Author : Harsh V. Pant

Published on Apr 28, 2026 Commentaries 10 Days ago

ऑपरेशन सिंदूर को एक साल हो गया है. यह अब भारत की बदली रणनीतिक सोच का प्रतीक बन चुका है. ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे वैश्विक कारक अब भी अहम हैं. पढ़ें कैसे.

ऑपरेशन सिंदूर: एक साल, कई सवाल

Image Source: wikimedia

ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद, मई 2025 में भारत की प्रतिक्रिया अब किसी अचानक बदलाव के बजाय एक विकसित होती रणनीतिक सोच के आत्मविश्वासपूर्ण सुदृढ़ीकरण के रूप में दिखाई देती है. 26 नागरिकों की जान लेने वाले पहलगाम आतंकी हमले से प्रेरित होकर, नई दिल्ली की कार्रवाइयाँ केवल प्रतिक्रिया भर नहीं थीं; वे सोच-समझकर, संतुलित और इस संदेश के साथ की गई थीं कि भारत अब अपने हितों की रक्षा के लिए क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति-दोनों रखता है. पीछे मुड़कर देखने पर, सिंदूर एक ऐसा क्षण लगता है जहाँ इरादा और क्षमता असाधारण स्पष्टता के साथ एक साथ आए.

26 नागरिकों की जान लेने वाले पहलगाम आतंकी हमले से प्रेरित होकर, नई दिल्ली की कार्रवाइयाँ केवल प्रतिक्रिया भर नहीं थीं; वे सोच-समझकर, संतुलित और इस संदेश के साथ की गई थीं कि भारत अब अपने हितों की रक्षा के लिए क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति-दोनों रखता है.

संचालन स्तर पर, सबसे उल्लेखनीय पहलू भारत की सैन्य समन्वय क्षमता की परिपक्वता थी. जिस व्यवस्था की अक्सर अलग-अलग सेनाओं के बीच समन्वय की कमी के लिए आलोचना होती रही है, उसमें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के नेतृत्व में थल सेना, नौसेना और वायुसेना का सहज एकीकरण यह संकेत देता है कि भारत दबाव की स्थिति में जटिल, बहुआयामी अभियानों को संचालित करने में सक्षम है. इसके साथ ही स्वदेशी प्रणालियों का प्रभावी उपयोग यह दिखाता है कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास अब वास्तविक युद्धक्षेत्र लाभ में बदलने लगे हैं. इससे दीर्घकाल में ऐसी क्षमताओं को बनाए रखने को लेकर विश्वास और मजबूत हुआ है.

ऑपरेशन सिंदूर पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया  

भारत ने नियंत्रण रेखा से आगे जाकर पाकिस्तान के अंदर कार्रवाई करके यह दिखाया कि परमाणु डर (nuclear deterrence) उतना रोकने वाला नहीं है जितना पहले माना जाता था. यानी, सीमित और सोच-समझकर की गई सैन्य कार्रवाई संभव है. भारत ने दिखाया कि वह बिना हालात बिगाड़े दुश्मन पर दबाव बना सकता है, और नौसेना की तैनाती से उसकी ताकत और बढ़ी. कूटनीति में भी भारत का रुख साफ हुआ है-अब पाकिस्तान से बातचीत उसके व्यवहार पर निर्भर है, और प्रॉक्सी हिंसा की कीमत कई स्तरों पर चुकानी होगी.

सिंदूर पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया भारत के बाहरी रणनीतिक माहौल के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देती है. विशेष रूप से अमेरिका ने इस ऑपरेशन को दो देशों के बीच संघर्ष के बजाय आतंकवाद-रोधी कार्रवाई के रूप में देखने का संकेत दिया. लेकिन एक साल बाद यह स्पष्ट हो गया है कि यह ‘स्वीकृति’ स्थायी बदलाव नहीं, बल्कि शर्तों पर आधारित थी. वास्तव में, इस घटना ने भारत-अमेरिका संबंधों में मौजूद लेन-देन आधारित प्रवृत्ति को उजागर कर दिया है.

सिंदूर का उद्देश्य प्रतिरोध की एक नई अवधारणा स्थापित करना था, लेकिन इसकी व्याख्या अब भी विवादित है. क्या भारत ने एकतरफा रूप से लागत थोपने में सफलता पाई, या फिर तनाव में कमी बाहरी दबाव के तहत हुई? यह अस्पष्टता पाकिस्तान के हित में काम करती है. फिर भी, जहाँ रावलपिंडी ने अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव का लाभ उठाने की कोशिश की, वहीं सिंदूर के वास्तविक संचालन परिणामों ने प्रॉक्सी तत्वों पर उसकी निर्भरता की लागत को और स्पष्ट कर दिया.

वॉशिंगटन के लिए भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है, लेकिन जब बात पाकिस्तान से जुड़े संकटों की आती है, तो इस साझेदारी की सीमाएं स्पष्ट हो जाती हैं. यह बात उस विवाद में सामने आई, जिसमें डोनाल्ड ट्रम्प ने यह दावा किया कि युद्धविराम कराने में उनकी भूमिका थी. ये दावे सही हों या न हों, ऐसे बयान भारत की सावधानीपूर्वक तैयार की गई ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की कथा को जटिल बना देते हैं. नई दिल्ली लंबे समय से किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के सुझाव का विरोध करती रही है, खासकर कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर. यहाँ तक कि बाहरी हस्तक्षेप की धारणा भी उस संदेश को कमजोर कर सकती है, जो सिंदूर के जरिए देना चाहा गया था.

भारत पहले से ज्यादा मजबूत

पाकिस्तान के सैन्य भंडार में मौजूद चीनी मूल के हथियार प्रणालियों के प्रदर्शन ने स्वाभाविक रूप से ध्यान आकर्षित किया है, पाकिस्तान के लिए, इन दावों ने कुछ हद तक कूटनीतिक राहत प्रदान की. अमेरिका की संभावित भूमिका का संकेत, चाहे वह कितना ही कमजोर क्यों न हो, भारत के साथ विवादों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाने की उसकी लंबे समय से चली आ रही कोशिशों को मजबूती देता है. इस दृष्टि से, नैरेटिव की लड़ाई खुद ऑपरेशन जितनी ही महत्वपूर्ण साबित हुई है. सिंदूर का उद्देश्य प्रतिरोध की एक नई अवधारणा स्थापित करना था, लेकिन इसकी व्याख्या अब भी विवादित है. क्या भारत ने एकतरफा रूप से लागत थोपने में सफलता पाई, या फिर तनाव में कमी बाहरी दबाव के तहत हुई? यह अस्पष्टता पाकिस्तान के हित में काम करती है. फिर भी, जहाँ रावलपिंडी ने अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव का लाभ उठाने की कोशिश की, वहीं सिंदूर के वास्तविक संचालन परिणामों ने प्रॉक्सी तत्वों पर उसकी निर्भरता की लागत को और स्पष्ट कर दिया. द्विपक्षीय संबंधों में बढ़ती कठोरता केवल भारत के संकल्प को ही नहीं दर्शाती, बल्कि इस्लामाबाद में भी ‘इनकार योग्य आक्रामकता’ की गुंजाइश को लेकर अपेक्षाओं के पुनर्मूल्यांकन को दिखाती है.

चीन के नजरिए से ऑपरेशन सिंदूर दिखाता है कि भारत अब ज्यादा आत्मविश्वासी और सक्षम हो गया है. पाकिस्तान के चीनी हथियारों की चर्चा हुई, लेकिन ज्यादा अहम यह रहा कि भारत ने अलग-अलग क्षेत्रों में कार्रवाई करने की क्षमता दिखाई. बीजिंग के लिए भारत अब सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं, बल्कि एक मजबूत और बहुआयामी शक्ति बनकर उभर रहा है. एक साल बाद साफ है कि भारत संतुलित और सोच-समझकर ताकत का इस्तेमाल कर रहा है, जिससे उसकी सुरक्षा और लचीलापन दोनों मजबूत हुए हैं.


यह लेख मूल रूप से टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित हुआ था. 
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