Originally Published ओपन Published on Dec 01, 2025 Commentaries 0 Hours ago

जब अमेरिका ने जोहान्सबर्ग जी-20 सम्मेलन का बहिष्कार किया, तब इस मीटिंग की सफलता को लेकर सवाल उठने लगे थे, लेकिन भारत से सीखे अनुभव दक्षिण अफ्रीका के काम आए. उसने दिखा दिया कि अब ग्लोबल साउथ के देश भी वैश्विक मंच का नेतृत्व करने को तैयार हैं.

G20 2025: भारत–अफ्रीका का नया समीकरण सुर्खियों में क्यों?

दक्षिण अफ्रीका को जी-20 की अध्यक्षता एक ऐसे समय पर मिली, जब वैश्विक राजनीति अपने सबसे ज़्यादा उथल-पुथल वाले दौर से गुज़र रही है. महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्ष और बहुपक्षीय संस्थाओं में भरोसे के संकट ने वैश्विक स्तर पर अविश्वास के माहौल को जन्म दिया है. इस सबके बीच, जी-20 के अध्यक्ष के रूप में दक्षिण अफ्रीका ने एक ऐसे भूमिका में कदम रखा, जिसमें संवेदनशील कूटनीति के साथ-साथ मज़बूत मजबूत नेतृत्व की भी ज़रूरत थी.

  • संकटपूर्ण वैश्विक माहौल में दक्षिण अफ्रीका को G20 अध्यक्षता मिली।
  • जोहान्सबर्ग सम्मेलन अफ्रीका के लिए प्रतीकात्मक से कहीं अधिक था।
  • ट्रंप ने ‘श्वेत जनसंहार’ के दावों का हवाला देकर G20 का बहिष्कार किया।

22-23 नवंबर को जोहान्सबर्ग में हुआ जी-20 सम्मेलन सिर्फ अफ्रीका के लिए एक प्रतीकात्मक क्षण नहीं था. यह इस बात की भी परीक्षा बन गया कि, क्या विकासशील दुनिया बहुपक्षवाद को बनाए रख सकती है,  भले ही कुछ विकसित राष्ट्र दूरी बनाने का विकल्प चुनें. ये सम्मेलन, अब इस मंच में भी बदल गया, जहां भारत का शांत लेकिन निर्णायक समर्थन ने स्पष्ट अंतर पैदा किया.

“अमेरिका द्वारा जी-20 का बहिष्कार करना एक स्पष्ट राजनीतिक असफलता थी.”

शुरुआत से ही दक्षिण अफ्रीका को विरासत में एक खंडित जी-20 संगठन मिला. यूक्रेन में युद्ध, मध्य पूर्व और अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों में बढ़ती अस्थिरता ने पहले ही संकट उत्पन्न कर रखा है. इसके अलावा, इस समय अंतर्राष्ट्रीय माहौल भी अबूझ पहेली बन चुका है जहां किसी एक बिंदु पर सहमति हासिल करना मुश्किल होता जा रहा था. इतना ही नहीं, इस फोरम की राजनीतिक एकजुटता पहले से ही कमज़ोर थी. बहुपक्षीय संस्थाओं को अपनी प्रासंगिकता को लेकर सवालों का सामना करना पड़ रहा था जबकि महाशक्तियों ने सहयोग की जगह एकतरफा रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया था.

अमेरिका ने क्यों किया जी-20 सम्मेलन का बहिष्कार?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने श्वेत लोगों का जनसंहार के झूठे दावों के आधार पर शिखर सम्मेलन का बॉयकॉट किया. अमेरिका द्वारा जी-20 का बहिष्कार करना एक स्पष्ट राजनीतिक असफलता थी. इसके बावजूद, दक्षिण अफ्रीका ने इस बात की पूरी कोशिश की, कि इन असफलताओं की छाया सम्मेलन पर ना पड़े, और वो अपने व्यापक उद्देश्यों से ना भटके. जब अमेरिका ने दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा से जी-20 अध्यक्षता एक कनिष्ठ अमेरिकी राजनयिक अधिकारी को सौंपने का अनुरोध किया, तो प्रिटोरिया ने इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया. रामाफोसा ने ज़ोर देकर कहा कि, ऐसा कदम कूटनीतिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन होगा.

 

जी-20 की अगली अध्यक्षता अमेरिका को मिली है. ऐसे में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने दक्षिण अफ्रीका से अध्यक्षता सौंपने के लिए समान पद वाले किसी अधिकारी की व्यवस्था करने के लिए कहा. हालांकि, अमेरिका की इस मांग पर प्रिटोरिया ने जो प्रस्ताव पेश किया, उसने एक संभावित अपमानजनक स्थिति को संप्रभु गरिमा के प्रदर्शन में बदल दिया. इसने स्पष्ट संकेत दिया कि, अफ्रीका अब वैश्विक शासन में किसी भी कम दर्जे को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है.

“अमेरिका के बहिष्कार के बावजूद, 40 से ज़्यादा देश और संस्थान जोहान्सबर्ग जी-20 सम्मेलन में शामिल हुए.”

अमेरिका द्वारा बॉयकॉट करना प्रतीकात्मक विरोध से ज़्यादा कुछ और भी था. इसने फोरम के भीतर राजनीतिक तनाव को बढ़ावा दिया. पिछले कुछ साल से ये नैरेटिव बन रहा है कि, शक्तिशाली देश जी-20 को अपने राष्ट्रीय हितों को साधने का ‘हथियार बना’ रहे हैं. अमेरिका के बहिष्कार ने इस नैरेटिव को आगे बढ़ाया, और इस आशंका को फिर से जीवित किया कि, ये फोरम भू-राजनीतिक स्थितियों के हिसाब से टूट सकता है. हालांकि, अमेरिकी बहिष्कार का उतना असर नहीं दिखा, जितनी उसे उम्मीद थी. जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन की वैधता को कम करने की बजाए, अमेरिका की गैरमौजूदगी ने एक उभरते हुई वास्तविकता को उजागर किया. इसने यह दिखाया कि, जी-20 अपने एक संस्थापक सदस्य देश की अनुपस्थिति में भी अच्छी तरह काम कर सकता है.

 

अमेरिकी बहिष्कार क्यों हुआ बेअसर?

अमेरिका के बहिष्कार के बावजूद, 40 से ज़्यादा देश और संस्थान जोहान्सबर्ग जी-20 सम्मेलन में शामिल हुए. इनमें से कई मध्यम शक्तियों वाले देश भी शामिल थे, जिन्होंने अमेरिकी दबाव का विरोध किया. इन देशों का वहां होना सिर्फ अफ्रीका के प्रति एकजुटता को नहीं दिखाता, बल्कि महाद्वीप की बढ़ती रणनीतिक प्रासंगिकता को भी दर्शाता है. दुनिया के ज़्यादातर देश इस बात को स्वीकार करने लगे हैं कि युवा आबादी से लेकर वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण मानी जाने वाली खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं में अफ्रीका महाद्वीप की केंद्रीय भूमिका है.

 

रूस, चीन, मेक्सिको और अर्जेंटीना के नेताओं की अनुपस्थिति के बावजूद, दक्षिण अफ्रीका ने "लीडर्स डिक्लेरेशन" जारी करने में सफलता पाई. हाल के सम्मेलनों में सबसे मुश्किल काम इस घोषणापत्र को जारी करना ही साबित हुआ है. लीडर्स डिक्लेरेशन में सूडान, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, फ़िलिस्तीन, यूक्रेन और अन्य संघर्ष क्षेत्रों में निष्पक्ष और स्थायी शांति की मांग की गई. इसके अलावा, जलवायु कार्रवाई और लैंगिक समानता पर प्रतिबद्धताओं को मज़बूती से दोहराया गया. 

 

दक्षिण अफ्रीका ने संवेदनशील भू-राजनीतिक मुद्दों पर एक समझौता सुनिश्चित किया, जबकि इसे लेकर काफ़ी विरोध और खुलकर आपत्तियां जताई गईं थीं. ये शायद इस सम्मेलन की कूटनीतिक परिपक्वता का सबसे स्पष्ट संकेत रहा. इसने यह दिखाया कि, बहुत ज़्यादा दबाव के बाद सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा एक विकासशील देश सुसंगत बहुपक्षीय परिणाम दे सकता है.

 

दक्षिण अफ्रीका की कामयाबी के पीछे भारत का हाथ

जी-20 सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका को मिली सफलता और स्थिरता के पीछे सबसे बड़ा हाथ भारत का था. अमेरिका के विपरीत, भारत ने अलगाव के बजाए सहभागिता को चुना. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ना सिर्फ सम्मेलन में भाग लिया, बल्कि राष्ट्रपति रामाफोसा की नेतृत्व क्षमता का सक्रिय भी समर्थन किया. ये सिर्फ प्रतीकात्मक एकजुटता नहीं थी, यह रणनीतिक मज़बूती भी थी.

 

भारत और दक्षिण अफ्रीका के ऐतिहासिक संबंध रहे हैं. दोनों देश लंबे समय से समावेशी बहुपक्षीयता में विश्वास साझा करते आए हैं. दोनों देशों की सोच, वसुधैव कुटुम्बकम और उबुंटू के दर्शन से प्रेरित है. “उबुंटू” एक दक्षिण अफ़्रीकी शब्द और दर्शन है, जिसका अर्थ है “अन्य लोगों के प्रति मानवता”, और यह एक सार्वभौमिक साझा संबंध को महत्वपूर्ण मानता है, जो सभी लोगों को जोड़ता है. इसे अक्सर अक्सर “मैं इसलिए हूं, क्योंकि हम हैं” के रूप में समझा जाता है. इतना ही नहीं, भारत और दक्षिण अफ्रीका वैश्विक शासन को बचाने के लिए ग्लोबल साउथ की भूमिका को मौलिक मानते हैं.

 

दक्षिण अफ्रीका की सफलता में भारत की भूमिका जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन से बहुत पहले शुरू हो गई थी. 2023 में अपनी अध्यक्षता के दौरान, भारत ने अफ्रीकी संघ की स्थायी सदस्यता को G20 में सुरक्षित किया. इससे अफ्रीका का इस संगठन में स्थान काफ़ी मज़बूत हुआ. भारत ने अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल को भी बढ़ावा दिया. दक्षिण अफ्रीका इस मॉडल को वित्तीय समावेशन, स्वास्थ्य शासन और सामाजिक सुरक्षा वितरण के लिए अपना सकता है. इसके अलावा, भारत के “ग्लोबल साउथ की आवाज” मंच ने विकासशील देशों को जी-20 के एजेंडा को प्रभावित करने के नए रास्ते दिए. इसने भी दक्षिण अफ्रीका को समर्थक देशों का व्यापक गठबंधन दिया.

“जी-20 सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका को मिली सफलता और स्थिरता के पीछे सबसे बड़ा हाथ भारत का था.”

2025 के शिखर सम्मेलन के दौरान दक्षिण अफ्रीका को भारत का समर्थन व्यावहारिक और राजनीतिक था. दक्षिण अफ्रीका ने खुले तौर पर माना कि उसने भारत की जी-20 मेज़बानी के अनुभव से "बहुत कुछ सीखा". भारत ने कार्य समूहों का प्रबंधन, डिजिटल समन्वय, लॉजिस्टिक्स, शेरपा प्रक्रियाओं और सार्वजनिक कूटनीति पर सर्वश्रेष्ठ प्रथाओं का मार्गदर्शन प्रदान किया. भारत से मिला ये अनुभव दक्षिण अफ्रीका के बहुत काम आया. अफ्रीकी महाद्वीप के सबसे बड़े वैश्विक सम्मेलन की मेज़बानी की जटिलताओं को दक्षिण अफ्रीका ने बेहतरीन तरीके से निभाया. 

 

भारत-ब्राज़ील-दक्षिण अफ्रीका की त्रिमूर्ति क्या है?

भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच बहुपक्षीयता की ओर रणनीतिक मेलजोल का अगला संकेत ‘जी-20 त्रिमूर्ति’ के माध्यम से दिखा. इसमें ब्राज़ील भी शामिल है, और तीनों देशों का ये गठबंधन वैश्विक अशांति के बीच एक स्थिरीकरण शक्ति के रूप में काम कर रहा था. भारत के अपने अध्यक्षता काल के दौरान, गंभीर भू-राजनीतिक दरारों के बावजूद, सहमति सुनिश्चित करने के अनुभव ने दक्षिण अफ्रीका को एक मॉडल प्रदान किया. प्रिटोरिया ने इसी अनुभव से कूटनीतिक धैर्य और मूल्य-आधारित कूटनीति सीखी.

 

रामाफोसा, मोदी और लूला दा सिल्वा के बीच त्रिपक्षीय संवाद ने आईबीएसए (इंडिया-ब्राज़ील-साउथ अफ्रीका) की लगातार प्रासंगिकता की भी पुष्टि की. ये एक लंबे समय से चला आ रहा गठबंधन है, जो लोकतांत्रिक सहयोग का प्रतीक है.

 

इन सब परिस्थितियों को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि दक्षिण अफ्रीका के लिए जी-20 की अध्यक्षता सिर्फ एक सम्मेलन आयोजित करने की परीक्षा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था. अफ्रीकी नेतृत्व की परीक्षा एक ऐसे समय पर हुई है, जब वैश्विक शासन एक नए संतुलन के दौर से गुज़र रहा है. दक्षिण अफ्रीका ने यह दिखाया कि, जी-20 की वैधता किसी एक देश की भागीदारी पर निर्भर नहीं करती. प्रिटोरिया ने ये दिखाया कि दुनिया भले ही खंडित हो, लेकिन ग्लोबल साउथ के पास बहुपक्षीयता का मार्गदर्शन करने की योग्यता और विज़न दोनों हैं.

 

ऐसा करके, दक्षिण अफ्रीका ने साझा मानवता पर आधारित विचार उबुंटू की विचारधारा को बढ़ावा दिया. ये सिद्धांत भारत के 'वसुधैव कुटुम्बकम' के अनुरूप है. ये विकसित दुनिया के कुछ हिस्सों में फिर से उभरे एकतरफा रवैये के जवाब में एक विकल्प प्रदान करता है.

“प्रिटोरिया की जी-20 अध्यक्षता अफ्रीका महाद्वीप के लिए एक मील का पत्थर है.”

अमेरिका दावा कर रहा है कि वो 2026 में ट्रंप नेशनल डोरल मियामी में शिखर सम्मेलन की मेज़बानी करके जी-20 की “वैधता बहाल” करेगा. अमेरिका का ये रुख़ उसके विरोधाभास को उजागर करता है. वैधता उन लोगों द्वारा बहाल नहीं की जा सकती, जो सम्मेलन में शामिल होने के बजाए गैरहाजिर रहने का विकल्प चुनते हैं. जब तक ब्रिटेन 2027 में मेज़बानी नहीं करता, तब तक दक्षिण अफ्रीका जी-20 त्रिमूर्ति का हिस्सा बना रहेगा. ऐसे में दक्षिण अफ्रीका को हटाने के लिए अमेरिका को सभी सदस्यों को राजी करना होगा. ये ना तो वास्तविक है, और न ही राजनीतिक रूप से व्यावहार्य.

 

प्रिटोरिया की जी-20 अध्यक्षता अफ्रीका महाद्वीप के लिए एक मील का पत्थर है. ये वैश्विक शासन के भविष्य को आकार देने में ग्लोबल साउथ की भूमिका की फिर से पुष्टि करती है. भारत के समर्थन के साथ, दक्षिण अफ्रीका ने हाल के वर्षों के सबसे चुनौतीपूर्ण जी-20 शिखर सम्मेलनों में से एक का सफलतापूर्वक आयोजन किया. इतना ही नहीं, उसने ये भी दिखाया कि बहुपक्षवाद का नवीनीकरण अब सिर्फ विकसित देश ही नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ के देश भी कर सकते हैं.


ये लेख मूल रूप से OPEN में छपा है.

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