Author : Harsh V. Pant

Originally Published नवभारत टाइम्स Published on Jul 17, 2025 Commentaries 5 Hours ago
क्या एससीओ समिट में पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग की मुलाकात होगी, यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है, क्योंकि गलवान घाटी की घटना के बाद भारत-चीन संबंधों में आए तनाव को कम करने के लिए दोनों देशों ने संवाद जारी रखा है.
क्या SCO समिट में चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग से मिलेंगे पीएम मोदी?

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भारत - चीन संबंधों के लिहाज से 2020 में गलवान घाटी में जो कुछ हुआ, वह एक अहम मोड़ साबित हुआ. इसके बाद भारत ने चीन के प्रति कड़ा रुख अपनाया. उसने स्पष्ट कर दिया कि जब तक चीन सीमा क्षेत्र में शांति बहाल नहीं करता और अपनी फौज को पीछे नहीं हटाता- यानी बॉर्डर पर जो ‘यथास्थिति’ बदलने की कोशिश की गई थी, उसे पहले की तरह नहीं करता- तब तक द्विपक्षीय संबंध सामान्य नहीं हो सकते.

यह भारत की ओर से एक निर्णायक रुख था. जहां सैन्य स्तर पर चीन को सख्त जवाब दिया गया, वही कूटनीतिक स्तर पर यह फैसला लिया गया कि जब तक सीमा पर 2020 से पहले वाली स्थिति बहाल नहीं होती, तब तक रिश्ते सामान्य नहीं होंगे. इस रुख पर भारत डटा रहा. आखिरकार, जब चीन ने अपनी सेना को पीछे हटाया और बॉर्डर पर स्थिति को कुछ हद तक पूर्ववत किया, तब जाकर रिश्तों में थोड़ी नरमी आई.

चीन की स्वीकारोक्ति: अक्टूबर 2023 में भारत और चीन के बीच एक समझौता हुआ, जिसमें यह तय किया गया कि गलवान संघर्ष के बाद जो विवादित क्षेत्र बने थे, वहां से दोनों देशों की सेनाएं पीछे हटेंगी और ‘डी-एस्केलेशन’ की प्रक्रिया शुरू होगी. हालांकि सेनाएं अब भी सीमा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में तैनात हैं और ‘डिसएंगेजमेंट’ की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, लेकिन भारत ने जो पक्ष रखा, उसे चीन ने मान्यता दी. चीन यह स्वीकार करने को मजबूर हुआ कि उसने जो बदलाव लाने की कोशिश की थी, वह असफल रही और द्विपक्षीय संबंधों पर इसका नकारात्मक असर पड़ा.

अक्टूबर 2023 में भारत और चीन के बीच एक समझौता हुआ, जिसमें यह तय किया गया कि गलवान संघर्ष के बाद जो विवादित क्षेत्र बने थे, वहां से दोनों देशों की सेनाएं पीछे हटेंगी और ‘डी-एस्केलेशन’ की प्रक्रिया शुरू होगी. हालांकि सेनाएं अब भी सीमा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में तैनात हैं और ‘डिसएंगेजमेंट’ की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, 

चूंकि चीन ने अब कुछ हद तक अपना रुख बदला है, भारत ने भी संबंध सुधार की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू किए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पिछली मुलाकातों में यह बात सामने आई थी कि दोनों देशों को सीमा पर शांति बहाल कर संबंधों को आगे बढ़ाना चाहिए. यही विचार अब धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर की हालिया चीन यात्रा में उनकी मुलाकात चीनी समकक्ष वांग यी से हुई. उन्होंने शी जिनपिंग से भी भेंट की. यह इस ओर इशारा करता है कि जब प्रधानमंत्री मोदी आगामी SCO (शंघाई सहयोग संगठन) सम्मेलन के लिए चिंगदाओ जाएंगे, तो वहां उनकी शी जिनपिंग से एक और मुलाकात हो सकती है.

इस संदर्भ में अनिश्चितता की पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण है. विशेष रूप से अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने से जो वैश्विक अस्थिरता आई है, उसका असर जापान, ऑस्ट्रेलिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के अन्य पारंपरिक साझेदारों पर भी पड़ा है. इस लिहाज से भारत ने भी अपनी विदेश नीति को री-बैलेंस करने की जरूरत महसूस की है.

ऐसे में भारत-चीन संबंधों में सामान्यीकरण की प्रक्रिया को ‘कौशलपूर्ण प्रबंधन’ के रूप में देखा जाना चाहिए और इससे अधिक अपेक्षा नहीं करनी चाहिए. भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा और टकराव की बुनियादी प्रवृत्तियां अभी भी बरकरार हैं. चीन भले ही नए सिरे से रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन उसकी रणनीतिक प्राथमिकताएं यही हैं कि वह हिंद-प्रशांत में प्रमुख शक्ति बनकर उभरे और भारत को केवल दक्षिण एशिया तक सीमित रखे.

चीन भले ही नए सिरे से रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन उसकी रणनीतिक प्राथमिकताएं यही हैं कि वह हिंद-प्रशांत में प्रमुख शक्ति बनकर उभरे और भारत को केवल दक्षिण एशिया तक सीमित रखे.

गहराता तनाव: हाल के उदाहरण इस दृष्टिकोण को पुष्ट करते हैं. मसलन, SCO की रक्षा मंत्रियों की बैठक के बाद संयुक्त वक्तव्य में भारत की सुरक्षा चिंताओं, जैसे कि पुलवामा, का जिक्र नहीं किया गया था. भारत ने यह स्पष्ट किया कि यदि चीन और पाकिस्तान मिलकर आतंकवाद पर भारत के दृष्टिकोण की अनदेखी करेंगे, तो वह असहयोग का रुख अपना सकता है. इसी तरह, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन की पाकिस्तान को गुप्त जानकारी देने की कोशिशें, मिसइन्फॉर्मेशन कैंपेन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी प्रचार ने यह दिखा दिया कि भारत और चीन के संबंधों में तनाव गहरा है.

आसान नहीं रास्ता: भारत इस तनाव को नियंत्रित रखने की कोशिश करते हुए चाहेगा कि सेना की सहायता से डिफेंस पोजिशनिंग सुदृढ़ रखे और जहां सहयोग की संभावना हो, वहां साझेदारी को बढ़ाए. भारत और चीन ऐसे मुद्दों पर साथ काम कर सकते हैं जहां उनका दृष्टिकोण एक जैसा हो, लेकिन जहां मतभेद हों, वहां उन्हें विवेकपूर्ण ढंग से प्रबंधित किया जाए. चीन भारत के लिए सबसे बड़ी सामरिक चुनौती बना रहेगा और उसे संभालना भारत के लिए आसान नहीं होगा. फिर भी, इसकी कोशिश करनी होगी क्योंकि मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में यह अनिवार्य है कि भारत और चीन के बीच संवाद के चैनल खुले रहें.

गलवान संघर्ष के बाद भी भारत ने यह बात कही थी कि संवाद का माध्यम कभी बंद नहीं किया जाएगा. लेकिन भारत यह भी चाहता है कि चीन उसकी संवेदनाओं और हितों को समझे और उनके विरुद्ध काम न करे. आने वाला समय ही बताएगा कि भारत की यह कूटनीतिक पहल कितनी सफल होगी, लेकिन यह स्पष्ट है कि भारत अपनी रणनीति में संतुलन, दृढ़ता और चतुराई बनाए रखकर आगे बढ़ रहा है.


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