Originally Published फायनेंशियल एक्सप्रेस Published on Dec 17, 2025 Commentaries 14 Days ago

शंघाई हवाई अड्डे की घटना भारत–चीन संबंधों में छिपे तनाव को फिर सामने ले आई है. यह दिखाती है कि “सामान्यीकरण” की बातों के बावजूद चीन सीमा और संप्रभुता को दबाव के औज़ार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है.

भारत को लेकर चीन नहीं बदला, जानिए कैसे!

हाल ही में अरुणाचल प्रदेश की एक भारतीय महिला को चीन से होकर यात्रा करते समय शंघाई हवाई अड्डे पर 18 घंटे तक रोके जाने की घटना से विवाद खड़ा हो गया. चीनी अधिकारियों ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश चीन का हिस्सा है इसलिए उसका भारतीय पासपोर्ट मान्य नहीं है और उससे चीनी पासपोर्ट के लिए आवेदन करने को कहा गया. महिला ने बताया कि अक्टूबर 2024 में उसकी चीन यात्रा बिना किसी समस्या के हुई थी. इस पर भारत के विदेश मंत्रालय ने चीन के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया और साफ कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है तथा उसके नागरिक भारतीय पासपोर्ट पर यात्रा कर सकते हैं. सरकार ने चीनी पक्ष से आश्वासन माँगा कि भारतीय नागरिकों को निशाना नहीं बनाया जाएगा और लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी. चीन ने दोहराया कि वह अरुणाचल प्रदेश को मान्यता नहीं देता जिसे वह “दक्षिण तिब्बत” कहता है और इस रुख का चीन के राजदूत व पाकिस्तान ने भी समर्थन किया.

  • शंघाई हवाई अड्डे की घटना ने भारत–चीन तनाव उजागर किया
  • सामान्यीकरण के बावजूद चीन दबाव की नीति अपनाए हुए है
  • अरुणाचल की भारतीय महिला को शंघाई में 18 घंटे रोका गया

शंघाई में उस महिला के साथ हुआ दुर्व्यवहार भारत–चीन संबंधों में मौजूद गहरे मतभेदों को उजागर करता है. 2020 में चीन द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर यथास्थिति बदलने की कोशिश के बाद भारत ने स्पष्ट कर दिया कि अब संबंध पहले की तरह सामान्य नहीं रहेंगे. इसके चलते सांस्कृतिक, शैक्षणिक और व्यापारिक सहयोग प्रभावित हुआ और पत्रकारों के वीज़ा भी रद्द कर दिए गए. इसके जवाब में बीजिंग ने कहा कि सीमा विवाद को उसकी “उचित जगह” पर रखा जाना चाहिए यानी लोगों के बीच संपर्क को सीमा स्थिति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.

“चीनी अधिकारियों ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश चीन का हिस्सा है इसलिए उसका भारतीय पासपोर्ट मान्य नहीं है और उससे चीनी पासपोर्ट के लिए आवेदन करने को कहा गया।”

 

सामान्य रिश्तों की बहाली में रुकावट

अक्टूबर 2024 में रूस में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद भारत और चीन ने सतर्क तरीके से संबंध सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाए. एलएसी पर गश्त की व्यवस्था पर सहमति बनाकर चीन ने परोक्ष रूप से यह माना कि उसने सैन्य दबाव के ज़रिए ज़मीनी हालात बदलने की कोशिश की थी. इस समझौते से भारतीय सैनिकों की दोबारा गश्त शुरू हुई और चरागाहों तक पहुँच बहाल हुई. इसके बाद लोगों से जुड़े कदम उठाए गए जैसे कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली, वीज़ा नियमों में ढील, सीधी उड़ानों की शुरुआत और मीडिया व थिंक टैंकों के बीच आदान-प्रदान. इसी वर्ष दोनों देशों के राजनयिक संबंधों के 75 साल पूरे हो रहे थे और आपसी भरोसा बहाल करने पर ज़ोर था लेकिन एक घटना ने इन रिश्तों पर फिर से साया डाल दिया. इस बार चीन ने ही सीमा मुद्दे को प्रमुख बना दिया जबकि पहले वह इसे “उचित जगह” पर रखने की बात करता रहा था.

“भारत के विदेश मंत्रालय ने चीन के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया और साफ कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है।”

भारत में कुछ विश्लेषकों ने इस घटना के लिए चीन के ज़रूरत से ज़्यादा सख़्त इमिग्रेशन अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराते हुए इसे एक स्थानीय समस्या माना है लेकिन चीन के रुख में आए इस अचानक बदलाव के पीछे एक साफ़ पैटर्न दिखता है. जापान के प्रधानमंत्री साने ताकाइची द्वारा संसद में यह कहना कि ताइवान पर चीन का हमला उनके देश के लिए अस्तित्व का संकट होगा और ऐसे में जापान की आत्मरक्षा सेनाओं को हस्तक्षेप करना पड़ेगा,  इसके बाद बीजिंग और टोक्यो के बीच तनाव चरम पर पहुँच गया. चीन की आक्रामक ‘वुल्फ वॉरियर’ कूटनीति फिर सामने आई जहाँ एक चीनी राजनयिक ने धमकी भरे शब्दों का इस्तेमाल किया. इसके साथ ही चीनी नागरिकों को जापान न जाने की सलाह दी गई  और चीन ने जापानी समुद्री खाद्य पदार्थों के आयात पर फिर से प्रतिबंध लगा दिया.

“2020 में चीन द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर यथास्थिति बदलने की कोशिश के बाद भारत ने स्पष्ट कर दिया कि अब संबंध पहले की तरह सामान्य नहीं रहेंगे।”

बयानबाज़ी बढ़ने के बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बात कर टोक्यो और ताइपे को लेकर अपनी नाराज़गी जताई. बताया जाता है कि ट्रंप ने जापानी नेता ताकाइची से बीजिंग को ताइवान के मुद्दे पर उकसाने से बचने को कहा. ट्रंप का चीन के क़रीब जाना शायद व्यापार समझौते की चाह से जुड़ा है जिसके लिए उन्होंने “G2” जैसे विचार का संकेत भी दिया है. अमेरिका–चीन रिश्तों में नरमी की कोशिशों से चीन को यह लग सकता है कि क्षेत्र में अमेरिकी भूमिका घट रही है जिससे वह भारत और जापान जैसे पड़ोसियों के साथ क्षेत्रीय विवादों में अधिक आक्रामक रुख अपनाने के लिए प्रोत्साहित हुआ है.

“बीजिंग का हालिया रुख यह संकेत देता है कि आत्मविश्वास से भरा चीन अपनी रणनीतिक सोच को अपनी आर्थिक नीति से अलग रखने की कोई ज़रूरत नहीं समझता।”

शंघाई हवाई अड्डे की घटना के बाद पैदा हुआ तनाव ऐसे समय में सामने आया है, जब नई दिल्ली विदेशी निवेश नियमों में दी गई ढील की समीक्षा पर विचार कर रही है जिसे भारत से ज़मीनी सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश को नियंत्रित करने के लिए लाया गया था. क्षेत्रीय विवादों में चीन द्वारा आर्थिक दबाव के बढ़ते इस्तेमाल से भारत की आर्थिक साझेदारी की नीति पर असर पड़ना तय है. बीजिंग का हालिया रुख यह संकेत देता है कि आत्मविश्वास से भरा चीन अपनी रणनीतिक सोच को अपनी आर्थिक नीति से अलग रखने की कोई ज़रूरत नहीं समझता.

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