Author : Samir Saran

Originally Published The Jakarta Post Published on Feb 16, 2026 Commentaries 1 Days ago

दावोस में हुई चर्चाएं बताती हैं कि वैश्विक नेतृत्व और शक्ति का संतुलन तेजी से बदल रहा है. इस लेख में समझिए कि अलग-अलग देशों की सोच दुनिया के भविष्य को कैसे आकार दे रही है और इसमें भारत की भूमिका क्यों अहम होती जा रही है.

दावोस 2026: अमेरिका, यूरोप और भारत की नई टकराहट

स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम को सिर्फ अमीर और प्रभावशाली लोगों का जमावड़ा समझना ठीक नहीं है. ये नए युग की मानसिकता का बैरोमीटर है. ये मीटिंग दिखाती है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य को लेकर दुनिया पर प्रभाव डालने में सक्षम नेता और शक्तिशाली लोग क्या सोचते हैं. इस साल फोरम में नेतृत्व के छह पहलू दिखे और ये सहमति नहीं बल्कि विरोधाभास पेश करते हैं. 

छह निर्णायक पहलू

पहला पहलू प्रबंधकीय देखभाल का था, जिसकी झलक कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की स्पीच में दिखी. उन्होंने तर्क दिया कि महाशक्तियों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा की वजह से अब ज्यादातर देशों ने 'अधिक रणनीतिक स्वायत्तता' की तलाश शुरू कर दी है. इससे दुनिया में बेचैनी और खेमेबंदी बढ़ रही है.

कार्नी का भाषण संस्थागत आत्मविश्वास पर आधारित था. उन्होंने घरेलू अर्थव्यवस्थाओं को मज़बूत करने पर ज़ोर दिया, कार्नी ने एक ऐसी विश्व व्यवस्था की वकालत की, जो मानव अधिकारों, सतत विकास और संप्रभुता का सम्मान करे. उनका दावोस संदेश यह था कि दुनिया को 'सिद्धांतपूर्ण और व्यावहारिक' होना चाहिए, ना कि वैश्विक व्यवस्था को फिर से डिज़ाइन करने की कोशिश करनी चाहिए. यह नेतृत्व मौजूदा संस्थानों पर भरोसा करता है और मानता है कि इन संस्थाओं के पास अभी दुनिया को देने के लिए बहुत कुछ है. 

कार्नी ने एक ऐसी विश्व व्यवस्था की वकालत की, जो मानव अधिकारों, सतत विकास और संप्रभुता का सम्मान करे. उनका दावोस संदेश यह था कि दुनिया को 'सिद्धांतपूर्ण और व्यावहारिक' होना चाहिए, ना कि वैश्विक व्यवस्था को फिर से डिज़ाइन करने की कोशिश करनी चाहिए.

दूसरा दृष्टिकोण लेन-देन संबंधी व्यवधान का था, जिसका ज़िक्र अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषण में था. ट्रंप का फोकस बहुपक्षीय लाभ की अनदेखी कर द्विपक्षीय फायदे पर था. उन्होंने आर्थिक लाभ को सर्वोच्च प्राथमिकता दी और गठबंधन को दायित्वों के बजाय साधन माना गया. ट्रंप का संदेश स्पष्ट था: समृद्धि प्रक्रिया से नहीं बल्कि शक्ति से आती है. जैसा कि ट्रम्प ने कहा, “अमेरिका एक महान शक्ति हैं, और मुझे लगता है कि दुनिया ये बात समझ गई है”. ट्रंप की रुचि टैरिफ और व्यापार घाटे पर ध्यान केंद्रित करते हुए अमेरिका के फायदे पर था. वो नियमों या संस्थाओं का निर्माण नहीं, बल्कि अमेरिका का हित देख रहे थे. 

दावोस का तीसरा पक्ष सामान्य नेतृत्व की इच्छा थी, जिसे यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने व्यक्त किया. उन्होंने यूरोप के इस विश्वास को फिर से पुष्टि करने की कोशिश की कि सार्वभौमिक मूल्य अभी भी शक्ति का आधार बन सकते हैं. इस संदर्भ में उन्होंने जलवायु नेतृत्व, नियम-आधारित व्यापार और जिम्मेदार डिजिटल सहयोग का रणनीतिक शक्ति के स्रोत के रूप में उल्लेख किया. 

फिर भी, दावोस में एक अनसुलझा तनाव मौजूद था: यूरोप का प्रभाव मानकों पर आधारित है, लेकिन अब दुनिया ये परख रही है कि क्या यूरोप में इन मानकों को लागू करने की क्षमता है. वर्तमान में, दुनिया मूल्यों से ज़्यादा ताक़त की कद्र करती है. वॉन डेर लेयेन का भाषण आदर्शवादी, सार्थक और सिद्धांतपरक था, लेकिन इसके साथ ही यह थोड़ा उदासी भरा भी था. उन्होंने कहा कि "25 साल पहले उन्होंने जिस सहयोगी विश्व व्यवस्था की कल्पना की थी, वह वास्तविकता में नहीं बदली."

चौथा पक्ष समावेशन के सिद्धांत की ओर वापसी का था, जिसे इंडोनेशियाई राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो ने स्पष्ट किया. उनके भाषण का आधार यह विश्वास कि "शांति के बिना कोई समृद्धि नहीं होगी". प्राबोवो ने इंडोनेशिया को "ग्लोबल ब्राइट स्पॉट" के रूप में मान्यता प्राप्त होने पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि इंडोनेशिया ने ये उपलब्धि "विभाजन के ऊपर एकता और टकराव के बजाय सहयोग" की विरासत और ऋण चुकौती के लगातार निर्दोष रिकॉर्ड की बदौलत हासिल की है. प्राबोवो सुबियांतो ने यह साबित करने की कोशिश की  इंडोनेशिया में मज़बूत घरेलू निवेश अंतर्राष्ट्रीय जगत को आकर्षित कर रहा है. 

अगर इन सबको साथ मिलकर देखें, तो ये चार दृष्टिकोण एक टूटी हुई वैश्विक बातचीत को उजागर करते हैं. आवश्यकता के बिना प्रबंधन, जिम्मेदारी के बिना विघटन, पर्याप्त शक्ति के बिना मूल्य और अराजकता पर शांति.

पांचवां, लेकिन महत्वपूर्ण पक्ष पेश किया भारत ने ज़ुबानी जमाखर्च की बजाए तकनीकी आत्मविश्वास के साथ ये पक्ष सामने रखा गया. भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अष्विनी वैष्णव ने प्रभावी तरीके से अपनी बात रखी. उन्होंने भारत की विनिर्माण प्रगति और उसके रूपांतरकारी डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के विकास को दुनिया के सामने पेश किया. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की होड़ को लेकर वैष्णव ने कहा बड़े पैमाने पर लार्ज लैंग्वेज मॉडल बनाना ही किसी देश की सफलता की गारंटी नहीं है. यह भी देखना होगा कि एआई का कितना रचनात्मक उपयोग किया जाता है. अश्विनी वैष्णव की साधारण शैली ने दावोस में जुटे दिग्गजों को बताया कि विश्वसनीयता घोषणा से नहीं, बल्कि कार्यान्वयन से आती है. 

छठा रंग राजनीतिक उपस्थिति का था, जिसका प्रतिनिधित्व स्मृति ईरानी ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के लीड पवेलियन में किया. उनकी भागीदारी का मक़सद महिलाओं की नेतृत्व क्षमता, स्वास्थ्य और उद्यम पर भारत की आवाज़ को मज़बूती से पेश करना था. इसे वैश्विक हित के गठबंधन के रूप में पेश किया गया.

भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अष्विनी वैष्णव ने प्रभावी तरीके से अपनी बात रखी. उन्होंने भारत की विनिर्माण प्रगति और उसके रूपांतरकारी डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के विकास को दुनिया के सामने पेश किया.

अपनी शुरुआत के बाद से इस गठबंधन ने महिलाओं के स्वास्थ्य की ओर ध्यान खींचा है. इसे अब 'आर्थिक और राष्ट्रीय अनिवार्यता' के रूप में देखा जा रहा है. स्मृति ईरानी का संदेश था कि महिलाओं को भी निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में रखा जाए. सरकारों और बिजनेस के स्तर पर इस संदेश की गूंज सुनाई दी.

निष्कर्ष

कुल मिलकर, यह छह दृष्टिकोण नेतृत्व के परिदृश्य की एक नई कहानी बताते हैं, जो अलग-अलग सोच के हिसाब से विभाजित हो रहा है: प्रबंधकीय, लेन-देन आधारित, मानक, समावेशी, तकनीकी और राजनीतिक. हालांकि, दावोस अब भी महत्वपूर्ण मंच है, लेकिन अब यह दुनिया बदलने वाली पटकथा नहीं लिखी जाती. आज सबसे महत्वपूर्ण नेतृत्व उन लोगों द्वारा प्रदान किया जाता है, जो क्षमता के साथ आत्मविश्वास और महत्वाकांक्षा के साथ काम को पूरा करना जानते हैं.    

इस संदर्भ में देखें तो भारत और इंडोनेशिया का दृष्टिकोण स्पष्टता दिखाता है. यह संकेत देता है कि भविष्य उनके लिए नहीं है, जो प्रभावशाली ढंग से बोलते हैं, बल्कि उनके लिए है जो खामोशी से, लेकिन लगातार बेहतर भविष्य का निर्माण कर रहे हैं.


ये लेख द जकार्ता पोस्ट में प्रकाशित हो चुका है.

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