Author : Srijan Shukla

Published on Feb 10, 2026 Commentaries 0 Hours ago

अमेरिकी फेडरल रिज़र्व बैंक की आज़ादी पर हर जगह बहस हो रही है लेकिन क्या आप जानते हैं इसकी असली कहानी? इस लेख में पढ़ें क्यों यह बहस सिर्फ़ ब्याज दरों तक सीमित नहीं है, पूरा समझें.

फेड की आज़ादी पर बहस: इतिहास में छिपा सच

अमेरिकी फेडरल रिज़र्व बैंक की आज़ादी को लेकर चल रही बहस के बीच सबसे दिलचस्प है इसे लेकर हो रही सार्वजनिक चर्चा. लोगों ने निष्कर्ष पहले तय कर लिए हैं और उसके पक्ष में अपनी-अपनी दलील दे रहे हैं. मौजूदा बातचीत में केंद्रीय बैंकों की आज़ादी को उनका स्वभाविक अधिकार माना जा रहा है. उस राजनीतिक आर्थिक समझौते का ज़िक्र ही नहीं होता है, जिसने फेडरल बैंक की आज़ादी की नींव रखी थी.

केंद्रीय बैंकों की आज़ादी, खासकर फेड के विकास की कहानी में बड़ी मैक्रोइकोनॉमी और छिपी हुई लागतों के किस्से भी शामिल हैं. यही कहानी दुनिया भर में अलग-अलग जगहों पर भी देखने को मिलती है.

फेडरल बैंक की भूमिका 

द्वितीय विश्वयुद्ध के तुरंत बाद के समय में, जर्मन बुंदेसबैंक असल में एकमात्र स्वतंत्र सेंट्रल बैंक था. कागजों पर, अमेरिकी फेड को 1951 के ट्रेजरी-फेडरल रिज़र्व समझौते से आज़ादी मिली. हालांकि, अगले लगभग तीन दशकों तक, यह आज़ादी असलियत से ज़्यादा सिर्फ कागजों पर थी.1965 में, टैक्स में कटौती, बढ़ते सामाजिक खर्च और वियतनाम युद्ध की वजह से जब अमेरिका में महंगाई बहुत बढ़ गई तो राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने फेड चेयरमैन मैकचेसनी मार्टिन को अपने टेक्सास वाले घर बुलाया और इंटरेस्ट रेट ना बढ़ाने के लिए उन्हें फटकार लगाई. मार्टिन ने उस समय विरोध करने की कोशिश की लेकिन कुछ साल बाद उन्हें हार माननी पड़ी.

न्यूज़ीलैंड 1989 में कीमत-स्थिरता जनादेश अपनाने वाला पहला देश था, जिसके बाद 1997 में बैंक ऑफ़ इंग्लैंड ने इसे अपनाया. 1998 में स्थापित यूरोपियन सेंट्रल बैंक को केंद्रीय बैंकों की स्वायत्तता को सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया था. हालांकि, स्कंदा अमरनाथ और माइक कोंज़ल ने ब्लूमबर्ग के ऑड लॉट्स पॉडकास्ट पर तर्क दिया कि, वोल्कर शॉक ने फेड की आज़ादी के साथ ही कुछ और महत्वपूर्ण चीज़ों की शुरुआत की.

अगले फेड चेयरमैन, आर्थर बर्न्स ने स्वायत्तता का दिखावा करना भी छोड़ दिया. सरकार की इच्छा के मुताबिक पैसे की सप्लाई में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी की, साथ ही मज़दूरी-कीमत पर कंट्रोल भी लगाया. इसका नतीजा यह हुआ कि 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के दोबारा चुनाव लड़ने के लिए एकदम सही समय पर बिना महंगाई वाली वृद्धि में तेज़ी आई. हालांकि, कुछ समय बाद आखिरकार महंगाई आ ही गई. 70 के दशक के ओपेक (OPEC) के झटकों ने इसे बहुत ज़्यादा मुश्किल बना दिया. 1970 के दशक में, इसी तरह की महंगाई की वजह से ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और जापान जैसी दूसरी अर्थव्यवस्थाएं भी बर्बाद हो गईं. ज़ाहिर है, 60 और 70 के दशक को ग्रेट इन्फ्लेशन पीरियड के नाम से जाना जाने लगा. बड़ी आर्थिक नीतियां ज़्यादातर राजकोषीय नीति के बारे में थी और मौद्रिक नीति ज़्यादा मायने नहीं रखती थी, खासकर अमेरिका में.

1979 में फेड चेयरमैन पॉल वोल्कर के कार्यकाल में यह स्थिति पूरी तरह बदल गई. महंगाई को काबू पाने के लिए उन्होंने ब्याज दर को दोहरे अंकों में पहुंचा दिया. उनकी आज़ादी फेड के 1977 के दोहरे मकसद यानी वृद्धि और कीमतों में स्थिरता लाने पर टिकी थी. वोल्कर शॉक के साथ ही फेड की आज़ादी आई. हालांकि, इसके पीछे ये राजनीतिक अर्थनीति बनी कि महंगाई को कम रखना होगा.

यह आम सहमति जल्द ही पूरी दुनिया में फैल गई. न्यूज़ीलैंड 1989 में कीमत-स्थिरता जनादेश अपनाने वाला पहला देश था, जिसके बाद 1997 में बैंक ऑफ़ इंग्लैंड ने इसे अपनाया. 1998 में स्थापित यूरोपियन सेंट्रल बैंक को केंद्रीय बैंकों की स्वायत्तता को सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया था. हालांकि, स्कंदा अमरनाथ और माइक कोंज़ल ने ब्लूमबर्ग के ऑड लॉट्स पॉडकास्ट पर तर्क दिया कि, वोल्कर शॉक ने फेड की आज़ादी के साथ ही कुछ और महत्वपूर्ण चीज़ों की शुरुआत की. इसमें एक था; नव-उदारवाद.

मौद्रिक नीति का महत्व

यहां, 'नव-उदारवाद' शब्द का एक खास मतलब है. स्वतंत्र केंद्रीय बैंकों के उदय से आर्थिक सोच में बदलाव आया. अब सरकारें मुख्य आर्थिक नीति के उपकरण के तौर पर राजकोषीय के बजाय मौद्रिक नीति को प्राथमिकता देने लगीं. वैश्विक संदर्भ में लचीली विनियम दरों की ओर धीरे-धीरे बदलाव हो रहा था. पूंजी पर नियंत्रण हटने के साथ ही इसका बहुत तेज़ी से ग्लोबलाइज़ेशन हुआ. यही वजह है कि वैश्विकरण की दृष्टि से 1990 और 2000 का दशक बहुत अच्छा रहा. इस दौर को 'ग्रेट मॉडरेशन' कहा जाता है और मौद्रिक नीति के दबदबे वाली नव-उदारवादी सोच सामने आई.

ग्रेट मॉडरेशन में महंगाई और बेरोज़गारी कम थी. इस व्यवस्था के केंद्र में मुख्य भूमिका पश्चिमी देशों के केंद्रीय बैंकों की थी. वो ब्याज दरों में अल्पकालिक बदलाव करके अर्थव्यवस्था को प्रभावी ढंग से चला रहे थे.

महामारी के जवाब में, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 1.9 ट्रिलियन का भारी-भरकम प्रोत्साहन पैकेज जारी किया. इससे लगा कि मौद्रिक की बजाए राजकोषीय नीति की वापसी हो रही है. यूरोप में इसमें थोड़ा और समय लगेगा, खास तौर पर डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल यूरोप के लिए महंगा साबित होगा.

फिर भी, इसका एक छिपा हुआ नुकसान भी था, जिस पर लोगों का कम ध्यान जा रहा था. लगातार कम ब्याज दर की वजह से अनजाने में अमेरिकी अर्थव्यवस्था का तेज़ी से वित्तीयकरण हुआ. बुनियादी ढांचे और मानव पूंजी जैसी वास्तविक अर्थव्यवस्था में निवेश कम हुआ. वित्तीयकरण से अमेरिकी में कुछ विनाशकारी नतीजे भी सामने आए. हालांकि, दौलत कई गुना बढ़ी, लेकिन यह बहुत असमान रूप से बंटी थी. इसके अलावा, वित्तीयकरण का मतलब था कि फेडरल बैंक को अब घरेलू अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाज़ार दोनों में स्थिरता बनाए रखनी होगी. इस तरह से देखें, तो दोहरे जनादेश में एक छिपा हुआ तत्व था, और वो था, बाज़ार. 

ग्रेट मॉडरेशन 2008 के विश्वव्यापी मंदी के साथ अचानक खत्म हो गया, लेकिन राजकोषीय के बजाय मौद्रिक नीति को महत्व देने की नव-उदारवादी सोच बनी रही. हालांकि, अमेरिकी सरकार ने शुरू में कुछ प्रोत्साहन दिए, लेकिन जल्द ही वह इससे पीछे हट गई. सरकार ने जल्दी ही यह जिम्मेदारी फेड को सौंप दी कि वो लगभग शून्य ब्याज दर के साथ एक विस्तारवादी मौद्रिक नीति बनाए. विस्तारवादी मौद्रिक नीति से मतलब ऐसी आर्थिक नीति से है, जिसके तहत केंद्रीय बैंक धन की आपूर्ति  बढ़ाता है, और ब्याज दरें कम करता है. इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक मंदी के दौरान निवेश, उपभोक्ता खर्च और रोजगार को बढ़ावा देना तथा आर्थिक विकास को तेज करना है.

राजकोषीय नीति का महत्व

अटलांटिक के उस पार यानी यूरोप में हालात और भी खराब थे. ब्रिटेन के केंद्रीय बैंक के चांसलर जॉर्ज ओसबोर्न ने जिस तरह की राजकोषीय संयम लागू किए, उससे ना सिर्फ़ इंग्लैंड के लोगों को एक पीढ़ी में एक बार आने वाली मंदी के बाद परेशानी हुई, बल्कि स्वास्थ्य और रेलवे जैसी सार्वजनिक सेवाओं पर भी असर पड़ा. ब्रेक्जिट यानी यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन का बाहर निकलना शायद इसका एक स्वाभाविक नतीजा था.

पूरे यूरोज़ोन में, जर्मन सरकार ने दक्षिणी यूरोप की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्थाओं पर ज़बरदस्त सख्ती थोपी. इससे आम परिवारों को कई साल तक आर्थिक ठहराव का सामना करना पड़ा. अपने ही देश में, जर्मन सरकार की सख्ती की सनक से देश के पूर्वी इलाकों के विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा पर नकारात्मक असर पड़ा. पश्चिम में,  महामंदी के लिए सही वित्तीय प्रतिक्रिया की कमी ने यह सुनिश्चित कर दिया कि इससे उबरने की प्रक्रिया ना तो तेज़ थी और ना ही गहरी. आखिरकार, लोक-लुभावनवाद ने उस कमी को पूरा किया.

जिन क्षेत्रों में 2008 के संकट की कम मार दिखी, उसकी कमी बारह साल बाद 2020 में कोविड महामारी ने पूरी कर दी. महामारी के जवाब में, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 1.9 ट्रिलियन का भारी-भरकम प्रोत्साहन पैकेज जारी किया. इससे लगा कि मौद्रिक की बजाए राजकोषीय नीति की वापसी हो रही है. यूरोप में इसमें थोड़ा और समय लगेगा, खास तौर पर डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल यूरोप के लिए महंगा साबित होगा.


यह लेख मूल रूप से द इंटरप्रेटर में छपा है.

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