ऐसे दौर में, जब वैश्विक व्यवस्था बड़े बदलाव और अस्थिरता के दौर से गुजर रही है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 मई से पांच देशों की अहम यात्रा पर निकल रहे हैं. इस दौरे की शुरुआत संयुक्त अरब अमीरात से होगी.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसे समय में पाँच देशों की महत्वपूर्ण यात्रा पर जा रहे हैं, जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में गहरी उथल-पुथल मची हुई है. कल 15 मई से उनकी यात्रा शुरू हो रही है और वह सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात जाएंगे. इसके बाद नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और अंत में इटली. उनकी यह यात्रा इस बात का संकेत है कि भारतीय कूटनीति अब काफी परिपक्व हो चुकी है. तेज भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, बाधित आपूर्ति श्रृंखला और अस्थिर ऊर्जा बाजार के मौजूदा माहौल में नई दिल्ली ऐसे सहयोग को आगे बढ़ा रही है, जो उसके आर्थिक बदलाव और रणनीतिक स्वायत्तता में समान रूप से सहायक हो सकते हैं.
एक लिहाज से यह दौरा आर्थिक कूटनीति से जुड़ा है. हमारी विदेश नीति आज इस सोच के साथ आगे बढ़ रही है कि घरेलू विकास की महत्वाकांक्षाएं वैश्विक अर्थिकी से जुड़ी हुई हैं. खाड़ी और यूरोपीय देशों से संपर्क बढ़ाने का मकसद यह भरोसा पैदा करना है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के पुनर्गठन के इस दौर में नई दिल्ली खुद को एक भरोसेमंद विनिर्माण, प्रौद्योगिकी व निवेश-केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहती है. भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत में आई तेजी व भारत-ईएफटीए व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते जैसे प्रयासों ने गहरे आर्थिक जुड़ाव के लिए पहले से ही अनुकूल माहौल तैयार कर दिए हैं.
यह यात्रा इस बात का संकेत है कि भारतीय कूटनीति अब काफी परिपक्व हो चुकी है. तेज भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, बाधित आपूर्ति श्रृंखला और अस्थिर ऊर्जा बाजार के मौजूदा माहौल में नई दिल्ली ऐसे सहयोग को आगे बढ़ा रही है, जो उसके आर्थिक बदलाव और रणनीतिक स्वायत्तता में समान रूप से सहायक हो सकते हैं.
ऊर्जा सुरक्षा की नजर से प्रधानमंत्री का यह दौरा खासा महत्वपूर्ण है. आज दुनिया ऊर्जा सुरक्षा व हरित अर्थव्यवस्था को लेकर दोहरी चुनौतियों से जूझ रही है. ऐसे में, भारत अपने ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं व तकनीकी साझेदारों, दोनों में विविधता लाने का प्रयास कर रहा है. अक्षय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन व स्वच्छ प्रौद्योगिकियों पर सहयोग खाड़ी और नॉर्डिक क्षेत्रों की प्रधानमंत्री की इस यात्रा के मुख्य विषय हैं. यह इसलिए भी खास है, क्योंकि पश्चिम एशिया में तनाव से वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता का माहौल गहराता जा रहा है.
प्रधानमंत्री का दौरा इस बात का संकेत है कि भारत उभरती प्रौद्योगिकियों व नवाचार से जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र को महत्व देने लगा है. सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाएं, रक्षा प्रौद्योगिकियां व स्टार्टअप सहयोग अब भारत के राजनयिक संबंधों के प्रमुख आधार बन गए हैं. यह भारतीय विदेश नीति में आए बड़े बदलाव को दर्शा रहा है. पारंपरिक रूप से राजनीतिक एकजुटता दिखाने से अधिक अब प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ लेन-देन आधारित संबंध बनाने और क्षमता-निर्माण पर ज्यादा होने लगा है. रणनीतिक संबंधों के लिहाज से यह दौरा विभिन्न देशों के साथ भारत के रिश्ते मजबूत बनाएगा. यूरोप व खाड़ी देशों को प्रतिस्पर्धी भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय नई दिल्ली दोनों के साथ समान सुदृढ़ संबंध बना रही है, जो एक व्यावहारिक नजरिया है.
यूरोप - प्रधानमंत्री मोदी यूरोप ऐसे वक्त में जा रहे हैं, जब ओपेक और ओपेक प्लस से बाहर निकलने की घोषणा कर चुका है. गुजरे ढाई दशक में यह मुल्क भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है और निवेश का सातवां सबसे बड़ा स्रोत. चूंकि ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची भी इस हफ्ते नई दिल्ली में होंगे, ऐसे में, अबू धाबी और तेहरान, दोनों के साथ समान तालमेल बनाए रखना (खासकर ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से) एक बड़ी चुनौती मानी जा रही है. किंतु राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात यूएई के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को और मजबूती देगी. पश्चिम एशियाई भू-राजनीति की बढ़ती अहमियत और खाड़ी ऊर्जा समीकरणों में हो रहे बदलाव को देखते हुए उम्मीद है कि इस दौरे में क्षेत्रीय स्थिरता व दीर्घकालिक परस्पर आर्थिक हितों पर अधिक ध्यान दिया जाएगा.
प्रधानमंत्री मोदी पहली बार यहां जा रहे हैं. पिछले चार दशकों में यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा है. तमाम मेल-मुलाकातों के अलावा प्रधानमंत्री यहां तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में शिरकत करेंगे, जिससे स्वच्छ प्रौद्योगिकी, नीली अर्थव्यवस्था, आर्कटिक शासन, रक्षा और अंतरिक्ष के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग बढ़ने की उम्मीद है.
नीदरलैंड - नीदरलैंड से बढ़ता संबंध यूरोप के तकनीकी और लॉजिस्टिकल इकोसिस्टम को दिए जा रहे महत्व का संकेत है. राजा विलेम-अलेक्जेंडर, रानी मैक्सिमा व प्रधानमंत्री रॉब जेटेन के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकातों से सेमीकंडक्टर, जल प्रबंधन और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ने की उम्मीद है. यूरोप में भारतीय निवेश के प्रवेश द्वार के रूप में नीदरलैंड की अहमियत जगजाहिर है. उन्नत प्रौद्योगिकी को दिया जा रहा महत्व बता रहा है कि संबंधों में बदलाव आया है.
स्वीडन - यूरोप की नवाचार-संचालित अर्थव्यवस्थाओं तक भारत की पहुंच बढ़ाने की एक अन्य महत्वपूर्ण कड़ी स्वीडन है. प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन का निमंत्रण का यही संकेत है कि स्टॉकहोम हरित प्रौद्योगिकी, एआई, रक्षा विनिर्माण व मजबूत औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला के क्षेत्र में भारत के साथ साझेदारी बनाना चाहता है. यहां यूरोपीय उद्योग गोलमेज सम्मेलन की भी प्रधानमंत्री संबोधित करेंगे, जो बताता है कि यूरोप भारत को एक अनिवार्य आर्थिक-रणनीतिक साझेदार मान रहा है.
नॉर्वे - रही बात नॉर्वे की, तो यह प्रतीकात्मक रूप से सबसे अहम पड़ाव है. प्रधानमंत्री मोदी पहली बार यहां जा रहे हैं. पिछले चार दशकों में यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा है. तमाम मेल-मुलाकातों के अलावा प्रधानमंत्री यहां तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में शिरकत करेंगे, जिससे स्वच्छ प्रौद्योगिकी, नीली अर्थव्यवस्था, आर्कटिक शासन, रक्षा और अंतरिक्ष के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग बढ़ने की उम्मीद है. नॉर्डिक क्षेत्र को भारत ने केवल पूंजी और प्रौद्योगिकी के रूप में नहीं देखा है, बल्कि उभरती वैश्विक व्यवस्था को आकार देने में उसे एक अहम रणनीतिक भागीदार भी मान रहा है.
इटली - इस दौरे का आखिरी पड़ाव इटली है. साल 2024 के जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री की पहल से इटली से संबंधों में जो तेजी आई हुई है. यहां संयुक्त रणनीतिक कार्य-योजना 2025-2029 के क्रियान्वयन पर चर्चा होने की उम्मीद है. आज रक्षा सहयोग, स्वच्छ ऊर्जा साझेदारी, वैज्ञानिक सहयोग और निवेश भारत-इटली संबंधों को काफी आगे बढ़ा रहे हैं. यह इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यूरोप अपनी रणनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं पर नए सिरे से गौर करने में जुटा है.
कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा बता रहा है कि भारतीय विदेश नीति तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप ढल रही है. नई दिल्ली अब प्रतीकात्मक कूटनीति पर भरोसा नहीं करती. इसके बजाय वह प्रौद्योगिकी तक पहुंच बनाने, ऊर्जा सुरक्षा पाने, निवेश प्रवाह सुनिश्चित करने और रणनीतिक प्रभावों में ठोस लाभ पाना चाहती है. बहुध्रुवीय होती दुनिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए भारत का यूं बढ़ना सुखद है.
यह लेख हिन्दुस्तान में प्रकाशित हो चुका है.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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