Author : Harsh V. Pant

Originally Published Financial Express Published on Mar 24, 2026 Commentaries 0 Hours ago

भारत में अब राज्य भी सीधे विदेशों से निवेश और साझेदारी जोड़कर विकास में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. इस नए बदलाव से रोजगार, उद्योग और आर्थिक विकास को तेज़ी मिल रही है और देश का वैश्विक जुड़ाव बढ़ रहा है.

पैराडिप्लोमेसी क्या है? समझिए दिल्ली से आगे की कूटनीति

पैराडिप्लोमेसी का मतलब है कि भारत के अलग-अलग राज्य सीधे दूसरे देशों, निवेशकों और संस्थाओं से संपर्क करके विकास के अवसर ढूँढते हैं. पहले भारत की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंध ज़्यादातर केंद्र सरकार ही संभालती थी, लेकिन अब राज्यों की भूमिका भी बढ़ रही है. यह बदलाव खासकर 1990 के दशक के बाद दिखाई देने लगा. पहले व्यवस्था बहुत केंद्रीकृत थी, लेकिन समय के साथ वैश्वीकरण, संघवाद और प्रतिस्पर्धी विकास के कारण इसमें बदलाव आया. 1991 में आर्थिक उदारीकरण एक बड़ा मोड़ साबित हुआ. सरकार ने कई नियंत्रण कम किए और देश की अर्थव्यवस्था को दुनिया से जोड़ा. इसके बाद विदेशी निवेश, वैश्विक व्यापार और तकनीकी साझेदारी भारत के विकास के महत्वपूर्ण साधन बन गए, जिससे राज्यों को भी नए अवसर मिलने लगे. 

निवेश की नई दौड़

भारत में बदलते वैश्विक और आर्थिक माहौल के बीच राज्य सरकारों की भूमिका तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है. अब राज्य केवल केंद्र सरकार द्वारा मिलने वाले अवसरों का इंतजार करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे विदेशी निवेश, बुनियादी ढांचा विकास और औद्योगिक साझेदारियों को आकर्षित करने के लिए सक्रिय रूप से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. इस दिशा में महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों ने शुरुआती पहल की और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से सीधे संपर्क स्थापित कर खुद को भारत के बड़े बाजार के प्रवेश द्वार के रूप में पेश किया.

जैसे-जैसे भारत की संघीय व्यवस्था मजबूत हुई, वैसे-वैसे राज्यों ने अपने विकास के लिए देश से बाहर भी अवसर तलाशने शुरू किए. हाल के वर्षों में प्रतिस्पर्धी संघवाद के कारण राज्यों में निवेश लाने और अर्थव्यवस्था सुधारने की होड़ बढ़ी है. केंद्र सरकार भी राज्यों को व्यापार के माहौल को बेहतर बनाने और वैश्विक निवेश आकर्षित करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है.

1990 के दशक के अंत और 2000 के शुरुआती वर्षों में आई तकनीकी क्रांति ने इस प्रक्रिया को और गति दी. भारत के आईटी क्षेत्र के तेज विकास ने कई राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक बाजार से सीधे जोड़ने का अवसर दिया. कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों ने इन अवसरों का प्रभावी ढंग से लाभ उठाया और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ मजबूत संबंध बनाए.

इस दौरान राज्य सरकारों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों, तकनीकी केंद्रों और वैश्विक निवेशकों के साथ सीधे संवाद कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. नतीजतन, बेंगलुरु एक वैश्विक टेक हब के रूप में उभरा, जबकि चेन्नई और हैदराबाद ने सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स और नवाचार के क्षेत्र में अपनी पहचान मजबूत की. विशेषज्ञों के अनुसार, आर्थिक वैश्वीकरण और राजनीतिक बदलावों ने भारत में पैराडिप्लोमेसी को नई मजबूती दी है. 

मुख्यमंत्रियों की राजनीतिक पहचान और प्रभाव घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने लगा. विदेशी निवेशकों से जुड़ना, वैश्विक मंचों में भाग लेना और प्रवासी भारतीय नेटवर्क से संबंध बनाना न केवल आर्थिक विकास के लिए बल्कि देश के भीतर राजनीतिक वैधता को मजबूत करने के लिए भी उपयोगी साधन बन गया. जैसे-जैसे भारत की संघीय व्यवस्था मजबूत हुई, वैसे-वैसे राज्यों ने अपने विकास के लिए देश से बाहर भी अवसर तलाशने शुरू किए. हाल के वर्षों में प्रतिस्पर्धी संघवाद के कारण राज्यों में निवेश लाने और अर्थव्यवस्था सुधारने की होड़ बढ़ी है. केंद्र सरकार भी राज्यों को व्यापार के माहौल को बेहतर बनाने और वैश्विक निवेश आकर्षित करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है. भारत की विविध संस्कृति, पुराने व्यापारिक संबंध और विदेशों में बसे प्रवासी समुदाय भी राज्यों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ने में मदद करते हैं.

सीमावर्ती राज्य अक्सर पड़ोसी देशों के साथ व्यापार, संपर्क और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के मुद्दों पर बातचीत करते रहते हैं. इसी तरह जिन राज्यों के बड़े प्रवासी समुदाय-विशेषकर खाड़ी क्षेत्र या दक्षिण-पूर्व एशिया में-मौजूद हैं, उन्हें उन क्षेत्रों के साथ आर्थिक और सामाजिक संबंध बनाए रखने की मजबूत प्रेरणा मिलती है. जो संपर्क पहले अनौपचारिक थे, अब धीरे-धीरे औपचारिक और संगठित बन रहे हैं. 2020 के बाद भारत में पैराडिप्लोमेसी और मजबूत हुई है. कोविड-19 महामारी के कारण दुनिया भर की सरकारों को सप्लाई चेन, निवेश योजनाओं और तकनीकी साझेदारी पर दोबारा सोचने की जरूरत पड़ी.

राज्यों की अंतरराष्ट्रीय छलांग 

भारत के कई राज्यों ने अब विदेशी निवेश लाने और वैश्विक उद्योगों से जुड़ने के प्रयास तेज कर दिए हैं. राज्य सरकारें अपने प्रदेश को बेहतर निवेश स्थल के रूप में पेश करने में जुटी हैं. इसी उद्देश्य से मुख्यमंत्रियों द्वारा विदेशों में रोडशो, निवेश सम्मेलनों और प्रवासी भारतीयों से संपर्क कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. इन पहलों का मकसद नए उद्योगों को आकर्षित करना, रोजगार बढ़ाना और राज्यों की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है.

इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल ग्रीन हाइड्रोजन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने की रही, जिसमें जापान की यूनिवर्सिटी और भारत के प्रमुख संस्थान जैसे आईआईटी कानपुर और आईआईटी बीएचयू भी शामिल हैं. यह सहयोग अनुसंधान और नई तकनीकों के विकास को बढ़ावा देगा.

भारत में पैराडिप्लोमेसी की बढ़ती परिपक्वता का उदाहरण हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा किए गए अंतरराष्ट्रीय दौरे में देखा जा सकता है. पिछले महीने सिंगापुर और जापान की उनकी चार दिवसीय आधिकारिक यात्रा को निवेश कूटनीति के एक प्रयास के रूप में तैयार किया गया था, जिसका उद्देश्य उत्तर प्रदेश को भारत की विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में स्थापित करना था.

राज्य सरकार ने वर्ष 2029-30 तक उत्तर प्रदेश को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में बदलने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है, और इस लक्ष्य को हासिल करने में अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. उत्तर प्रदेश सरकार के प्रयासों से लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये के समझौते और एमओयू (MoU) साइन किए गए, जबकि 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए. कुल मिलाकर देखा जाए तो करीब 4 लाख करोड़ रुपये के संभावित निवेश का रास्ता खुल सकता है. माना जा रहा है कि इन परियोजनाओं से आने वाले समय में पांच लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है.

इन निवेश योजनाओं में उन क्षेत्रों पर खास ध्यान दिया गया है, जो आज भारत के औद्योगिक विकास के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं. इनमें सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, लॉजिस्टिक्स, फिनटेक, विमानन मरम्मत और रखरखाव (MRO), ऑटोमोबाइल निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे आधुनिक क्षेत्र शामिल हैं. इससे साफ है कि राज्य सरकार अब नई तकनीक और भविष्य की उद्योगों पर फोकस कर रही है.

इस पूरी प्रक्रिया में जापान की भागीदारी भी काफी अहम रही. कई जापानी और भारतीय कंपनियों के साथ औद्योगिक और तकनीकी सहयोग पर चर्चा हुई, ताकि उत्तर प्रदेश में उद्योगों का विस्तार हो सके और नई तकनीक का विकास हो. इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल ग्रीन हाइड्रोजन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने की रही, जिसमें जापान की यूनिवर्सिटी और भारत के प्रमुख संस्थान जैसे आईआईटी कानपुर और आईआईटी बीएचयू भी शामिल हैं. यह सहयोग अनुसंधान और नई तकनीकों के विकास को बढ़ावा देगा.

सिंगापुर में बड़े निवेशकों, वित्तीय संस्थानों और व्यापारिक नेताओं के साथ बैठकें हुईं. इन बैठकों में बुनियादी ढांचा, डिजिटल तकनीक और नए वित्तीय अवसरों पर चर्चा हुई. साथ ही उत्तर प्रदेश की कला और हस्तशिल्प को भी दुनिया के सामने प्रस्तुत किया गया और प्रवासी भारतीयों से बातचीत की गई. विशेषज्ञों का मानना है कि अब राज्य खुद भी विदेशों से निवेश लाने की कोशिश कर रहे हैं. अगर केंद्र और राज्य मिलकर काम करें, तो इससे भारत की अर्थव्यवस्था और वैश्विक पहचान दोनों मजबूत हो सकती हैं.


यह लेख मूल रूप से फाइनेंशियल एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ था. 

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Harsh V. Pant

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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...

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