शांति प्रयासों में प्रगति के बावजूद होर्मुज में सैन्य तनाव बरकरार है. लगभग रोज़ाना झड़पें हो रही हैं और ईरान का परमाणु कार्यक्रम सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है.
पिछले हफ्ते ट्रंप ने दावा किया था कि युद्ध समाप्त करने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच समझौता लगभग तय हो चुका है. लेकिन अमेरिका में इजराइल की हिमायत करने वाले अपने समर्थकों की आलोचना झेलने के बाद वे कहने लगे कि उन्हें समझौते की जल्दी नहीं. वे अब सभी मुस्लिम देशों और इजराइल के बीच एक व्यापक शांति समझौते का विचार ले आए हैं. पर युद्ध के लंबा खिंचने का भारत पर बड़ा असर पड़ेगा.
सऊदी अरब, यूएई, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन के नेताओं के साथ एक कॉन्फ्रेंस कॉल में ट्रंप ने एक नया राग अलाप दिया. उन्होंने इन सभी देशों से ‘अनिवार्य’ रूप से अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने का आग्रह किया. अब्राहम अकॉर्ड्स अमेरिकी मध्यस्थता में हुए वे समझौते हैं. जिनका उद्देश्य इजराइल और मध्य पूर्व के मुस्लिम बहुल देशों के बीच राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को औपचारिक रूप देना है. ट्रंप ने यह कॉल युद्ध समाप्त करने के लिए प्रस्तावित एमओयू और अंतरिम समझौते पर चर्चा के लिए किया था. लेकिन उन्होंने अचानक बातचीत का रुख बदल दिया.
आसिम मुनीर ने इस विचार को सबसे पहले खारिज करते हुए कहा कि इससे मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की भूमिका कमजोर होगी. साथ ही यह फिलिस्तीन मसला हल करने के लिए ‘दो राष्ट्र’ समाधान के समर्थन में पाकिस्तान के लंबे समय से चले आ रहे रुख के खिलाफ भी होगा. ईरान ने भी ट्रंप का सुझाव खारिज कर दिया. सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पहले कूटनीतिक चुप्पी साधी, लेकिन बाद में स्पष्ट कर दिया कि उन्हें भी यह स्वीकार नहीं. पहले से इजरायल को मान्यता दे रहे तुर्किये, मिस्र और जॉर्डन जैसे देश भी असहज स्थिति में आ गए.ईरानी सैन्य अधिकारियों ने खुले तौर पर कह दिया है कि वे अपनी भौगोलिक संप्रभुता या भू-राजनीतिक स्थिति को नहीं छोड़ेंगे. होर्मुज ईरानी सेना के नियंत्रण में रहेगा.
शांति के लिए प्रस्तावित एमओयू को दोनों पक्षों ने सैद्धांतिक तौर पर स्वीकार लिया है. जिन बातों पर सहमति बनी है, उनमें अस्थायी युद्धविराम, चरणबद्ध तरीके से होर्मुज खोलना, ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकाबंदी खत्म करना और लेबनान में लड़ाई खत्म करना शामिल है. लेकिन अभी भी कुछ बड़े मसले अनसुलझे हैं.
मसलन, परिष्कृत यूरेनियम सौंपने की समय सीमा, कतर के बैंकों में जमा ईरान की 20 अरब डॉलर की संपत्तियां रिलीज करना और अब्राहम अकॉर्ड्स का विस्तार. दरअसल, ईरान का कहना है कि परमाणु मुद्दा एमओयू का हिस्सा नहीं है और इस पर चर्चा केवल एमओयू पर सहमति होने के बाद 60 दिन की बातचीत अवधि में ही होगी.
प्रस्तावित एमओयू की प्रमुख सैन्य शर्तों में दोनों ओर से नौसेना की नाकेबंदियों को घटाना, वैश्विक समुद्री मार्गों को बहाल करना और सीमा-पार सैन्य संघर्ष रोकना शामिल है. ईरान होर्मुज पर लगाए प्रतिबंधों को हटाने पर सहमत हो गया है. वह अपनी नौसेना द्वारा लगाई गई बारूदी सुरंगों को हटाएगा और जहाजों की आवाजाही को बिना कोई अनिवार्य शुल्क लगाए युद्ध से पहले की स्थिति पर लौटने देगा.
हालांकि ईरानी सैन्य अधिकारियों ने खुले तौर पर कह दिया है कि वे अपनी भौगोलिक संप्रभुता या भू-राजनीतिक स्थिति को नहीं छोड़ेंगे. होर्मुज ईरानी सेना के नियंत्रण में रहेगा. अमेरिकी सेना ने भी ईरानी बंदरगाहों पर लगाई नौसैनिक नाकाबंदी पूरी तरह हटाने पर सहमति जताई है.
ईरान कहता आया है कि उसने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए हैं और वह कोई परमाणु हथियार बना भी नहीं रहा है. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी का भी मानना है कि ईरान का कोई परमाणु हथियार कार्यक्रम नहीं है.
इससे ईरान पहले की भांति समुद्री व्यापार और कच्चे तेल का निर्यात कर पाएगा. अमेरिका ईरानी तट के आसपास से अपनी हमलावर नौसैनिक इकाइयों को हटाएगा. समझौते में इजराइल और हिज्बुल्लाह के बीच युद्धविराम लागू करने की बात भी है. हालांकि, अमेरिका और इजराइल लेबनान को अलग मामला बताते रहे हैं.
शांति के प्रयासों में प्रगति के बावजूद सैन्य तनाव अब भी बना हुआ है, खासकर होर्मुज में. लगभग रोजाना झड़पें हो रही हैं. सबसे बड़ा मुद्दा ईरान की परमाणु क्षमता है. ईरान कहता आया है कि उसने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए हैं और वह कोई परमाणु हथियार बना भी नहीं रहा है. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी का भी मानना है कि ईरान का कोई परमाणु हथियार कार्यक्रम नहीं है. इसके बावजूद अमेरिका मांग कर रहा है कि ईरान अपना 60% तक परिष्कृत 440.9 किलो यूरेनियम उसे या किसी तीसरे देश को सौंप दे.
अमेरिका और ईरान के बीच अभी भी कई मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है. हमारे यहां ईंधन की कीमतें चार बार बढ़ाई जा चुकी हैं. अभी तक हमने स्थिति को संभाले रखा है, लेकिन संघर्ष लंबा खींचता है तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
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Manoj Joshi is a Distinguished Fellow at the ORF. He has been a journalist specialising on national and international politics and is a commentator and ...
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