इस महीने की शुरुआत में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की भारत यात्रा ने द्विपक्षीय रिश्तों में बदलाव की राह दिखाई – जानें कैसे यह यात्रा रक्षा, हरित प्रौद्योगिकी और रणनीतिक साझेदारी में नए अध्याय की शुरुआत कर रही है.
इस महीने की शुरुआत में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की भारत यात्रा से द्विपक्षीय संबंधों में एक शांत लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव दिखा. भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी के 25 साल और राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे होने के मौके पर अहमदाबाद और दिल्ली में कार्यक्रम आयोजित किए गए. इस दो दिवसीय कार्यक्रम का महत्व सिर्फ प्रतीकात्मकता नहीं बल्कि उससे कहीं ज़्यादा था. इस यात्रा की सबसे बड़ी कामयाबी रक्षा औद्योगिक सहयोग रोडमैप पर संयुक्त आशय घोषणापत्र था. यह भारत और यूरोप के बीच रक्षा संबंधों में लंबे समय से चले आ रहे क्रेता-विक्रेता मॉडल में आए एक स्पष्ट बदलाव को दिखाता है.
मिलिट्री प्लेटफार्म के सह-विकास और सह-उत्पादन के लिए प्रतिबद्धता जताकर जर्मनी ने भारत की एक बड़ी मुश्किल दूर की है. बर्लिन ने निर्यात नियंत्रणों में ढिलाई देने और संवेदनशील तकनीकी के हस्तांतरण को सुविधाजनक बनाने की अपनी तत्परता का संकेत दिया है. यह एक ऐसा मुद्दा है जिसने ऐतिहासिक रूप से रक्षा सहयोग को बाधित किया है.
फ्रेडरिक मर्ज़ के प्रतिनिधिमंडल में जर्मनी के पनडुब्बी उद्योग के वरिष्ठ प्रतिनिधि भी शामिल थे. यही वजह है कि भारत की छह उन्नत पारंपरिक पनडुब्बियों की खरीद की लंबे समय से लंबित परियोजना में ठोस प्रगति भी दिखी.
रक्षा क्षेत्र से परे, इस यात्रा ने बढ़ते संरक्षणवाद और भू-राजनीतिक विखंडन के युग में आपूर्ति श्रृंखला की कमज़ोरियों को लेकर बढ़ती चिंताओं को भी दर्शाया. सरकारी स्तर पर निवेश संबंधी विचार-विमर्श में कारोबारी क्षेत्र के दिग्गजों को शामिल करने के उद्देश्य से सीईओ फोरम का गठन किया गया.
भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी के 25 साल और राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे होने के मौके पर अहमदाबाद और दिल्ली में कार्यक्रम आयोजित किए गए. इस दो दिवसीय कार्यक्रम का महत्व सिर्फ प्रतीकात्मकता नहीं बल्कि उससे कहीं ज़्यादा था.
सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिजों और दूरसंचार पर हुए समझौतों ने चीन पर अत्यधिक निर्भरता से जोखिम कम करने के साझा उद्देश्य को और मज़बूत किया. इस संदर्भ में, फ्रेडरिक मर्ज़ का यह आशावाद राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था कि भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता 2026 की शुरुआत तक संपन्न हो सकता है.
सतत विकास इस विकसित होती साझेदारी का एक और महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा. हरित और सतत विकास साझेदारी के तहत जर्मनी की अतिरिक्त 1.24 अरब यूरो मदद की प्रतिबद्धता भारत के ऊर्जा परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों को लक्षित करती है. इसमें हरित हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और जलवायु-ज़ोखिमों से निपटने में सक्षम शहरी अवसंरचना निर्माण शामिल हैं. भारत की एएम ग्रीन और जर्मनी की यूनिपर कंपनी के बीच हुए हरित अमोनिया अधिग्रहण समझौते ने यह दिखाया कि जलवायु सहयोग को औद्योगिक रणनीति और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा से किस प्रकार जोड़ा जा रहा है.
इस यात्रा में कुछ ऐसे पहलुओं पर भी चर्चा हुई जो देखने में भले छोटे लगें लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं. भारतीय पासपोर्ट धारकों के लिए वीज़ा-फ्री एयरपोर्ट ट्रांज़िट सुविधा शुरू की गई. उच्च शिक्षा के लिए एक नया रोडमैप बनाया गया. इसके तहत जर्मन विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना और भारतीय पेशेवरों की नैतिक भर्ती को सुविधाजनक बनाना शामिल है.
कुल मिलाकर, इन पहलों ने भारत की "विकसित भारत" महत्वाकांक्षाओं का जर्मनी की रणनीतिक लचीलेपन की व्यापक खोज के साथ तालमेल बिठाया. महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थितियां तेज़ी से प्रभावित हो रही है. ऐसे में जर्मनी को लग रहा है कि संतुलित क्षेत्रीय व्यवस्था को बनाए रखने में भारत एक महत्वपूर्ण भागीदार साबित हो सकता है.
भारतीय पासपोर्ट धारकों के लिए वीज़ा-फ्री एयरपोर्ट ट्रांज़िट सुविधा शुरू की गई. उच्च शिक्षा के लिए एक नया रोडमैप बनाया गया. इसके तहत जर्मन विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना और भारतीय पेशेवरों की नैतिक भर्ती को सुविधाजनक बनाना शामिल है.
भारत-यूरोप संबंधों में यह गति आने वाले महीनों में भी जारी रहेगी. भारत-एआई इम्पैक्ट समिट में शामिल होने के लिए फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन 19-20 फरवरी को भारत आएंगे. उनकी यह यात्रा उभरती प्रौद्योगिकियों पर भारत के साथ यूरोप की बढ़ती भागीदारी को उजागर करती है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सह-अध्यक्षता में आयोजित यह शिखर सम्मेलन वैश्विक एआई चर्चा में एक सुनियोजित बदलाव का प्रतीक है. ये भारत के इस दावे को भी मज़बूत करता है कि अग्रणी प्रौद्योगिकियों के लाभ पश्चिम देशों के अलावा दूसरों को भी मिलने चाहिए. 26 और 27 जनवरी को यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन की राजकीय यात्रा एक और संबंधों में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हुई. इस दौरान भारत और यूरोपियन यूनियन में एक बड़ी डील भी साइन हुई, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा गया.
भारत-यूरोपीय संघ के संबंध रणनीतिक चिंताओं और आर्थिक अवसरों के संगम से आकार ले रहे हैं. तेजी से अस्थिर हो रही वैश्विक व्यवस्था, चीन की आक्रामकता और ट्रंप की नेतृत्व में अमेरिकी एकतरफावाद नीतियों ने अनिश्चितताओं को जन्म दिया है. इसने भी दोनों पक्षों को मज़बूत समन्वय की ओर प्रेरित किया है, विशेष रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में. व्यापार, निवेश संरक्षण और आपूर्ति श्रृंखला की मज़बूती पर बातचीत किसी एक बाज़ार पर बहुत ज़्यादा निर्भरता से बचाव की कोशिशों को दर्शाती है.
व्यवस्थागत उथल-पुथल के इस दौर में, भारत और यूरोपीय संघ दोनों ही एक ऐसे बहुध्रुवीय व्यवस्था की तलाश में हैं जो महाशक्तियों की बढ़ती प्रतिद्वंद्विता के बीच उनकी रणनीतिक स्वायत्तता को संरक्षित रखे.
डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और सेमीकंडक्टर से लेकर हरित हाइड्रोजन तक में सहयोग हो रहा है. जलवायु वित्त, तकनीकी और स्थिरता जुड़ाव के प्रमुख घटन के रूप में उभर रहे हैं. फिर भी, मुख्य रूप से यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म जैसे नियामक उपकरणों, मानकों और शासन के प्रति अलग दृष्टिकोणों को लेकर मतभेद बने हुए हैं.
मानवाधिकारों और नियामक प्रथाओं पर मानक मतभेद भी समय-समय पर सामने आते रहते हैं, भले ही शिक्षा, गतिशीलता और अनुसंधान के बढ़ते संबंध इस रिश्ते को मज़बूती प्रदान करते हों. व्यवस्थागत उथल-पुथल के इस दौर में, भारत और यूरोपीय संघ दोनों ही एक ऐसे बहुध्रुवीय व्यवस्था की तलाश में हैं जो महाशक्तियों की बढ़ती प्रतिद्वंद्विता के बीच उनकी रणनीतिक स्वायत्तता को संरक्षित रखे. यही साझा भावना भारत और यूरोप को एक-दूसरे के करीब लाई है.
ये लेख फाइनेंशियल एक्सप्रेस में प्रकाशित हो चुका है.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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