चीन की प्रतिक्रिया अभी पूरी तरह धैर्य वाली रही है. उसे इस उथल-पुथल को अपने लंबे समय के लाभ में बदलना होगा. इसके लिए चीन को तेल कूटनीति से लेकर मध्यस्थता तक करनी होगी.
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों के बाद ईरान में मौजूदा संकट शुरू हुआ. इजरायल और अमेरिका के इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या कर दी गई. इसके अलावा हमलों में ईरान के टॉप कमांडर भी मारे गए. मिडिल ईस्ट इस वक्त जियोपॉलिटिकल अहम इलाका बना हुआ है. चीन के लिए निश्चित रूप से ये एक झटका है. लेकिन यह न तो निर्णायक है और न ही उस तरह का परिवर्तनकारी जैसा कुछ लोग जल्दबाजी में कह रहे हैं. बल्कि, यह उस क्षेत्र में बीजिंग की महत्वाकांक्षाओं की संरचनात्मक सीमाओं की याद दिलाता है जो अभी भी अमेरिकी सैन्य शक्ति से प्रभावित है.
बीजिंग की प्रतिक्रिया कैसी?: बीजिंग की प्रतिक्रिया अनुमान के अनुसार ही रही है. चीन ने इन हमलों की निंदा करते हुए और उन्हें "अस्वीकार्य" और अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन बताया. चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने रूस के सर्गेई लावरोव के साथ बातचीत में तत्काल युद्धविराम और तनाव कम करने का आह्वान किया. सरकारी मीडिया के माध्यम से प्रचारित आधिकारिक रुख ने इस घटना को घोर आक्रामकता और सत्ता की राजनीति के रूप में पेश किया है. फिर भी, बयानबाजी के तौर पर व्यक्त किए गए आक्रोश के नीचे एक परिचित चीनी प्रवृत्ति छिपी है. वो है, उलझनों से बचना, लचीलापन बनाए रखना और तूफान के गुजरने का इंतजार करना.
मिडिल ईस्ट इस वक्त जियोपॉलिटिकल अहम इलाका बना हुआ है. चीन के लिए निश्चित रूप से ये एक झटका है. लेकिन यह न तो निर्णायक है और न ही उस तरह का परिवर्तनकारी जैसा कुछ लोग जल्दबाजी में कह रहे हैं. बल्कि, यह उस क्षेत्र में बीजिंग की महत्वाकांक्षाओं की संरचनात्मक सीमाओं की याद दिलाता है जो अभी भी अमेरिकी सैन्य शक्ति से प्रभावित है.
ईरान चीन के लिए क्यों है अहम?: ईरान लंबे समय से बीजिंग के लिए एक उपयोगी और अपरिहार्य, साझेदार रहा है. चीन के समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल आयात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसके जरिए चीन की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई है. युआन में लेन-देन करने और डॉलर-प्रधान वित्तीय प्रणालियों को दरकिनार करने की तेहरान की तत्परता चीन की डॉलर-मुक्ति की महत्वाकांक्षाओं के साथ पूरी तरह मेल खाती है. ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) जैसे बहुपक्षीय मंचों में, ईरान पश्चिमी देशों के बाद के बहुध्रवीय दुनिया की बात करता रहा है. ईरान ने बेल्ट एंड रोड पहल में भी अहम भूमिका निभाई है.जिसमें अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) जैसे परिवहन गलियारे शामिल हैं.
चीन की रणनीति कमजोर: इसलिए, सत्ता परिवर्तन की दिशा में अमेरिका का प्रयास केवल द्विपक्षीय संबंधों तक ही सीमित नहीं है. यह पश्चिमी विरोधी शासनों के साथ रणनीतिक साझेदारी विकसित करने और प्रत्यक्ष सुरक्षा प्रतिबद्धताओं से बचने की बीजिंग की व्यापक रणनीति की कमजोरी को उजागर करता है. ईरान के वैचारिक झुकाव में भी बदलाव देखने को मिला है. इससे अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, हिंद-प्रशांत क्षेत्र से अमेरिकी ध्यान हटाने में मदद की थी. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि निर्णायक पश्चिमी सैन्य कार्रवाई को रोकने में चीन की अक्षमता (या अनिच्छा) उसकी विश्वसनीयता में कमी को दर्शाती है. वैश्विक सुरक्षा पहल और बहुध्रुवीय व्यवस्था की तमाम बातों के बावजूद, बीजिंग अमेरिकी दृढ़ संकल्प का सामना करने पर अपने सहयोगियों की रक्षा में बल प्रयोग करने से हिचकिचाता है.
बीजिंग के लिए झटका भी: आर्थिक दृष्टि से, यह संकट रणनीतिक चीजों को बदलती है. ईरानी तेल आपूर्ति में रुकावट और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास संभावित अस्थिरता चीन की आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए लागत बढ़ा देती है. रूस से लेकर खाड़ी उत्पादकों तक कई स्रोतों और पर्याप्त रणनीतिक भंडार के बावजूद, प्रतिबंधों से बचने के लिए भारी छूट पर मिलने वाले कच्चे तेल का नुकसान दबाव बढ़ाएगा. खासकर छोटे रिफाइनरी के लिए. घरेलू अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता के इस दौर में, ऐसी अस्थिरता का स्वागत करना असंभव है. 2023 में सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंधों को सामान्य बनाने में चीन की मध्यस्थता ने उसे एक जिम्मेदार दोस्त के रूप में स्थापित किया. आज, घटनाएं एक बार फिर अमेरिकी सैन्य शक्ति और इजरायली सुरक्षा संबंधी आकलन से प्रभावित हैं. बीजिंग की प्रतिक्रिया, निंदा, और संयम बरतने की अपील उसके संकुचित दायरे को भी दिखाता है.
खाड़ी देश, नए सिरे से अस्थिरता से परेशान होकर अपनी जोखिम कम करने की रणनीतियों को तेज कर सकते हैं. इसके लिए अमेरिका के खिलाफ वो बीजिंग के साथ आर्थिक संबंध मजबूत कर सकते हैं. चीन की प्रतिक्रिया अभी पूरी तरह धैर्य वाली रही है. उसे इस उथल-पुथल को अपने लंबे समय के लाभ में बदलना होगा.
ताइवान पर है चीन का ध्यान?: फिर भी, इसे चीन के लिए एक रणनीतिक आपदा के रूप में देखना सही नहीं होगा. बीजिंग ने सैन्य हस्तक्षेप से पूरी तरह परहेज किया है, जिससे उसने अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं - ताइवान, दक्षिण चीन सागर और घरेलू स्थिरता पर ज्यादा ध्यान दिया है. खाड़ी देशों की सल्तनत के साथ उसके लंबे समय से विकसित संबंध और उसके वित्तीय सुरक्षा कवच चीन को मजबूती प्रदान करते हैं. इसके अलावा, दुनिया के दक्षिण के बड़े हिस्से में, चीन द्वारा संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप पर दिया गया जोर, वाशिंगटन की तरफ से बल प्रयोग के प्रयास की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी हो सकता है.
चीन के करीब जाएंगे खाड़ी देश?: वैसे कहते हैं न कि आपदा अवसरों को जन्म दे सकती है. आर्थिक रूप से कमजोर या संकटग्रस्त ईरान, पुनर्निर्माण के लिए चीनी पूंजी पर अधिक निर्भर हो सकता है. खाड़ी देश, नए सिरे से अस्थिरता से परेशान होकर अपनी जोखिम कम करने की रणनीतियों को तेज कर सकते हैं. इसके लिए अमेरिका के खिलाफ वो बीजिंग के साथ आर्थिक संबंध मजबूत कर सकते हैं. चीन की प्रतिक्रिया अभी पूरी तरह धैर्य वाली रही है. उसे इस उथल-पुथल को अपने लंबे समय के लाभ में बदलना होगा. इसके लिए चीन को तेल कूटनीति से लेकर मध्यस्थता तक करनी होगी.
ईरान संकट मिडिल ईस्ट में अमेरिका की केंद्रीय ताकत को दिखाता है. यह चीन की महाशक्ति बनने की आकांक्षाओं पर एक तरह से पाबंदी भी दिखाता है. लेकिन यह बीजिंग की दीर्घकालिक रणनीति को पटरी से नहीं उतारता है.
यह लेख NDTV इंडिया में प्रकाशित हो चुका है.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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