हाल ही में इज़राइल ने सोमालिलैंड को मान्यता दी है जिससे चीन के लिए ताइवान, ‘वन चाइना’ नीति और लाल सागर में सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन हो गया है. इससे यह क्षेत्र अब महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया है.
दिसंबर 2025 में इज़राइल द्वारा सोमालिलैंड को एक स्वतंत्र और संप्रभु देश के रूप में मान्यता देना हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका में एक बड़ा कूटनीतिक झटका माना जा रहा है. इसका असर केवल कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं है. यह कदम शीत युद्ध जैसी प्रॉक्सी प्रतिस्पर्धा को बढ़ा सकता है, आर्थिक और राजनीतिक दबाव की राजनीति को तेज कर सकता है और लाल सागर जैसे पहले से ही अस्थिर समुद्री क्षेत्र का और अधिक सैन्यीकरण कर सकता है.
अब तक ज़्यादातर चर्चा इज़राइल की समुद्री रणनीति और क्षेत्रीय देशों, पश्चिम एशिया तथा तुर्की की प्रतिक्रियाओं पर केंद्रित रही है लेकिन सबसे गहरी रणनीतिक दुविधा चीन के सामने है. बीजिंग के लिए सोमालिलैंड तीन अहम हितों के चौराहे पर स्थित है- ‘वन चाइना’ नीति की रक्षा, लाल सागर मार्ग की सुरक्षा और अफ्रीका में बढ़ती महाशक्ति प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करना.
इसी कारण चीन की प्रतिक्रिया अपेक्षित रही है. उसने इज़राइल के फैसले की आलोचना करते हुए इसे अलगाववाद को समर्थन देने वाला कदम बताया और दोहराया कि सोमालिलैंड सोमालिया का अविभाज्य हिस्सा है. हालांकि, चीन के लिए सोमालिलैंड के संप्रभुता दावे को पूरी तरह खारिज करना अन्य विवादित क्षेत्रों की तुलना में अधिक कठिन हो सकता है. सोमालिलैंड ने तीन दशकों से अपेक्षाकृत शांति बनाए रखी है, कार्यशील संस्थाएं विकसित की हैं और नियमित चुनाव कराए हैं. इसके विपरीत, सोमालिया लंबे समय से अस्थिरता से जूझ रहा है. भले ही चीन आंतरिक स्थिरता को राज्य की मान्यता का आधार मानने से इनकार करता हो लेकिन सोमालिलैंड का लंबे समय से एक वास्तविक (डी फैक्टो) राज्य के रूप में बने रहना चीन की कठोर संप्रभुता नीति की सीमाओं को उजागर करता है.
बीजिंग के लिए सोमालिलैंड तीन अहम हितों के चौराहे पर स्थित है- ‘वन चाइना’ नीति की रक्षा, लाल सागर मार्ग की सुरक्षा और अफ्रीका में बढ़ती महाशक्ति प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करना.
ताइवान का पहलू इस दुविधा को और गंभीर बनाता है. वर्ष 2020 में सोमालिलैंड ने ताइपे के साथ आधिकारिक संबंध स्थापित किए जो सीधे तौर पर ‘वन चाइना’ नीति को चुनौती देता है. हरगेईसा में ताइवान का प्रतिनिधि कार्यालय और तकनीकी, चिकित्सा तथा आर्थिक सहयोग ने सोमालिलैंड को अफ्रीका में एक अपवाद बना दिया है. वर्तमान में अफ्रीका में ताइवान से जुड़े देशों में केवल एस्वातिनी (पूर्व स्वाज़ीलैंड) ही एक और उदाहरण है.
चीन की चिंताएँ केवल विचारधारा तक सीमित नहीं हैं. लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाला बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य चीन के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम है. यह मार्ग समुद्री सिल्क रोड का एक प्रमुख हिस्सा है. बीजिंग इसे वैश्विक व्यापार की जीवन रेखा बताता रहा है. इसी रणनीतिक महत्व के कारण चीन ने 2017 में पड़ोसी जिबूती में अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा स्थापित किया ताकि इस समुद्री मार्ग के पास अपनी सुरक्षा मौजूदगी बनाए रखी जा सके.
इज़राइल द्वारा सोमालिलैंड को मान्यता मिलने से क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ सकता है. अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलने पर सोमालिलैंड अदन की खाड़ी में वैकल्पिक सुरक्षा और लॉजिस्टिक केंद्र बन सकता है. इससे जिबूती के पास चीन के प्रभाव और निवेश कमजोर पड़ने का जोखिम है.
इस स्थिति में बीजिंग के सामने एक कठिन रणनीतिक विकल्प है. एक ओर उसे किसी भी देश द्वारा सोमालिलैंड को मान्यता दिए जाने का विरोध करना है और ताइवान के लिए किसी भी कूटनीतिक गुंजाइश को रोकना है. दूसरी ओर, अगर वह सोमालिलैंड पर अत्यधिक दबाव डालता है तो हरगेइसा और अधिक मजबूती से चीन के प्रतिद्वंद्वियों-ताइवान, इज़राइल और पश्चिमी देशों-की ओर झुक सकता है जो जिबूती के विकल्प तलाश रहे हैं. ज़्यादा सख्त आर्थिक दबाव या खुला राजनीतिक हस्तक्षेप चीन की उस छवि को भी नुकसान पहुंचा सकता है, जिसे वह गैर-हस्तक्षेप की नीति का समर्थक बताकर पेश करता है.
अगर वह सोमालिलैंड पर अत्यधिक दबाव डालता है तो हरगेइसा और अधिक मजबूती से चीन के प्रतिद्वंद्वियों-ताइवान, इज़राइल और पश्चिमी देशों-की ओर झुक सकता है जो जिबूती के विकल्प तलाश रहे हैं.
इसी कारण चीन हाइब्रिड रणनीतियों का सहारा ले सकता है जिनमें आर्थिक दबाव, स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व पर प्रभाव डालने की कोशिशें और लक्षित सूचना अभियानों का इस्तेमाल शामिल है. इसके संकेत पहले से दिखने लगे हैं. उदाहरण के तौर पर, चीनी मीडिया नेटवर्क-जैसे स्टार्टाइम्स, जो अफ्रीका के 30 से अधिक देशों में सक्रिय है-क्षेत्रीय अखंडता और बाहरी हस्तक्षेप जैसे मुद्दों पर जनमत को प्रभावित करने के साधन बन सकते हैं.
इस बीच, फ़िलिस्तीन के समर्थन में चीन का बढ़ता रुख एक और जटिलता जोड़ता है. गाज़ा में इज़राइल की कार्रवाइयों की आलोचना कर और फ़िलिस्तीनी अधिकारों का समर्थन करके चीन, इज़राइल के सोमालिलैंड फैसले के खिलाफ अपनी नैतिक आपत्ति को मज़बूत करता है. यह रुख अरब देशों और ग्लोबल साउथ में तो लोकप्रिय है लेकिन इससे चीन मध्य पूर्व की राजनीतिक खींचतान में और उलझ सकता है जिससे उसकी पारंपरिक व्यावहारिक और संतुलित नीति प्रभावित हो सकती है.
इज़राइल की मान्यता ने इसे हॉर्न ऑफ अफ्रीका में महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के केंद्र में ला खड़ा किया है.
बड़ी तस्वीर में चीन की दुविधा और गहरी होती जा रही है. 2024 में इथियोपिया द्वारा बंदरगाह पहुँच के बदले सोमालिलैंड को मान्यता देने की पहल, अमेरिकी कांग्रेस में सोमालिलैंड को एक लोकतांत्रिक और रणनीतिक साझेदार के रूप में लेकर बढ़ती रुचि, और यूएई का परोक्ष समर्थन-ये सभी संकेत देते हैं कि इज़राइल का कदम व्यापक भू-राजनीतिक बदलाव की शुरुआत कर सकता है. हर नई मान्यता से चीन के लिए सोमालिलैंड को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग रखना और कठिन होता जाएगा.
आखिरकार, चीन की चुनौती केवल सोमालिलैंड की मान्यता को रोकने की नहीं है. असली चिंता ताइवान की बढ़ती मौजूदगी, लाल सागर क्षेत्र में इज़राइल और पश्चिमी देशों की गहरी पैठ, और जिबूती के पास एक वैकल्पिक सुरक्षा ढांचे के उभरने से है. इज़राइल के फैसले ने चीन को सिद्धांत और व्यावहारिकता के बीच एक असहज संतुलन साधने के लिए मजबूर कर दिया है.
स्पष्ट है कि सोमालिलैंड अब कूटनीति का कोई छोटा या अनदेखा मुद्दा नहीं रहा. इज़राइल की मान्यता ने इसे हॉर्न ऑफ अफ्रीका में महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के केंद्र में ला खड़ा किया है. साथ ही, इसने ऐसे क्षेत्र में चीन की संप्रभुता, सुरक्षा और प्रभाव से जुड़ी नीति की सीमाओं को उजागर कर दिया है, जो वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति के लिए लगातार अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है.
यह टिप्पणी मूल रूप से द हिंदू में प्रकाशित हुई थी.
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Dr. Samir Bhattacharya is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), where he works on geopolitics with particular reference to Africa in the changing ...
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