbahrain.com/2025/07/14/bahrains-ashura-season-a-testament-to-religious-freedom/

 

[29] Rabbi Marc Schneier, “Bahrain Is a Beacon of Religious Tolerance and Coexistence,” Arab News, 2022, https://www.arabnews.com/node/2188981.

 

[30] Elizabeth Monier, “Religious Tolerance in the Arab Gulf States: Christian Organizations, Soft Power, and the Politics of Sustaining the ‘Family–State’ beyond the Rentier Model’,” Politics and Religion (2023), https://doi.org/10.1017/s175504832300007x.

 

[31] Abdullah Al Shayji, “Kuwait’s Soft Power Is Its Biggest Asset,” Gulf News, 2018, https://gulfnews.com/opinion/op-eds/kuwaits-soft-power-is-its-biggest-asset-1.2180201.

 

[32] “Kuwait Named Arab Culture, Media Capital for 2025 Achievement,” Kuwait News Agency, 2025, https://www.kuna.net.kw/ArticleDetails.aspx?id=3215278&language=en.’

 

[33] “Kuwait Celebrates as ‘Capital of Culture and Arab Media 2025’ with Panel Discussion,” Times Kuwait, 2024, https://timeskuwait.com/kuwait-celebrates-as-capital-of-culture-and-arab-media-2025-with-panel-discussion/.

 

[34] “Kuwait Cultural Office in London Unveils ‘Huna AlKuwait’ Exhibition’,” Kuwait News Agency, 2016, https://www.kuna.net.kw/ArticleDetails.aspx?id=3220773&language=en.

 

 

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