Author : Harsh V. Pant

Published on Apr 29, 2026 Commentaries 1 Days ago

अमेरिका-ईरान संघर्ष ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल सैन्य ताकत होने से राजनीतिक सफलता सुनिश्चित नहीं होती. इतिहास बार-बार यह बताता है कि शक्तिशाली सेनाएं भी हमेशा बेहतर राजनीतिक परिणाम नहीं ला पातीं. विशेष रूप से वैचारिक रूप से मजबूत शासन-व्यवस्थाएं केवल बाहरी दबाव या सैन्य हमलों से आसानी से नहीं टूटतीं. 

न शांति, न युद्ध: ईरान-अमेरिका गतिरोध की कठिन घड़ी

अमेरिका-ईरान युद्ध से अंतरराष्ट्रीय राजनीति की यह सच्चाई एक बार फिर उजागर हो गई है कि सैन्य श्रेष्ठता जरूरी नहीं कि हमेशा राजनीतिक रूप से श्रेष्ठ परिणाम ही दे. इतिहास अक्सर हमें याद दिलाता है कि शासन, विशेषकर वैचारिक रूप से मजबूत शासन-व्यवस्थाएं आसानी से ध्वस्त नहीं हुआ करती हैं.  

मार्च के अंत तक ईरान-अमेरिका युद्ध जटिल चरण में प्रवेश कर गया था. अप्रैल की शुरुआत में पाकिस्तान ने मध्यस्थता की पहल की और युद्ध-विराम घोषित हुआ, मगर यह अस्थायी युद्ध-विराम जैसा प्रतीत हुआ. अप्रैल के अंत तक स्थिति तनावपूर्ण गतिरोध में तब्दील हो गई. अब बड़े पैमाने पर हमले भले रुक गए हैं, लेकिन अमेरिका द्वारा समुद्र में और ईरान द्वारा होर्मुज जलमार्ग पर लगाई गई नाकाबंदी से यहां आर्थिक युद्ध जारी है. वास्तव में, यह कोई शांति नहीं है, बल्कि संघर्ष का एक नया स्वरूप है.  

ईरान की  रणनीति

ईरान हालांकि नरम पड़ा है, फिर भी टिका हुआ है. उसकी सैन्य क्षमताएं, विशेषकर ड्रोन व मिसाइलें कम तो हुई हैं, लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं हुई हैं. ईरान ने पारंपरागत रणनीति से हटकर आर्थिक और मनोवैज्ञानिक क्षति पहुंचाने की रणनीति अपनाई है और इसमें वह बीस साबित हो रहा है. अमेरिका-इजरायल को ईरान के बुनियादी ढांचों के ध्वंस या कमांडरों के खात्मे में जो सामरिक सफलताएं मिलीं, उनसे कोई निर्णायक नतीजा मिलता नहीं दिखा.  

अप्रैल की शुरुआत में पाकिस्तान ने मध्यस्थता की पहल की और युद्ध-विराम घोषित हुआ, मगर यह अस्थायी युद्ध-विराम जैसा प्रतीत हुआ. अप्रैल के अंत तक स्थिति तनावपूर्ण गतिरोध में तब्दील हो गई. अब बड़े पैमाने पर हमले भले रुक गए हैं, लेकिन अमेरिका द्वारा समुद्र में और ईरान द्वारा होर्मुज जलमार्ग पर लगाई गई नाकाबंदी से यहां आर्थिक युद्ध जारी है.

कमजोर स्थिति में होते हुए भी ईरान ने जबरदस्त रणनीतिक सूझ-बूझ दिखाई है. उसकी मिसाइलों और ड्रोनो को भले ही अमेरिकी-इजरायली प्रक्षेपास्त्रों ने गिरा दिया, फिर भी गैर-पारंपरागत युद्ध रणनीति के कारण ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों ने इनके ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया है. होर्मुज का इस्तेमाल करके ईरान ने यह भी साबित कर दिया है कि भू-राजनीति में भूगोल का महत्व हमेशा बना रहता है.  

हालांकि, तेहरान की रणनीति की अपनी सीमाएं हैं. उसके सैन्य संसाधन लगातार कम हो रहे हैं, उसकी अर्थव्यवस्था भारी दबाव में है और उसका सामाजिक आधार पाबंदियों के कारण कमजोर हुआ है. कुल मिलाकर, यह धैर्य की परीक्षा लेने वाली और बेचैन करने वाली लड़ाई बन गई है. अमेरिका के पास पारंपरिक सैन्य शक्ति अपार है, पर ईरान की गैर-पारंपरागत रणनीतियों, प्रौद्योगिकियों, विधियों और रणनीतिक ‘भूगोल’ ने उनके विजय रथ को रोक दिया है. यह ऐसी लड़ाई बन गई है, जिससे बाहर निकलना दोनों पक्षों के लिए मुश्किल हो सकता है. कूटनीतिक गतिरोध इसी सच्चाई का नतीजा है. इस्लामाबाद में बातचीत की नाकामी, दोनों पक्षों के बीच गहरे अविश्वास व उनकी जिद को उजागर करती है. वाशिंगटन की ज्यादा से ज्यादा मांगें और तेहरान का अपनी संप्रभुता पर अड़े रहना बातचीत को फिलहाल असंभव बना रहे हैं.  

इस युद्ध में नतीजों की आस कम और कभी न खत्म होने वाली जटिलता ज्यादा दिख रही है. यहां शांति, भूगोल, तकनीक और राजनीति आपस में इतने जुड़े हुए हैं कि जल्द समाधान निकलना लगभग नामुमकिन है.  

संघर्ष और शांति के बीच का दौर

इसके अलावा, दोनों पक्षों के लिए इस युद्ध के घरेलू राजनीतिक निहितार्थ भी हैं. लंबा संघर्ष अमेरिका के चुनावी नतीजों पर असर डालेगा, तो किसी भी तरह की हार या समर्पण से ईरान में फूट पड़ने का खतरा है. बाहरी ताकतें, चाहे वह पाकिस्तान हो, चीन हो या रूस, बातचीत में मदद तो कर सकती हैं, लेकिन कोई निर्णय थोप नहीं सकतीं. यहां न तो पूरी तरह शांति है और न युद्ध. यह एक ऐसा दौर है, जहां कभी भी संघर्ष-विराम टूट सकता है, आर्थिक दबाव बढ़ सकता है और कभी भी तनाव बढ़ सकता है. कई मायनों में यह ऐसा खतरनाक दौर है, जहां एक छोटी सी भी चूक संयम को पल भर में खत्म कर सकती है.  

फिर भी, एक टिकाऊ समाधान के लिए दोनों पक्षों को अपनी-अपनी सीमाओं को स्वीकार करना होगा. इसमें शायद होर्मुज जलडमरूमध्य में सोच-समझकर तनाव कम करना और परमाणु मुद्दे पर चरणबद्ध भरोसे का बढ़ना शामिल हो सकता है. मौजूदा हालात में कोई भी पक्ष बिना कुछ अतिरिक्त हासिल किए पहला कदम उठाने को तैयार नहीं है. इसलिए, इस युद्ध में नतीजों की आस कम और कभी न खत्म होने वाली जटिलता ज्यादा दिख रही है. यहां शांति, भूगोल, तकनीक और राजनीति आपस में इतने जुड़े हुए हैं कि जल्द समाधान निकलना लगभग नामुमकिन है.  


यह लेख मूल रूप से हिंदुस्तान में प्रकाशित हो चुका है.
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