कोल्बी की भारत यात्रा बताती है कि अब भारत-अमेरिका के रिश्ते बातों से आगे बढ़कर ठोस रणनीतिक सहयोग और साझा हितों पर टिक रहे हैं. पढ़िए कैसे भारत की सोच और ट्रंप की नीति के बीच तालमेल दिखाते हुए, दोनों देश अब बराबरी और व्यावहारिकता के साथ साझेदारी मजबूत कर रहे हैं.
एलब्रिज कोल्बी की नई दिल्ली यात्रा सामान्य राजनयिक मुलाक़ात से कहीं अधिक एक सुनियोजित रणनीतिक हस्तक्षेप थी, जिससे अमेरिका-भारत संबंधों में आए बदलाव का पता चलता है. कोल्बी अमेरिकी युद्ध विभाग में उप-सचिव हैं और वह ऐसे वक्त में भारत आए, जब विश्व की राजनीति में उथल-पुथल मची हुई है. फिर भी, अनिश्चितता बढ़ाने के बजाय, उनकी मुलाक़ातों ने यही संकेत मिला कि अमेरिका अब महत्वाकांक्षी साझेदारी के उलट हितों को आगे बढ़ाने वाला गठबंधन बनाने को इच्छुक है. इसलिए, इस यात्रा में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि ‘ट्रंप 2.0’ में तमाम निराशाओं के बावजूद द्विपक्षीय संबंधों में गति बनी हुई है और बदलती रणनीतिक वास्तविकताओं के अनुसार रिश्तों में सहजता आने लगी है.
भारतीय अधिकारियों के साथ अपनी मुलाक़ातों में कोल्बी ने बढ़-चढ़कर कोई बयानबाजी नहीं की. बजाय इसके, उन्होंने हाल-फिलहाल के द्विपक्षीय समझौतों की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने पर ध्यान लगाया, विशेष रूप से ट्रंप-मोदी के संयुक्त बयान और अक्टूबर 2025 के डिफेंस फ्रेमवर्क की प्रतिबद्धताओं पर. इन दायित्वों को पूरा करने का प्रयास महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले दो दशकों में, अमेरिका और भारत के संबंधों में एक तरह की उलझन दिखी है. इन वर्षों में राजनीतिक संकेत तो खूब दिखे, पर उनको रणनीतिक रूप से लागू करने में सावधानी बरती गई. कोल्बी की यात्रा बता रही थी कि वाशिंगटन अब इस अंतर को ख़त्म करना चाहता है.
कोल्बी खुद भी इस बदलाव के प्रतीक हैं. 2018 की राष्ट्रीय रक्षा रणनीति बनाने वालों में वह प्रमुख थे और उनकी सोच में, विशेष रूप से चीन के साथ प्रतिस्पर्धा दिखती थी. नई दिल्ली के साथ अपने नज़रिये को वह ‘लचीला यथार्थवाद’ बताया करते थे, यानी एक ऐसा ढांचा, जिसमें विचारधारा के बजाय हितों, क्षमताओं और प्रोत्साहनों को प्राथमिकता दी जाती थी. यही कारण है कि नई दिल्ली में उनके सार्वजनिक बयान न केवल अपने कथनों के लिए, बल्कि उन बातों के लिए भी महत्वपूर्ण रहे, जो उन्होंने अनकहा छोड़ दिया. ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ या लोकतांत्रिक एकजुटता की चर्चा न करते हुए उन्होंने संप्रभुता, रणनीतिक स्वतंत्रता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में वर्चस्व को रोकने की ज़रूरत पर बल दिया, जो अमेरिका के पिछले बयानों से जानबूझकर किया गया बदलाव था. हालांकि, जो बात सबसे अलग दिखी, वह थी कोल्बी का भारत की रणनीतिक सोच के साथ सीधा जुड़ाव. एस जयशंकर के ‘द इंडिया वे’ विचार का ज़िक्र करते हुए उन्होंने यही संकेत दिया कि भारत का विश्व दृष्टिकोण सिर्फ प्रतिक्रियात्मक नहीं है, बल्कि वैचारिक रूप से उचित है. ‘अमेरिका फर्स्ट’ और भारत द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों को दी जाने वाली प्राथमिकता के बीच उन्होंने जो समानताएं बताईं, वह इत्तेफ़ाक़ नहीं थीं, बल्कि इस सहमति का संकेत थी कि विदेश नीति को महज़ वायदों के बजाय ठोस हितों पर आधारित होना चाहिए.
अमेरिकी युद्ध विभाग में उप-सचिव हैं और वह ऐसे वक्त में भारत आए, जब विश्व की राजनीति में उथल-पुथल मची हुई है. फिर भी, अनिश्चितता बढ़ाने के बजाय, उनकी मुलाक़ातों ने यही संकेत मिला कि अमेरिका अब महत्वाकांक्षी साझेदारी के उलट हितों को आगे बढ़ाने वाला गठबंधन बनाने को इच्छुक है.
इसका अर्थ यह है कि अमेरिका अब अपने पुराने नज़रिये पर चलने के बजाय भारत की नई सोच के साथ तालमेल बिठाकर बढ़ना चाहता है. हालांकि, इस यात्रा से यह भी संकेत मिला कि द्विपक्षीय संबंधों में आए इस बदलाव को लेकर नई दिल्ली भी सहज हो गई है. भारत अब अमेरिका के साथ उन उलझनों के साथ नहीं जुड़ रहा, जो कभी रिश्तों की पहचान हुआ करती थे. गठबंधन के माध्यम से भी भारत ऐसा कोई भ्रम पैदा नहीं करना चाहता. यह संबंध तेज़ी से पारस्परिक लाभ पर आधारित होता जा रहा है, जो रक्षा क्षेत्र में सबसे साफ़ नज़र आता है. कोल्बी का ‘वास्तविक क्षमता’ बढ़ाने पर ज़ोर एक परिपक्व एजेंडा की ओर इशारा था. लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता, समुद्री क्षेत्र में जागरूकता, पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता और लॉजिस्टिक पर ध्यान देना बताता है कि दोनों देश हिंद-प्रशांत में सुरक्षा को लेकर एक समान सोच रखते हैं, ख़ास तौर से चीन के बढ़ते सैन्य प्रभाव से पैदा होने वाली चुनौतियों को देखते हुए.
रक्षा औद्योगिक सहयोग पर नए तरीके से ज़ोर देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. आत्मनिर्भर भारत के तहत नई दिल्ली की मंशा स्वदेशी क्षमता को बनाना है, जबकि अमेरिका के लिए, भारत को एक सक्षम सुरक्षा उपलब्ध करने वाले देश के रूप में उभरने में मदद करना, क्षेत्र में ज़िम्मेदारियों को बांटने की उसकी इच्छा का संकेत है.
सह-विकास और सह-उत्पादन से परस्पर निर्भरता मज़बूत होती है. हालांकि, इसमें ढांचागत रुकावटें बनी हुई हैं. नियमों से जुड़े अवरोध, खरीद प्रणालियों में अंतर और नौकरशाहों में कुछ हद तक अविश्वास ने इसमें बाधाएं पैदा की हैं. कोल्बी की यात्रा बताती है कि इन मुद्दों पर अब ध्यान दिया जा रहा है. हालांकि, इसकी एक विशेषता यह भी रही कि साझेदारी के दायरे को मुख्य रणनीतिक क्षेत्रों तक सीमित करने के बावजूद यह माना गया है कि रूस, ईरान या वैश्विक शासन जैसे मुद्दों पर भारत-अमेरिका में मतभेद बने रहेंगे. यह भी एक यथार्थवादी सोच है.
कोल्बी के दौरे का समय इस यात्रा को और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है. मध्य-पूर्व में जारी अस्थिरता, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में तनाव और ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिकी नीति में हो रहे बदलावों के बीच यह यात्रा हुई. इतना ही नहीं, पिछले दिनों टैरिफ़ को लेकर वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच आर्थिक तनाव भी रहा है. फिर भी, रक्षा संबंधों को आगे बढ़ाना यही बता रहा है कि आपसी रिश्ते में रणनीतिक सुरक्षा को महत्व दिया जा रहा है.
यह यात्रा भू-राजनीतिक संकेत भी देती है. भारत को हिंद-प्रशांत संतुलन के लिए ‘ज़रूरी’ बताकर, अमेरिका एक उभरती बहुध्रुवीय व्यवस्था में हमें भी एक ध्रुव की मान्यता दे रहा है. यह भारत को संतुलनकारी कारक के रूप में देखने की पुरानी अमेरिकी सोच के विपरीत है. इस रिश्ते में भागीदारी तो है, लेकिन एक-दूसरे की अधीनता नहीं है.
हालांकि, यह सुरक्षा तब तक अधूरी है, जब तक इसे मज़बूत आर्थिक आधार नहीं मिल जाता. दोनों देशों में सुरक्षा सहयोग बढ़ा है, लेकिन व्यापार और निवेश संबंध उतनी तेज़ी से आगे नहीं बढ़ पाए हैं. कोल्बी ने अपने बयानों में इसे माना भी. यह यात्रा भू-राजनीतिक संकेत भी देती है. भारत को हिंद-प्रशांत संतुलन के लिए ‘ज़रूरी’ बताकर, अमेरिका एक उभरती बहुध्रुवीय व्यवस्था में हमें भी एक ध्रुव की मान्यता दे रहा है. यह भारत को संतुलनकारी कारक के रूप में देखने की पुरानी अमेरिकी सोच के विपरीत है. इस रिश्ते में भागीदारी तो है, लेकिन एक-दूसरे की अधीनता नहीं है.
भारत के लिए, यह एक अवसर और जिम्मेदारी, दोनों है. रणनीतिक महत्व बढ़ने से भारत के लिए क्षेत्रीय स्तर पर अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं. स्वायत्तता से समझौता किए बिना इस उम्मीद को पूरा करना नई दिल्ली के लिए आसान नहीं होगा. इसलिए, कोल्बी की इस यात्रा से दूरगामी असर पड़ सकता है. यह एक ऐसी साझेदारी का संकेत है, जिसमें धीरे-धीरे पिछली अस्पष्टता दूर हो रही है और कुछ मुश्किलों के बावजूद एक रणनीतिक संबंध आगे बढ़ रहा है. यह ऐसा रिश्ता है, जिसमें भारत हमेशा से सहज रहा है. यानी, ऐसा संबंध, जिसमें भारत की स्वतंत्रता का सम्मान हो, उसके हितों को माना जाए और व्यावहारिक सहयोग बनाया जाए. अमेरिका को इसके लिए लचीला रुख अपनाना होगा, जिसका संकेत कोल्बी की यात्रा से मिला.
हां, इसमें अति-सुधार से बचना ज़रूरी होगा. हितों पर आधारित व्यवस्था टिकाऊ तो होती है, लेकिन उसमें संकीर्णता भी दिख सकती है. इसलिए ज़रूरी होगा कि दोनों देश बदलती परिस्थितियों के मुताबिक रिश्तों में सहजता लाएं. बदलते भू-राजनीतिक दौर में महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान लगाने से ही इस रिश्ते को बड़ी ताक़त मिल सकती है.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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