कभी भारत-अमेरिका रिश्तों को नई वैश्विक साझेदारी का मॉडल कहा गया था लेकिन ट्रंप के दौरे ने फिर दिखाया कि दोनों देशों की सोच में गहरा फर्क अब भी मौजूद है. भारत अब किसी एक खेमे के साथ खड़े होने के बजाय अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर रिश्ते आगे बढ़ाना चाहता है. समझिए क्यों भारत-अमेरिका रिश्तों में तनाव समय-समय पर फिर उभर आता है.
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा को शायद आने वाली पीढ़ियां उतना याद न रखें जितना कि 1972 में रिचर्ड निक्सन की प्रसिद्ध यात्रा को याद रखा जाता है लेकिन इसने भारतीयों को उन समानताओं का सामना करने के लिए मजबूर कर दिया है, जिसे अब तक भारत-अमेरिका संबंधों का सबसे काला अध्याय माना जाता था.
निक्सन और ट्रंप दोनों की सोच में काफी समानताएं हैं. दोनों ने भारतीय चिंताओं को नजरअंदाज करते हुए चीन को अहमियत दी और पाकिस्तान के सैन्य तानाशाहों का खुलकर समर्थन किया. लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत-अमेरिका का रिश्ता निक्सन के दौर में भी नहीं टूटा, बल्कि समय के साथ और मजबूत हुआ. यह साझेदारी किसी एक नेता या पार्टी से कहीं बड़ी और दोनों के फायदे के लिए है, फिर भी भारत इसके बिना भी आगे बढ़ सकता है.
अतीत के मुकाबले आज भारत की स्थिति बहुत बेहतर है. भले ही ट्रंप प्रशासन का रवैया थोड़ा सख्त या अड़ियल हो जाए, लेकिन अमेरिकी व्यवस्था (तंत्र) का एक बड़ा हिस्सा आज भी भारत के साथ रिश्तों को जरूरी मानता है. दोनों देशों के लोगों और बिजनेस जगत के बीच व्यापार, निवेश और नए आइडियाज (नवाचार) का जो मजबूत संबंध बन चुका है, वह राजनीतिक बदलावों से बेअसर होकर आगे बढ़ता रहेगा. यह उन मतभेदों को कम आंकने के लिए नहीं है जो न तो सतही हैं और न ही किसी व्यक्ति विशेष की वजह से हैं. भारत-अमेरिका संबंधों में एक ढांचागत दरार (स्ट्रक्चरल फॉल्टलाइन) उभर आई है. इसे छिपाया या टाला नहीं जा सकता. असल में, यहाँ एक नहीं बल्कि तीन दरारें हैं.
निक्सन और ट्रंप दोनों की सोच में काफी समानताएं हैं. दोनों ने भारतीय चिंताओं को नजरअंदाज करते हुए चीन को अहमियत दी और पाकिस्तान के सैन्य तानाशाहों का खुलकर समर्थन किया. लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत-अमेरिका का रिश्ता निक्सन के दौर में भी नहीं टूटा, बल्कि समय के साथ और मजबूत हुआ.
वैश्विक मामलों में भारत की निरंतर चिंता का विषय, उसकी ऊर्जा सुरक्षा, रूस से ईंधन खरीदने के मामले में अमेरिकी एकपक्षवाद (यूनिलैटरलीज्म) और उसके हैरान कर देने वाले दोहरे मापदंडों के कारण खतरे में है. चीन के साथ तनाव कम करने (डेटेंट) की वाशिंगटन की कोशिशें इस रिश्ते के रणनीतिक आधार को खत्म कर देती हैं. और भारत ने अपने आत्मसम्मान व पहचान को फिर से गढ़ा है: वह एक मनमौजी वाशिंगटन के इशारों पर चलने वाला आज्ञाकारी साथी बनने से इंकार करता आया है और आगे भी करता रहेगा. ये गंभीर, ढांचागत असहमति हैं. इन्हें इसी रूप में पहचाना जाना चाहिए.
लेकिन हमें उन संस्थागत समानताओं (इंस्टीट्यूशनल कन्वर्जेंस) को भी स्वीकार करना होगा जो अब भी बनी हुई हैं. दोनों देशों की सेनाओं के बीच द्विपक्षीय सहयोग. 'क्वाड' के दायरे में सहयोग के वे हिस्से जिन्हें ट्रंप नापसंद करते हैं, लेकिन विदेश मंत्री मार्को रुबियो और राजदूत सर्जियो गोर चतुराई से बनाए रखना चाहते तनावों के बावजूद, भारत और अमेरिका के बीच रक्षा (INDUS-X), तकनीक (TRUST) और व्यापारिक समझौते लगातार आगे बढ़ रहे हैं. यह जुड़ाव भले ही बमुश्किल टिका है, लेकिन दोनों देशों के लिए इस समय को एक अवसर की तरह देखना चाहिए. ट्रंप के आने से इस रिश्ते का कूटनीतिक दिखावा खत्म हो गया है, जिससे यह साफ हो गया है कि यह दो बिल्कुल अलग सोच और सभ्यताओं का एक मिला-जुला रूप है.
नई दिल्ली को व्यावहारिक और यथार्थवादी कूटनीति (ओपन-आईड डिप्लोमेसी) से जवाब देना चाहिए, न कि भावुकता (ओपन-हार्टेड सेंटीमेंट) से. उसे संयुक्त राज्य अमेरिका के हर वैचारिक पक्ष के साथ जुड़ना होगा, जो कि हमारे जितने ही विविध और जटिल लोकतंत्र वाला देश है. ट्रम्पवाद शायद ट्रंप के बाद भी बना रहे-दोनों ही राजनीतिक दल (रिपब्लिकन और डेमोक्रेट), भले ही अधिक नपे-तुले शब्दों में, लेकिन वही असहज करने वाले सवाल पूछ रहे हैं जो मौजूदा प्रशासन ने उठाए हैं. सच्चाई यह है कि इस राष्ट्रपति ने हमारे ऊपर एक उपकार किया है. अब हम इस रिश्ते को अधिक ईमानदार और स्थायी शर्तों पर नए सिरे से ढाल सकते हैं.
भारत और अमेरिका का रिश्ता एक 'तयशुदा शादी' जैसा रहा है, जिसे दोनों देशों के पुराने बड़े नेताओं ने मिलकर तय किया था. इस रिश्ते का नियम था- ‘पहले शादी करो, आपसी तालमेल बाद में देखा जाएगा.’ नेताओं को लगा था कि रिश्ता जुड़ने के बाद दोनों देशों की सोच भी एक जैसी हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दोनों की सोच में एक बड़ा अंतर हमेशा बना रहा, क्योंकि दोनों देशों का मिजाज अलग है. असल समस्या यह है कि भारत किसी के दबाव में आकर सैन्य गठबंधन करना नहीं चाहता, और अमेरिका भारत की आज़ाद सोच को समझ नहीं पाता.
प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम वैश्विक राजनीति के मोहरों को बहुत समझदारी से आगे बढ़ा रही है. भारत ने अमेरिका के साथ एक सही दूरी और नजदीकी का संतुलन बना लिया है, यूरोपीय संघ से दोस्ती गहरी की है, चीन के साथ रिश्तों को सुधारा है और रूस के साथ भी अपना मजबूत जुड़ाव बनाए रखा है.
एक सफल शादी की तरह देशों के रिश्तों में भी बदलाव, समझौते और बराबरी की ज़रूरत होती है. अमेरिका अकेले इस रिश्ते के नियम तय नहीं कर सकता. वाशिंगटन को यह मानना होगा कि भारत कोई कमतर या छोटा देश नहीं है जो उनके सामने हाथ फैलाए खड़ा हो, बल्कि अपनी प्राचीन पहचान और स्वतंत्र सुरक्षा नीति वाला एक मजबूत राष्ट्र है. जब तक अमेरिका भारत को अपने बराबर का दर्जा नहीं देगा, तब तक यह रिश्ता उतार-चढ़ाव से जूझता रहेगा क्योंकि अमेरिका 'बराबरी' का मतलब नहीं समझता.
बदलती दुनिया में भारत किसी के भरोसे नहीं बैठा है. अपनी आज़ाद विदेश नीति को बनाए रखना मुश्किल ज़रूर है, लेकिन भारत इसे बखूबी संभाल रहा है. प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम वैश्विक राजनीति के मोहरों को बहुत समझदारी से आगे बढ़ा रही है. भारत ने अमेरिका के साथ एक सही दूरी और नजदीकी का संतुलन बना लिया है, यूरोपीय संघ (EU) से दोस्ती गहरी की है, चीन के साथ रिश्तों को सुधारा है और रूस के साथ भी अपना मजबूत जुड़ाव बनाए रखा है.
भारत और अमेरिका की साझेदारी हमेशा बनी रहेगी, यह निक्सन के बाद अब ट्रंप के दौर में भी सुरक्षित है. लेकिन यह रिश्ता मजबूत और समझदार तभी बनेगा जब अमेरिका भारत को अपनी शर्तों पर नहीं बल्कि दोनों की आपसी सहमति और बराबरी के आधार पर स्वीकार करेगा. ट्रंप का व्हाइट हाउस फिलहाल इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं है, शायद आने वाली अमेरिकी सरकारें इसका समाधान ढूंढ पाएं.
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Samir Saran is the President of the Observer Research Foundation (ORF), India’s premier think tank, headquartered in New Delhi with affiliates in North America and ...
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