Published on Dec 17, 2025 Commentaries 14 Days ago

जैविक हथियार संधि (BWC) के 50 साल ऐसे दौर में पूरे हो रहे हैं, जब ड्यूल-यूज़ तकनीकों और जैव आतंकवाद के खतरे बढ़ रहे हैं. इस संदर्भ में भारत की संभावित नेतृत्व भूमिका को इस लेख से समझिए.

BWC @50: जानें, भारत के लिए मायने!

Image Source: द इंडियन एक्सप्रेस

भारत 2018 से ऑस्ट्रेलिया ग्रुप का सदस्य है और जैविक हथियार संधि (BWC) का लगातार समर्थन करता आया है. इससे उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, खासकर वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच, भरोसेमंद माना जाता है लेकिन सवाल यह है कि दिल्ली किस तरह वैश्विक दक्षिण की अलग-अलग ज़रूरतों को सामने रख सकती है और एक मजबूत, आधुनिक और असरदार BWC बनाने में आगे बढ़कर भूमिका निभा सकती है?

  • जैविक हथियार संधि (BWC) के 50 साल ऐसे दौर में पूरे हो रहे हैं
  • भारत 2018 से ऑस्ट्रेलिया ग्रुप का सदस्य है और जैविक हथियार संधि (BWC) का लगातार समर्थन करता आया है
  • इस समय भारत के पास एक बड़ा अवसर है—वह खुद को वैश्विक दक्षिण के नेता के रूप में स्थापित कर सकता है

अगर कोई देश या आतंकी संगठन जानबूझकर ऐसे जैविक जीव या ज़हर फैलाए, जो इंसानों, पौधों या जानवरों को नुकसान पहुँचाएँ या मार दें तो इसके नतीजे बहुत विनाशकारी हो सकते हैं. हाल ही में सामने आए कथित रिसिन आतंकी साज़िश की जाँच से साफ़ होता है कि जैव आतंकवाद कोई कल्पना नहीं बल्कि एक वास्तविक खतरा है. इससे यह भी समझ आता है कि ऐसे खतरों से निपटने के लिए भारत को अपनी तैयारी और मजबूत करनी होगी. जैविक हथियार संधि (BWC), जो 26 मार्च 1975 को लागू हुई थी और अब अपने 50 साल पूरे कर रही है, जीवन विज्ञान से जुड़ी तकनीकों के जानबूझकर दुरुपयोग को रोकने की सबसे अहम अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनी हुई है. इस समय भारत के पास एक बड़ा अवसर है. वह खुद को वैश्विक दक्षिण के नेता के रूप में स्थापित कर सकता है. इसके लिए यह समझना ज़रूरी है कि जैविक हथियार क्या होते हैं, BWC को दोहरे उपयोग (dual-use) वाली तकनीकों से जुड़ी चुनौतियों का सामना क्यों करना पड़ता है और भारत किस तरह वैश्विक दक्षिण के हितों की पैरवी करते हुए BWC को मज़बूत और प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है.

जैविक हथियार क्या हैं?

जैविक हथियार संधि (BWC) दुनिया की पहली ऐसी अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसने पूरी तरह एक तरह के बेहद ख़तरनाक हथियारों पर रोक लगा दी. यह संधि जैविक हथियारों को बनाना, रखना, खरीदना-बेचना, एक जगह से दूसरी जगह ले जाना और उनका इस्तेमाल करना—सब पर प्रतिबंध लगाती है.

संयुक्त राष्ट्र के निरस्त्रीकरण मामलों के कार्यालय (UNODA) के अनुसार, इस समय जैविक हथियार संधि (BWC) से 189 देश जुड़े हुए हैं. जैविक हथियार आम तौर पर दो हिस्सों से मिलकर बने होते हैं-एक बीमारी फैलाने वाला जैविक तत्व और दूसरा उसे फैलाने का तरीका. यह जैविक तत्व कोई भी ऐसा जीव या ज़हर हो सकता है जिसे ज़्यादा ख़तरनाक, जानलेवा या बड़ी आबादी तक फैलाने लायक बनाया गया हो. इन्हें फैलाने के लिए मिसाइल, हैंड ग्रेनेड, रॉकेट, स्प्रे टैंक, स्प्रे, ब्रश या इंजेक्शन जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है. BWC इन दोनों-जैविक तत्व और उन्हें फैलाने वाले साधनों-के विकास पर रोक लगाती है. हालाँकि BWC के मूल पाठ में जैविक हथियारों के “इस्तेमाल” शब्द का साफ़ तौर पर ज़िक्र नहीं है लेकिन 1996 की समीक्षा सम्मेलन की अंतिम घोषणा में यह स्पष्ट कर दिया गया कि इन हथियारों का कोई भी उपयोग संधि का उल्लंघन माना जाएगा. जिन देशों के पास ऐसे हथियार या उन्हें फैलाने के साधन मौजूद हैं, उन्हें संधि में शामिल होने के नौ महीने के भीतर इन्हें या तो शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए बदलना होगा या पूरी तरह नष्ट करना होगा.

BWC की निगरानी और सत्यापन की कमी

BWC (जैविक हथियार सम्मेलन) की एक बड़ी कमजोरी यह है कि इसके पास कोई मजबूत जाँच या निगरानी व्यवस्था नहीं है यानी यह देखने के लिए कोई स्वतंत्र संस्था नहीं है कि देश इसके नियमों का सही से पालन कर रहे हैं या नहीं, इसके बजाय, BWC के तहत केवल एक इम्प्लीमेंटेशन सपोर्ट यूनिट (ISU) है जो सदस्य देशों को प्रशासनिक मदद देती है.

इस कमी को पूरा करने के लिए 1987 में कॉन्फिडेंस-बिल्डिंग मेजर्स (CBMs) शुरू किए गए. इनका उद्देश्य है-जैविक शोध को लेकर पैदा होने वाले शक और भ्रम को कम करना, संक्रामक बीमारियों के फैलने की जानकारी साझा करना, वैक्सीन बनाने वाली इकाइयों की जानकारी देना, शांतिपूर्ण जैविक विज्ञान में देशों के बीच सहयोग बढ़ाना.इन उपायों को 1991 में और मजबूत किया गया. 1992 से, BWC के सभी सदस्य देशों से यह उम्मीद की जाती है कि वे हर साल अपनी राष्ट्रीय CBM रिपोर्ट ISU को भेजें. पूरे सम्मेलन और इन उपायों की समीक्षा हर पाँच साल में की जाती है. साथ ही,देशों को अपने यहाँ जरूरी कानून बनाने,आपस में बातचीत और सहयोग बढ़ाने और अगर कोई देश नियम तोड़े तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में शिकायत करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.

BWC में एक सत्यापन (वेरिफिकेशन) व्यवस्था जोड़ने के कई प्रयास किए गए लेकिन ये प्रयास संसाधनों की कमी, निरीक्षणों की अत्यधिक हस्तक्षेपकारी प्रकृति और राष्ट्रीय सुरक्षा या व्यावसायिक हितों को होने वाले जोखिमों के कारण सफल नहीं हो सके. सत्यापन तंत्र के अभाव ने संधि के अनुपालन का आकलन करने में लगातार अस्पष्टता बनाए रखी है और बढ़ते ड्यूल-यूज़ जोखिमों से निपटने की BWC की क्षमता को भी सीमित कर दिया है.

ड्यूल-यूज़ तकनीक और विज्ञान कूटनीति की चुनौती

आज जैविक हथियार सम्मेलन (BWC) को विज्ञान और तकनीक में तेज़ बदलावों के कारण कई नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. जीन-एडिटिंग, सिंथेटिक बायोलॉजी और AI जैसी नई जीवन-विज्ञान तकनीकें भले ही अच्छे कामों के लिए हों लेकिन उनका गलत इस्तेमाल भी किया जा सकता है जिसे ड्यूल-यूज़ खतरा कहा जाता है. तेज़ नवाचार, कमजोर निगरानी और तकनीकी जानकारी की आसान उपलब्धता ने इन तकनीकों के दुरुपयोग को आसान बना दिया है. साथ ही, कोविड-19 के बाद ज़्यादा प्रयोगशालाएँ बनीं लेकिन हर जगह जैव-सुरक्षा के नियम एक जैसे नहीं हैं, जिससे जोखिम और बढ़ गया है.

आज की चुनौतियों से निपटने के लिए BWC में फैसले लेते समय वैज्ञानिकों की राय को शामिल करना बहुत ज़रूरी है. इसमें विज्ञान कूटनीति मददगार हो सकती है. अगर सदस्य देशों को सलाह देने के लिए कोई स्थायी वैज्ञानिक व्यवस्था बने, तो जैविक हथियारों से जुड़े नियम विज्ञान और तकनीक में हो रहे तेज़ बदलावों के साथ कदम मिला पाएँगे. इससे वैज्ञानिकों को भी यह समझने में मदद मिलेगी कि नई तकनीकों का सुरक्षा पर क्या असर पड़ सकता है और स्वैच्छिक नियमों के ज़रिये जिम्मेदारी भी बढ़ेगी.

बढ़ता जैविक खतरा और भरोसे की ज़रूरत

आज बढ़ती देशों की प्रतिस्पर्धा और युद्ध के बदलते तरीकों के कारण जैविक हथियारों का खतरा फिर बढ़ रहा है. इसलिए देशों के बीच भरोसा बढ़ाने और रोकने के उपाय पहले से ज़्यादा ज़रूरी हो गए हैं. विज्ञान के खिलाफ बयान और गुप्त जैविक गतिविधियों के आरोप-जैसे कुछ देशों द्वारा जैविक प्रयोगशालाओं पर लगाए गए दावे-हालात को और बिगाड़ते हैं. अक्सर ये आरोप बिना पक्के सबूत के होते हैं जिससे गलतफहमियाँ बढ़ती हैं और जैविक हथियारों के खिलाफ बनी वैश्विक सहमति कमजोर होती है. ऐसे में ज़रूरत है खुले और निष्पक्ष संवाद की, ताकि भरोसा बने, राजनीति कम हो और यह सुनिश्चित किया जा सके कि वैज्ञानिक शोध का इस्तेमाल हथियार बनाने के लिए न हो.

भारत की वर्तमान स्थिति

BWC के संदर्भ में भारत की स्थिति कुछ हद तक विरोधाभासी है. एक ओर भारत को गैर-प्रसार के मामले में एक जिम्मेदार देश माना जाता है, लेकिन दूसरी ओर उसके पास अभी तक एक मजबूत और एकीकृत राष्ट्रीय जैव-सुरक्षा ढांचा नहीं है. जैव-सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियाँ अलग-अलग मंत्रालयों और एजेंसियों में बंटी हुई हैं, और नीति स्तर पर बायोसेफ्टी और बायोसिक्योरिटी के बीच स्पष्ट समझ भी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है.

इसके साथ ही, ग्लोबल साउथ को जैविक खतरों का जोखिम ज़्यादा है-खासकर जलवायु परिवर्तन और मानव गतिविधियों के कारण फैलने वाली संक्रामक बीमारियों, दुर्घटनाओं या जानबूझकर किए गए हमलों से. ऐसे में 2018 से ऑस्ट्रेलिया ग्रुप की सदस्यता और BWC को भारत का लगातार कूटनीतिक समर्थन उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसेमंद बनाता है. घरेलू कमियों के बावजूद भारत को वैश्विक विश्वास प्राप्त है, और इसी वजह से वह BWC को आधुनिक बनाने और उसके समान रूप से पालन को सुनिश्चित करने में ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनने की बेहतर स्थिति में है.

BWC में भारत का नेतृत्व अवसर

भारत दक्षिण–दक्षिण सहयोग के तहत जैव-सुरक्षा के मानकों को लागू करने में दूसरे देशों की मदद कर सकता है. ऑस्ट्रेलिया ग्रुप में अपने अनुभव से भारत यह दिखा सकता है कि नई जैविक तकनीकों का जिम्मेदारी से उपयोग कैसे किया जाए और उनका गलत इस्तेमाल कैसे रोका जाए. भारत भरोसे पर आधारित क्षेत्रीय सहयोग भी बना सकता है ताकि ड्यूल-यूज़ तकनीकों पर बेहतर नियंत्रण हो.BWC जैविक हथियारों के इस्तेमाल को रोकने और दुनिया में शांति व सुरक्षा बनाए रखने की सबसे अहम संधि है. यह सुनिश्चित करती है कि जीवन-विज्ञान में प्रगति सुरक्षित और जिम्मेदारी के साथ हो. इस समय भारत के पास अवसर है कि वह अपनी घरेलू कमियों को कूटनीतिक ताकत में बदले और ग्लोबल साउथ की ज़रूरतों को आगे रखते हुए आधुनिक और मजबूत BWC के लिए एक प्रमुख आवाज़ बने.


यह टिप्पणी मूल रूप से द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुई थी.

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