Author : Vivek Mishra

Originally Published NDTV Published on Mar 10, 2026 Commentaries 0 Hours ago

मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इज़रायल की रणनीति के पीछे सिर्फ सुरक्षा नहीं बल्कि बड़े आर्थिक और तकनीकी हित भी जुड़े हैं. जानें क्यों ईरान को इस योजना की सबसे बड़ी बाधा माना जा रहा है और मिडिल ईस्ट के भविष्य की दिशा क्या हो सकती है.

ईरान बनाम अमेरिका: असली दांव क्या है?

पिछले साल 12 दिनों के युद्ध के दौरान जब इज़रायल और अमेरिका ने ईरान के ख़िलाफ़ कार्रवाई की तो इसके पीछे रणनीतिक दलील सबसे महत्वपूर्ण थी. दोनों देशों का मानना था कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है क्योंकि इससे इज़रायल के अस्तित्व पर ख़तरा था. ये सोच अमेरिका की क्षेत्रीय सुरक्षा और वर्चस्व की ज़रूरतों का मार्गदर्शन करती है. ईरान के साथ परमाणु समझौते से ट्रंप प्रशासन के पीछे हटने की वजह से ईरान ने IAEA को अपने परमाणु ठिकानों की जांच करने से रोक दिया. ये कदम ईरान के ख़िलाफ़ ट्रंप प्रशासन के सख्त रवैये के लिए निर्णायक मोड़ बन गया. ये टकराव उस समय हुआ जब 7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इज़रायल पर हमला किया और ईरान ने पूरी तरह से हमास का साथ देकर इसे यहूदी-इस्लाम की लड़ाई बनाने की कोशिश की. 

अकेले ‘स्थिरता’ कारण नहीं हो सकती

ये सब जब चल रहा था तो ट्रंप प्रशासन ने अपने आर्थिक नज़रिए का इस्तेमाल करके इस क्षेत्र में अपना हित देखने की कोशिश की. मध्य पूर्व में किसी प्रत्यक्ष आर्थिक हित की अनुपस्थिति में केवल रणनीतिक लक्ष्य ट्रंप प्रशासन के लिए पर्याप्त नहीं थे जिसकी नज़र खुले रूप से आर्थिक लाभ पर रहती है. इसके अलावा ईरान में सैन्य भागीदारी पूरी तरह से विरोधाभासी है क्योंकि ट्रंप वादा करते हैं कि वो एक ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्होंने युद्ध शुरू नहीं किया बल्कि युद्ध होने से रोका. फिर भी ट्रंप प्रशासन को ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध में कूदते देखने से ये निश्चित हो जाता है कि कोई आर्थिक कारण है जो ट्रंप की रणनीतिक सोच का मार्गदर्शन कर रहा है. 

ईरान के साथ परमाणु समझौते से ट्रंप प्रशासन के पीछे हटने की वजह से ईरान ने IAEA को अपने परमाणु ठिकानों की जांच करने से रोक दिया. ये कदम ईरान के ख़िलाफ़ ट्रंप प्रशासन के सख्त रवैये के लिए निर्णायक मोड़ बन गया. ये टकराव उस समय हुआ जब 7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इज़रायल पर हमला किया और ईरान ने पूरी तरह से हमास का साथ देकर इसे यहूदी-इस्लाम की लड़ाई बनाने की कोशिश की. 

मध्य पूर्व में अमेरिका के आर्थिक हित पिछले कुछ वर्षों में कम होते जा रहे हैं. ये स्थिति तब है जब अमेरिका इस क्षेत्र से ऊर्जा का आयात करने के बदले दुनिया को ऊर्जा का निर्यात कर रहा है. इस तरह, मध्य पूर्व में अमेरिका के रणनीतिक हितों में सबसे आगे इज़रायल के साथ उसका गठबंधन है. पूरे मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी के बावजूद इस क्षेत्र में इज़रायल अकेला देश है जिस पर अमेरिका वास्तव में भरोसा कर सकता है. फिर भी, मध्य पूर्व में ट्रंप प्रशासन का मौजूद दांव मूल रूप से आर्थिक ही है. अपने पहले कार्यकाल से ट्रंप प्रशासन ने जिस एक प्रमुख मुद्दे पर ध्यान दिया है, वो है अब्राहम अकॉर्ड के ज़रिए इज़रायल और अन्य साझेदारों के बीच संबंध सामान्य करना जिस पर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था का व्यापक नेटवर्क आधारित हो सकता है. अमेरिका सख्त अनुशासक के रूप में आया, UAE इस क्षेत्र की आर्थिक महाशक्ति है और भारत ऐसा देश है जिसका इस क्षेत्र में सभी देशों के साथ अच्छे संबंध हैं. 

ट्रंप के मिशन में अड़चन

इन लक्ष्यों को इज़रायल पर हमास के हमले ने रोका और पूरे क्षेत्र को उथल-पुथल में झोंक दिया. हैरानी की बात नहीं है कि ट्रंप प्रशासन के बाद बाइडेन प्रशासन के प्रयास इस क्षेत्र में प्रयोग करने या नज़रअंदाज़ करने के बदले इसे मज़बूत करने पर केंद्रित थे. इसी क्रम में बाइडेन प्रशासन के तहत ही भारत, इज़रायल, UAE और अमेरिका ने I2U2 समूह स्थापित करने के लिए 14 जुलाई 2022 को इन देशों के नेताओं का पहला शिखर सम्मेलन आयोजित किया. इसके अगले साल दिल्ली में G20 शिखर सम्मेलन के दौरान भारत, अमेरिका, UAE, सऊदी अरब, इटली, फ्रांस, जर्मनी और यूरोपियन कमीशन के नेताओं के बीच बैठक के बाद इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (IMEEC) की घोषणा की गई. 

मध्य पूर्व में अमेरिका के रणनीतिक हितों में सबसे आगे इज़रायल के साथ उसका गठबंधन है. पूरे मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी के बावजूद इस क्षेत्र में इज़रायल अकेला देश है जिस पर अमेरिका वास्तव में भरोसा कर सकता है. फिर भी, मध्य पूर्व में ट्रंप प्रशासन का मौजूद दांव मूल रूप से आर्थिक ही है.

मिडिल ईस्ट के लिए तीन मुख्य बिंदु  

दूसरी बार ट्रंप प्रशासन उस समय सत्ता में आया जब यूरोप और मिडिल ईस्ट में युद्ध ने इस क्षेत्र को काफी हद तक बदल दिया था. लेकिन ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल ने एक व्यापक आर्थिक दलील का रूप ले लिया जिसने मिडिल ईस्ट को तीन मुख्य बिंदुओं पर केंद्रित किया. पहला, इस क्षेत्र में शांति स्थापित करना मुश्किल हो सकता है लेकिन अगर इतिहास में कभी क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बाहरी रूप से प्रेरित किया जा सकता है तो वो अब है. दूसरा, अमेरिका के ज़्यादातर आर्थिक हित मिडिल ईस्ट में शांति और स्थिरता पर निर्भर थे. तीसरा, ट्रंप की शांति की योजना में अमेरिका ने ईरान को अड़चन के रूप में देखा. 

बोर्ड ऑफ पीस प्रोजेक्ट

मध्य पूर्व के लिए ट्रंप की आर्थिक योजना में शुरू से ही बहुत ज़्यादा शर्तें थीं. गज़ा में पुनर्निर्माण और युद्ध के बाद शासन व्यवस्था के लिए बोर्ड ऑफ पीस प्रोजेक्ट में आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण किरदार अधिकतर दूर ही रहे. इससे ट्रंप के करीबियों- जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ- को इस परियोजना में दखल देने का मौका मिल सकता है. हालांकि वित्त, समय-सीमा और वैश्विक एवं क्षेत्रीय निर्देशों के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है. फिलहाल नौ सदस्यों से शुरुआती वादा 7 अरब डॉलर का है. इसके अलावा 10 अरब डॉलर का वादा अमेरिका ने किया है. ये UN, यूरोपियन यूनियन और वर्ल्ड बैंक के अनुमानों से काफी कम है जिसमें कहा गया है कि गज़ा के पुनर्निर्माण की लागत 70 अरब डॉलर आएगी. फिर भी, अमेरिका के बड़े व्यवसायों को एकजुट करना और गज़ा के लिए एक मुक्त बाजार योजना, इसके आर्थिक स्वरूप में कुछ हद तक स्पष्ट हो सकता है. 

ट्रम्प प्रशासन का आर्थिक दांव इस क्षेत्र को दी जाने वाली आर्थिक सहायता को बदलना है ताकि इस क्षेत्र से लाभ प्राप्त किया जा सके. लेकिन ये शांतिपूर्ण मिडिल ईस्ट पर निर्भर है और यहां शांति कभी भी महाशक्तियों के ज़ोर से नहीं आई है. 

दूसरा, I2U2 और IMEEC हमेशा ट्रंप के दिमाग में था लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता हमेशा चुनौतीपूर्ण साबित हुई. अंत में, मिडिल ईस्ट में “स्थिरता” लाने पर ट्रंप का ज़ोर दो मज़बूत कारणों से प्रेरित हो सकता है. पहला, इस क्षेत्र- विशेष रूप से सऊदी अरब और UAE- को सेमीकंडक्टर और AI के दृष्टिकोण से तकनीकी केंद्र में बदलना और दूसरा, अमेरिका से इंडो-पैसिफिक तक ऊर्जा सप्लाई चेन की स्थापना करना. 

अगर ट्रंप की ये योजना सफल रही तो इस क्षेत्र, विशेष रूप से इज़रायल, को दी जाने वाली अमेरिकी सहायता में बदलाव आ सकता है. ट्रम्प प्रशासन का आर्थिक दांव इस क्षेत्र को दी जाने वाली आर्थिक सहायता को बदलना है ताकि इस क्षेत्र से लाभ प्राप्त किया जा सके. लेकिन ये शांतिपूर्ण मिडिल ईस्ट पर निर्भर है और यहां शांति कभी भी महाशक्तियों के ज़ोर से नहीं आई है. 


यह लेख मूल रूप से एनडीटीवी में प्रकाशित हुआ था. 

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Vivek Mishra

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Vivek Mishra is Deputy Director – Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. His work focuses on US foreign policy, domestic politics in the US, ...

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