Author : Harsh V. Pant

Published on May 19, 2026 Commentaries 0 Hours ago
बढ़ते वैश्विक तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीन यात्रा ने संकेत दिया कि अमेरिका और चीन अब सीधी टक्कर नहीं बल्कि ‘नियंत्रित प्रतिस्पर्धा’ का रास्ता चुन रहे हैं. लेख से जानें आखिर क्यों दोनों देश रिश्तों में संतुलन बनाए रखना चाहते हैं. 
ट्रंप-शी मुलाकात: क्यों साथ चलना मजबूरी?

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राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हाल की चीन यात्रा का मकसद दुनिया की दो बड़ी ताकतों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा को संभालना था. ट्रंप और शी जिनपिंग ने रिश्तों में स्थिरता और आपसी सम्मान बनाए रखने पर बातचीत की. कोई बड़ा समझौता नहीं हुआ, लेकिन दोनों देशों ने संबंध बेहतर और शांत रखने के लिए कुछ छोटे कदम उठाने पर सहमति जताई. इससे यह साफ है कि दोनों देश तनाव और टकराव बढ़ने के खतरे को समझते हैं.

इस सप्ताह चीन की अपनी राजकीय यात्रा के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने यह साफ कर दिया कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका-चीन संबंध अब भी सबसे महत्वपूर्ण हैं. लगभग नौ साल बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की बीजिंग यात्रा हुई है और ऐसे समय में हुई है जब दोनों देशों के रिश्ते लगातार अधिक प्रतिस्पर्धी और तनावपूर्ण बने हुए हैं. ट्रंप और शी जिनपिंग की यह मुलाकात किसी बड़े रणनीतिक बदलाव से ज्यादा दो शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता को नियंत्रित करने की कोशिश थी, क्योंकि दोनों ही अनियंत्रित टकराव की कीमत को समझते हैं.

यह यात्रा ऐसे समय हुई जब व्यापार विवाद, तकनीकी मुकाबला, ताइवान तनाव और ईरान संकट के कारण दुनिया में अस्थिरता बढ़ रही है. मार्को रुबियो, पीट हेगसेथ और स्कॉट बेसेंट जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एलन मस्क, टिम कुक और जेनसन हुआंग जैसे बड़े कारोबारी चेहरे भी मौजूद थे. इससे स्पष्ट हुआ कि आर्थिक कूटनीति और तकनीकी प्रतिस्पर्धा अभी भी अमेरिका-चीन संबंधों के केंद्र में हैं.

ट्रंप की यात्रा का महत्व  

पूरी यात्रा को बेहद सावधानी से तैयार किया गया था. शी जिनपिंग ने ट्रंप का स्वागत उसी भव्यता के साथ किया जो चीन केवल बड़े भू-राजनीतिक अवसरों पर दिखाता है. चीन में ट्रंप का स्वागत बड़े सम्मान के साथ किया गया. दोनों नेताओं ने अच्छे रिश्ते और शांति बनाए रखने की बात कही, लेकिन अंदरूनी तौर पर अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा बनी रही. यह यात्रा ऐसे समय हुई जब व्यापार विवाद, तकनीकी मुकाबला, ताइवान तनाव और ईरान संकट के कारण दुनिया में अस्थिरता बढ़ रही है. मार्को रुबियो, पीट हेगसेथ और स्कॉट बेसेंट जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एलन मस्क, टिम कुक और जेनसन हुआंग जैसे बड़े कारोबारी चेहरे भी मौजूद थे. इससे स्पष्ट हुआ कि आर्थिक कूटनीति और तकनीकी प्रतिस्पर्धा अभी भी अमेरिका-चीन संबंधों के केंद्र में हैं.

ट्रंप ने एक बार फिर शी जिनपिंग के साथ व्यक्तिगत कूटनीति पर भरोसा दिखाया. ट्रंप प्रशासन के लिए यह यात्रा व्यावहारिक हितों से प्रेरित थी. ट्रंप ऐसे परिणाम चाहते थे जिन्हें अमेरिका में अपनी सफलता के रूप में पेश किया जा सके. इनमें चीन द्वारा अमेरिकी कृषि, एयरोस्पेस और ऊर्जा उत्पादों की अधिक खरीद, रेयर अर्थ और महत्वपूर्ण खनिजों तक बेहतर पहुंच, फेंटानिल से जुड़े रसायनों पर सहयोग और ईरान संकट को नियंत्रित करने में चीन का समर्थन शामिल था, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर. इसके बावजूद ट्रंप ने शी जिनपिंग के साथ व्यक्तिगत संवाद की अपनी नीति जारी रखी, क्योंकि वे मानते हैं कि नेताओं के बीच भरोसा तनाव कम करने में मदद कर सकता है.

बीजिंग के उद्देश्य भी पूरी तरह स्पष्ट थे. चीन इस अस्थिर रिश्ते में स्थिरता और भरोसेमंद माहौल चाहता था. ऐसे समय में जब चीनी अर्थव्यवस्था कई दबावों का सामना कर रही है, शी जिनपिंग का ध्यान टैरिफ, निवेश प्रतिबंधों और तकनीकी नियंत्रणों से जुड़ी अनिश्चितताओं को कम करने पर था. चीन ने ईरान जैसे वैश्विक मुद्दों पर खुद को एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में पेश करने की कोशिश भी की. साथ ही उसने ताइवान पर अपना सख्त रुख दोहराया, जिसे शी ने एक बार फिर दोनों देशों के रिश्तों का सबसे संवेदनशील मुद्दा बताया.

भारत की चुनौती यह होगी कि वह ऐसे माहौल में संतुलन बनाए रखे, जहां अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा जारी रहे, लेकिन ज्यादा नियंत्रित और व्यावहारिक तरीके से. ट्रंप की चीन यात्रा से अमेरिका-चीन रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया. इससे सिर्फ यह साफ हुआ कि न तो सीधा टकराव और न ही पूरी दोस्ती दोनों देशों के लिए सही रास्ता है.

इस शिखर वार्ता के नतीजे सीमित रहे लेकिन पूरी तरह महत्वहीन नहीं थे. कोई बड़ा समझौता या ऐतिहासिक सफलता नहीं मिली और न ही ऐसा कोई संयुक्त बयान आया जिससे रणनीतिक बदलाव का संकेत मिलता. इसके बजाय दोनों देशों ने संबंधों को स्थिर बनाए रखने के लिए छोटे लेकिन व्यावहारिक कदमों पर ध्यान दिया. ईरान के मुद्दे पर दोनों देश इस बात पर सहमत दिखे कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुला रहना चाहिए और ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाने चाहिए. इससे यह साफ हुआ कि मध्य पूर्व में लंबे समय तक अस्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्था और घरेलू आर्थिक हितों के लिए खतरा बन सकती है. हालांकि बड़े रणनीतिक मुद्दों पर मतभेद अब भी बने हुए हैं.

संतुलित प्रतिस्पर्धा

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अमेरिका और चीन दोनों अब यह समझते हैं कि बिना किसी नियंत्रण के बढ़ती प्रतिस्पर्धा खतरनाक हो सकती है. इसलिए यह यात्रा विवाद खत्म करने से ज्यादा ‘नियंत्रित प्रतिस्पर्धा’ को मजबूत करने की कोशिश थी. ताइवान, तकनीकी निर्यात नियंत्रण और इंडो-पैसिफिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर तनाव अब भी बना हुआ है. भारत के लिए इसका असर काफी जटिल है. अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा ने इंडो-पैसिफिक में भारत की अहमियत बढ़ाई है और ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति से भारत को आर्थिक अवसर भी मिले हैं. लेकिन यदि वाशिंगटन और बीजिंग के रिश्तों में लंबे समय तक नरमी आती है, तो भारत को यह चिंता रह सकती है कि अमेरिका में उसकी अहमियत कुछ कम हो जाए.

भारत नहीं चाहता कि अमेरिका और चीन के बीच सीधा टकराव हो. दोनों देशों के रिश्तों में स्थिरता रहने से दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और सप्लाई चेन सुरक्षित रहती हैं, जो भारत के लिए भी बहुत जरूरी हैं. भारत की चुनौती यह होगी कि वह ऐसे माहौल में संतुलन बनाए रखे, जहां अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा जारी रहे, लेकिन ज्यादा नियंत्रित और व्यावहारिक तरीके से. ट्रंप की चीन यात्रा से अमेरिका-चीन रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया. इससे सिर्फ यह साफ हुआ कि न तो सीधा टकराव और न ही पूरी दोस्ती दोनों देशों के लिए सही रास्ता है. अब दुनिया एक लंबे दौर की प्रतिस्पर्धा देखेगी, जिसमें सहयोग भी होगा और अविश्वास भी बना रहेगा.


यह लेख मूल रूप से द इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित हुआ था. 
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Harsh V. Pant

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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...

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