जहां अमेरिका की बढ़ती टैरिफ दरों ने ‘मेक इन इंडिया’ उत्पादों के निर्यात को मुश्किल बना दिया था, अब अचानक अमेरिका ने इन पर शुल्क घटाकर 18% करने की घोषणा की! जानिए इस नए भारत-अमेरिका समझौते की पूरी कहानी.
2 फ़रवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप ने X पर लिखा: “प्रधानमंत्री मोदी के प्रति मित्रता और सम्मान के तहत और उनके अनुरोध पर, हमने तुरंत प्रभाव से एक व्यापार समझौते पर सहमति जताई है.” कुछ ही देर बाद प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा: “यह जानकर खुशी हुई कि ‘मेक इन इंडिया’ उत्पादों पर शुल्क घटाकर 18% कर दिया गया है.” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे भारत-अमेरिका साझेदारी को “अभूतपूर्व ऊँचाइयों” तक ले जाने के लिए मिलकर काम करने को उत्सुक हैं. यदि रूस से तेल आयात पर दंडात्मक शुल्क को जोड़ दिया जाए तो टैरिफ 50% से घटकर 18% होना कम से कम कुछ राहत का संकेत है. अपेक्षा के अनुरूप भारतीय बाज़ारों ने इन घोषणाओं का सकारात्मक स्वागत किया.
व्यापार समझौते के विवरण अभी धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं. फिलहाल अमेरिका और अन्य देशों को निर्यात करने वाले भारतीय क्षेत्रों को कुछ राहत मिल सकती है. भारत के कृषि क्षेत्र को मिलने वाली बाज़ार पहुँच पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है.
समग्र रूप से देखें तो बारीकियाँ महत्वपूर्ण होने के बावजूद, यह सामान्यतः अच्छी खबर है. भारत और अमेरिका के बीच दांव पर बहुत कुछ लगा है. यह भी महत्वपूर्ण है कि दोनों शीर्ष नेता संवाद कर रहे हैं और समझौते को लेकर एक-दूसरे की बातों का स्वागत कर रहे हैं- यह इस महत्वपूर्ण रिश्ते के भविष्य के लिए और भी बेहतर संकेत है. इसमें संदेह नहीं कि भारतीय नेतृत्व और वार्ताकारों के धैर्यपूर्ण प्रयासों के साथ-साथ दोनों देशों के राजदूतों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
ट्रंप ने X पर लिखा: “प्रधानमंत्री मोदी के प्रति मित्रता और सम्मान के तहत और उनके अनुरोध पर, हमने तुरंत प्रभाव से एक व्यापार समझौते पर सहमति जताई है.” कुछ ही देर बाद प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा: “यह जानकर खुशी हुई कि ‘मेक इन इंडिया’ उत्पादों पर शुल्क घटाकर 18% कर दिया गया है.” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे भारत-अमेरिका साझेदारी को “अभूतपूर्व ऊँचाइयों” तक ले जाने के लिए मिलकर काम करने को उत्सुक हैं.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि एक “रणनीतिक रीसेट” की प्रक्रिया चल रही है. रिपोर्टों के अनुसार, “Pax Silica” के प्रति भारत के दृष्टिकोण को परिभाषित करने वाले संयुक्त बयान पर बातचीत पूरी हो चुकी है. अमेरिकी विदेश विभाग के अवर सचिव जैकब हेलबर्ग द्वारा आगे बढ़ाई गई इस पहल का उद्देश्य “विश्वसनीय साझेदारों” के बीच उन्नत तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों के लिए सुरक्षित और लचीली आपूर्ति शृंखलाएँ बनाना है.
यह कोई संधि नहीं है और न ही ऐसा घोषणा-पत्र जिसे सभी देश हस्ताक्षर करें बल्कि यह एक ऐसा ढाँचा है जिसके अंतर्गत अमेरिका और अलग-अलग देशों के बीच विशेष समझौते किए जाते हैं. हर समझौता अलग होगा. वर्तमान स्थिति में भारत के फरवरी के दौरान औपचारिक रूप से इसमें शामिल होने की संभावना है. इस पर कई महीनों से वार्ताएँ चल रही थीं.
फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री मोदी की वॉशिंगटन यात्रा के बाद से बीते एक वर्ष में यह स्पष्ट हो गया है कि भारत-अमेरिका संबंधों की ज़मीन बदल चुकी है. अतीत की ओर कोई “रीसेट” नहीं होगा. जो हम देख रहे हैं, वह भविष्य की नई रूपरेखा है.
पहला, अब भारत में कोई भी अमेरिका को हल्के में नहीं लेगा. कुछ महीने पहले संबंधों में आई गंभीर रुकावट भारतीय नेतृत्व और वार्ताकारों की स्मृति में लंबे समय तक रहेगी. इसका मतलब यह नहीं कि रणनीतिक विश्वास पूरी तरह टूट गया है-ऐसा नहीं है. आज यह रिश्ता सरकारी दायरे से कहीं बड़ी शक्तियों और समुदायों से संचालित हो रहा है. उदाहरण के तौर पर, रूस से तेल आयात पर 25% अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क और शीर्ष नेतृत्व के बीच वार्ताओं के लगभग ठहर जाने के बावजूद, अमेरिका से भारत में तकनीकी निवेश तेज़ी से बढ़ा.
अमेरिकी टेक उद्योग के दिग्गज विचलित तो हुए, पर पीछे नहीं हटे. उन्होंने भारत में बहु-अरब डॉलर निवेश की प्रतिबद्धताएँ जारी रखीं. नई दिल्ली में 16-20 फरवरी के बीच होने वाले AI इम्पैक्ट समिट के लिए कई घोषणाएँ तय हैं, जिनमें से कई पहले ही हो चुकी हैं और उनका कुल मूल्य 50 अरब डॉलर से अधिक है.
यूरोपीय संघ (EU) के साथ मुक्त व्यापार समझौता केवल बाज़ार पहुँच और आर्थिक विकास ही नहीं, बल्कि भारत के बदलते भू-राजनीतिक संतुलन का भी संकेत है. EU, UK और जर्मनी-फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों के साथ गहरे संबंध बनाना कोई हेजिंग नहीं, बल्कि भारत की नई रणनीतिक प्राथमिकताओं का हिस्सा है.
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (IMEC) पर चर्चा से लेकर रक्षा संबंधों को मजबूत करने तक-कामकाज जारी रहने के संकेत स्पष्ट दिखे. यह भी उल्लेखनीय है कि जब अमेरिकी प्रवक्ता सार्वजनिक रूप से भारत की आलोचना कर रहे थे, उसी समय अमेरिकी कंपनियों के CEO बड़ी संख्या में भारत आ रहे थे. यह दोहरी प्रवृत्ति असामान्य है. वर्षों के निवेश ने इस रिश्ते में ऐसी मजबूती पैदा कर दी है जो सरकारी प्रक्रियाओं से परे भी मौजूद है. प्रशासकों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच कार्यात्मक संबंध भी जारी रहे-बैठकें रद्द नहीं हुईं, वर्चुअल वार्ताएँ बंद नहीं हुईं.
फिर भी यह स्पष्ट है कि राजनीतिक स्तर की असहजता को समय रहते संभाल लिया गया. व्यापार से जुड़ी घोषणाएँ भी सही समय पर हुईं-AI इम्पैक्ट समिट से ठीक पहले, जिसमें जेन्सेन हुआंग, सैम ऑल्टमैन, डारियो अमोदेई सहित व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारी नई दिल्ली आने वाले हैं. सैकड़ों अमेरिकी निवेशक, CEO और तकनीकी विशेषज्ञ इसमें भाग लेंगे.
दूसरा, पिछले वर्ष अमेरिका की सक्रियता के परिणामस्वरूप भारत की रणनीतिक विविधीकरण की नीति को वास्तविक गति मिली है. यूरोपीय संघ (EU) के साथ मुक्त व्यापार समझौता केवल बाज़ार पहुँच और आर्थिक विकास ही नहीं, बल्कि भारत के बदलते भू-राजनीतिक संतुलन का भी संकेत है. EU, UK और जर्मनी-फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों के साथ गहरे संबंध बनाना कोई हेजिंग नहीं, बल्कि भारत की नई रणनीतिक प्राथमिकताओं का हिस्सा है. जैसा कि जर्मन अधिकारी कहते हैं-“अब साथ मिलकर काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं.”
EU और UK के साथ कई प्रयास पहले से चल रहे थे, लेकिन अमेरिका के साथ हालिया अनुभव ने विडंबना यह अवसर दिया कि यूरोप के साथ परिणाम-आधारित दृष्टिकोण को और तेज़ किया जाए. अंततः, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की घोषणा निस्संदेह अच्छी खबर है. लेकिन भविष्य अतीत जैसा नहीं होगा. यह कोई रीसेट नहीं है, न ही केवल सावधानी की परत चढ़ाने की बात है. यह दृढ़ रणनीतिक विविधीकरण की नई बनावट तैयार करने का समय है-जिसमें अमेरिका महत्वपूर्ण है, पर पूरी तस्वीर का केवल एक हिस्सा.
यह लेख मूल रूप से हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुआ था.
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Rudra Chaudhuri is a Vice President. His research and policy work focuses on the important role of technology and innovation in diplomacy, statecraft, development and ...
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