अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का भारत दौरा अमेरिका-भारत संबंधों को स्थिर करने और वैश्विक भू-राजनीतिक बदलावों के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को दर्शाता है. भारत क्वाड और ब्रिक्स दोनों गठबंधनों के साथ जुड़कर बहुध्रुवीय दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है.
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का चार दिवसीय भारत दौरा किसी आम राजनयिक दौरे के सामान्य पड़ाव से कहीं बढ़कर है. यह वाशिंगटन द्वारा एक ऐसे रिश्ते को स्थिर कर उसे पटरी पर लाने के लिए नए सिरे से किए जाने वाले प्रयासों को भी रेखांकित करता है, जिन संबंधों में बीते कुछ समय से खासी उथल-पुथल रही है.
यह शक्ति संतुलन की राजनीति के प्रति भारत के निरंतर परिपक्व होते परिष्कृत दृष्टिकोण को भी दर्शाता है. एक ऐसे दौर में जहां अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था विखंडन के दौर से गुजर रही है, वहां नई दिल्ली पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाले क्वाड और गैर-पश्चिमी देशों के ब्रिक्स जैसे दोनों गठबंधनों के साथ जुड़ाव को और गहरा करके अपने रणनीतिक लचीलेपन को धार देने में लगी है.
रूबियो 23 से 26 मई के बीच भारत में रहेंगे. विदेश मंत्री के रूप में उनका यह पहला भारत दौरा है, जिसका प्रतीकात्मक एवं रणनीतिक दोनों स्तरों पर महत्व है. कोलकाता, जयपुर, आगरा और नई दिल्ली जैसे पड़ावों से गुजरने वाले उनके इस दौरे के बहुत गहरे निहितार्थ हैं, जिसके तार सभ्यतागत संपर्क को भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के साथ जोड़ते हैं. स्वाभाविक है कि इसमें एक गंभीर कूटनीतिक एजेंडा भी है, जिसकी कड़ियां ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक मुद्दों, रक्षा सहयोग और महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन से जुड़ी हैं. इस यात्रा का समय भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है.
एक ऐसे दौर में जहां अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था विखंडन के दौर से गुजर रही है, वहां नई दिल्ली पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाले क्वाड और गैर-पश्चिमी देशों के ब्रिक्स जैसे दोनों गठबंधनों के साथ जुड़ाव को और गहरा करके अपने रणनीतिक लचीलेपन को धार देने में लगी है.
ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों में टैरिफ, भारत की रूस के साथ निरंतर सक्रियता और क्वाड को लेकर शिथिलता के चलते तनाव दिखा है. इस परिदृश्य में रूबियो की भारत यात्रा वाशिंगटन की उसी मान्यता का प्रतीक है कि कतिपय असहमतियों के बावजूद भारत अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति के लिए अपरिहार्य बना हुआ है.
इस यात्रा के केंद्र में क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक है. भारत के अलावा अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया क्वाड का हिस्सा है. समय के साथ क्वाड एक परामर्शीय मंच से बढ़कर हिंद-प्रशांत रणनीतिक ढांचे का एक केंद्रीय स्तंभ बनकर उभरा है. वाशिंगटन के लिए यह चीन के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव को संतुलित करने के साथ ही तकनीकी समन्वय, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला के लचीलेपन में बढ़ोतरी का एक माध्यम भी है. इसलिए क्वाड के आयोजन में रूबियो की उपस्थिति साझेदारों को यही आश्वस्त करने वाली है कि वैश्विक स्तर पर विभिन्न गतिरोधों के बावजूद अमेरिका हिंद-प्रशांत को लेकर उतना ही प्रतिबद्ध है.
चूंकि क्वाड एक औपचारिक गठबंधन नहीं, इसलिए यह भारत के लिए किसी खांचे में बंधे बिना ही बहुत उपयोगी प्रतीत होता है. नई दिल्ली भी इसे सामरिक छत्र प्रदान करने वाले किसी समूह के बजाय लचीली रणनीतिक साझेदारी के रूप में ही देखती है. यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि क्वाड भारत को अपनी विदेश नीति स्वायत्तता से समझौता किए बिना ही रक्षा प्रौद्योगिकी, समुद्री सहयोग और भू-राजनीतिक समन्वय के अवसर प्रदान करता है.
क्वाड बैठक की मेजबानी से कुछ दिन पहले ही भारत ने ब्रिक्स विदेश मंत्रियों से जुड़ा आयोजन भी किया था. ब्रिक्स में अब पारंपरिक सदस्यों के साथ ईरान जैसे देश भी शामिल हैं. कुछ जानकारों के लिए दोनों स्तरों पर भारत की यह भागीदारी विरोधाभासी लग सकती है, लेकिन वास्तव में यह भारत की समकालीन विदेश नीति की तार्किकता को ही प्रदर्शित करती है, जो किसी एक रेखा में चलने के बजाय बहुस्तरीय सक्रियता को वरीयता देती है. वैसे भी ब्रिक्स के माध्यम से भारत के कई उद्देश्य पूरे होते हैं.
वैश्विक दक्षिण की एक मुखर आवाज के रूप में भारत के कद को मजबूत बनाते हुए यह सहभागिता रूस के प्रति रणनीतिक सहयोग को दृढ़ता प्रदान करती है और बहुध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूती देती है. ब्रिक्स भारत को वैश्विक शासन सुधार और आर्थिक पुनर्गठन पर बहस को आकार देने के लिए भी एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है. पश्चिम पर भारत की निर्भरता घटाता है. वस्तुत: ये दोनों साझेदारियां असंगति नहीं, अपितु रणनीतिक समायोजन अधिक है.
स्पष्ट है कि प्रतिस्पर्धी शक्ति केंद्रों के बीच भारत अपने प्रभाव को अधिकतम करने का प्रयास कर रहा है. देखा जाए तो ब्रिक्स और क्वाड की बैठकों की निकटता कोई संयोग नहीं, बल्कि प्रतिकूल भू-राजनीतिक मंचों के बीच भारत की सहजता से कार्य करने की क्षमताओं को दर्शाती है. संतुलन साधने की यह कवायद भी जटिलताओं से मुक्त नहीं है. जहां वाशिंगटन रूस और चीन से संबंधित मुद्दों पर भारत से अधिक समन्वय की अपेक्षा करता है. वहीं, भारत आर्थिक वास्तविकता, रक्षा निर्भरता और सुरक्षा चिंताओं के स्तर पर अपने हित सुरक्षित करने की कवायद में इसे लेकर भी सतर्क रहता है कि कहीं मास्को या बीजिंग इसे गलत अर्थों में न लें.
इसमें कोई संदेह नहीं कि तकनीकी आधुनिकीकरण, रक्षा परिवर्तन और आर्थिक विकास के लिए भारत को अमेरिका की आवश्यकता है, लेकिन भारत किसी खेमे से एकतरफा जुड़ाव न रखने को लेकर भी उतना ही दृढ़ है. इस संदर्भ में रूबियो की यात्रा भारत की समकालीन रणनीतिक पहचान को ही प्रदर्शित करती है.
वापस रूबियो की यात्रा की बात करें तो इसे वैश्विक राजनीति में एक व्यापक पुनर्संयोजन के तौर पर देखा जाना चाहिए. इसमें कोई संदेह नहीं कि तकनीकी आधुनिकीकरण, रक्षा परिवर्तन और आर्थिक विकास के लिए भारत को अमेरिका की आवश्यकता है, लेकिन भारत किसी खेमे से एकतरफा जुड़ाव न रखने को लेकर भी उतना ही दृढ़ है. इस संदर्भ में रूबियो की यात्रा भारत की समकालीन रणनीतिक पहचान को ही प्रदर्शित करती है.
नई दिल्ली अब केवल शक्ति समीकरणों को ही नहीं साध रही, अपितु ध्रुवीकृत दुनिया में वैश्विक परिणामों को आकार देने के लिए संबंधों, संस्थानों और अपेक्षाओं के स्तर पर भी संतुलन बना रही है. ऐसे में रूबियो के दौरे की सफलता बड़ी-बड़ी घोषणाओं से अधिक इस पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष एक दूसरे की रणनीतिक आवश्यकताओं को किस प्रकार संबोधित करेंगे. विशेष रूप से भारत के इस रुख को देखते हुए कि वह नए दौर के शीत युद्ध में किसी खेमे का हिस्सा बनने के बजाय भावी बहुध्रुवीय ढांचे में स्वयं को एक स्वायत्त ध्रुव के रूप में देखता है.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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