Author : Harsh V. Pant

Originally Published टाइम Published on Dec 09, 2025 Commentaries 7 Days ago

पुतिन का दिल्ली आना उस समय हुआ जब रूस ने यूक्रेन पर किसी भी समझौते की गुंजाइश लगभग ख़त्म कर दी थी. यह मुलाक़ात दिखाती है कि वैश्विक तनावों के बीच भी भारत अपने रणनीतिक रास्ते खुद तय कर रहा है.

दिल्ली में पुतिन- क्या बदला और क्या बदलने वाला है?

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जब रूस ने एक बार फिर साफ़ कर दिया कि यूक्रेन के युद्ध को लेकर शांति वार्ता आगे बढ़ाने का उसका कोई वास्तविक इरादा नहीं है, उसी समय व्लादिमीर पुतिन दिल्ली पहुंचे जहां रेड कार्पेट पर उनका स्वागत किया गया. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 दिसंबर को कूटनीतिक प्रोटोकॉल तोड़ते हुए हवाई अड्डे पर हाथ मिलाकर और गले लगाकर पुतिन का स्वागत किया. इस दृश्य ने ये याद दिलाया कि दुनिया के महत्वपूर्ण हिस्सों में भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से रूस को खारिज नहीं किया गया है और अमेरिका के साथ ख़राब होते संबंधों के बीच अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को दिखाने के लिए भारत के पास ये एक अवसर था. 

  • पुतिन ऐसे समय दिल्ली आए जब रूस ने यूक्रेन पर समझौते की गुंजाइश लगभग खत्म कर दी थी।
  • मुलाकात बताती है—तनावों के बावजूद भारत अपना रणनीतिक रास्ता खुद चुन रहा है।
  • यह दृश्य बताता है—रूस भू-राजनीतिक रूप से खारिज नहीं; भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता दिखाने का अवसर लिया।

रूस से तेल ख़रीदने की वजह से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगाया है जो दुनिया में सबसे ज़्यादा दरों में से एक है. अमेरिका के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने तो यहां तक कह दिया कि यूक्रेन में रूस का मौजूदा युद्ध “मोदी का युद्ध” है क्योंकि भारत ने रूस से तेल की ख़रीद बहुत बढ़ाई है (आक्रमण से पहले 0.2% की तुलना में आज के समय में 40%). पीटर नवारो ने ये भी कहा कि “शांति का रास्ता कुछ हद तक भारत से होकर गुज़रता है.”

इसके परिणामस्वरूप व्यापार, H1-B वीज़ा, पाकिस्तान और चीन के साथ G-2 के लिए ट्रंप के ज़ोर को लेकर मतभेद बने हुए हैं. ये अलग बात है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है. इस मतभेद की वजह से अमेरिका की दशकों पुरानी वो नीति नाकाम हो जाएगी जिसके तहत इंडो-पैसिफिक में चीन के उदय को काबू में रखने के लिए भारत को अमेरिका महत्वपूर्ण मानता था. 

"रूस से तेल ख़रीदने की वजह से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगाया है जो दुनिया में सबसे ज़्यादा दरों में से एक है."

स्पष्ट रूप से भारत को लेकर ट्रंप प्रशासन का दृष्टिकोण अदूरदर्शी रहा है. ये अदूरदर्शिता न केवल पुतिन के वर्तमान भारत दौरे में दिख रही थी बल्कि सितंबर में चीन के तियानजिन में शंघाई सहयोग शिखर सम्मेलन में शामिल होने के फैसले में भी दिखी थी जहां उन्होंने पुतिन और शी जिनपिंग के साथ हाथ मिलाते हुए मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान किया. जिस तरह ट्रंप और उनके कई वरिष्ठ सलाहकारों ने हाल के महीनों में सार्वजनिक रूप से भारत की आलोचना की है, वो घरेलू स्तर पर मोदी के लिए एक राजनीतिक बोझ बन गया है. पिछले दो दशकों के दौरान भारत जिस तरह अमेरिका के करीब हो गया है, उसको लेकर भारत में एक बहस शुरू हो गई है. 

पुतिन की यात्रा के एजेंडे में ऊर्जा, रक्षा, नागरिक उड्डयन, महत्वपूर्ण खनिज, निवेश परियोजनाएं और श्रमिकों का प्रवासन शामिल थे. भारत अभी भी चाहता है कि रूस महत्वपूर्ण सैन्य उपकरणों (जिनमें 2018 के समझौते के तहत दो S-400 मिसाइल रक्षा यूनिट शामिल हैं और यूक्रेन युद्ध की वजह से जिसमें देरी हुई है) की सप्लाई में तेज़ी लाए और दोनों पक्षों ने रक्षा तालमेल का और विस्तार करने के लिए सहमति जताई है. फिर भी हाल के वर्षों में भारत के हथियार आयात में रूस का हिस्सा आधा हो गया है, वैसे रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना हुआ है. यूक्रेन युद्ध में फंसे रूस के साथ-साथ अन्य देशों से अपने हथियारों की सप्लाई में विविधता लाने पर भारत का लगातार ज़ोर आगे चलकर गहरे द्विपक्षीय रक्षा संबंधों में बाधा बनेगा. 

"हाल के वर्षों में भारत के हथियार आयात में रूस का हिस्सा आधा हो गया है, वैसे रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना हुआ है."

यही कारण है कि पुतिन की यात्रा के एजेंडे में व्यापार और अर्थशास्त्र का दबदबा रहा. शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पुतिन और मोदी ने 2030 तक के आर्थिक सहयोग के कार्यक्रम की रूपरेखा पेश की लेकिन दोनों देशों के बीच रिकॉर्ड व्यापार का स्तर मुख्य रूप से तेल के कारण है और लगता है कि आने वाले समय में ये समाप्त होने वाला है. रूस की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों रॉसनेफ्ट और लुकऑयल पर अमेरिका के द्वारा पिछले दिनों प्रतिबंधों की घोषणा से इस व्यापार पर काफी असर पड़ेगा. भारत की बड़ी रिफाइनरियों ने पहले ही रूस को तेल का नया ऑर्डर देना बंद कर दिया है. इसके अलावा, द्विपक्षीय व्यापार काफी हद तक रूस के पक्ष में झुका हुआ है इसलिए भारत अब रूस के बाज़ारों तक अधिक पहुंच की मांग कर रहा है, विशेष रूप से फार्मास्यूटिकल, मशीनरी और कृषि उत्पादों में. पुतिन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए “बिना रुकावट” ईंधन की सप्लाई का वादा किया. 

"भारत की बड़ी रिफाइनरियों ने पहले ही रूस को तेल का नया ऑर्डर देना बंद कर दिया है."

कुछ मायनों में पुतिन की यात्रा ठोस होने की तुलना में अधिक सांकेतिक है. इस दौरान रूस और भारत के बीच किसी बड़े रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए. महत्वपूर्ण खनिजों, असैन्य परमाणु ऊर्जा और जहाज़ निर्माण पर समझौते हुए लेकिन वर्तमान तेल व्यापार की तुलना में ये बहुत छोटे हैं. यात्रा के दौरान मोदी ने सावधानी से ये कहा कि यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत तटस्थ नहीं है बल्कि वो ‘शांति के पक्ष’ में खड़ा है. 

"यात्रा के दौरान मोदी ने सावधानी से ये कहा कि यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत तटस्थ नहीं है बल्कि वो ‘शांति के पक्ष’ में खड़ा है."

जब भारत और रूस उभरती भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक वास्तविकताओं का सामना कर रहे हैं, उस समय दोनों देशों के सामने महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं. मोदी और पुतिन ने साफ कर दिया है कि वो आगे भी द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने का इरादा रखते हैं. ऐसा लगता है कि उन्हें ये भी मालूम है कि ऐतिहासिक रक्षा संबंध और तेल व्यापार में अस्थायी तेज़ी ही बातचीत जारी रखने की अकेली बुनियाद नहीं हो सकती है. भारत-रूस संबंधों को और मज़बूत बनाने में आने वाली कई बाधाओं से अमेरिका को संतुष्टि मिल सकती है. लेकिन पुतिन का दौरा ट्रंप के लिए एक चेतावनी के रूप में काम करना चाहिए कि हाल के दिनों में भारत को लेकर उनका जो नज़रिया है, वो काम नहीं आने वाला है. 

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