Author : Harsh V. Pant

Published on Mar 27, 2026 Commentaries 3 Days ago

इस समय जारी अमेरिका-ईरान जंग और रूस-यूक्रेन युद्ध आधुनिक युद्धों के बदलते चरित्र की झलक देते हैं. एक का लंबा और थका देने वाला घमासान धैर्य की परीक्षा लेने वाला है, तो दूसरे में तेज और कई तरह के दबावों का खुला प्रदर्शन दिख रहा है.. 

नई तकनीक, नई चुनौती: युद्ध का बदलता स्वरूप


बै‍लिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन काफिलों और असली पहचान छिपाकर प्रॉक्सी नेटवर्क के जरिए अलग-अलग तरीके से प्रहार करने की ईरान की क्षमता ने गोपनीय रणनीति की अहमियत को उजागर किया. ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे समुद्री मार्ग को बाधित करने से युद्ध के आर्थिक पहलू पर गंभीर असर पड़ा. ऊर्जा बाजार में इससे बेचैनी फैल गई है और पश्चिम एशिया की इस अस्थिरता के अब पूरी दुनिया में व्याप्त हो जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है.

इन दोनों युद्धों में जो समान बात है, वह यह कि आधुनिक युद्ध निरंतरता के साथ लंबे समय तक जारी रह सकते हैं. रूस और अमेरिका, दोनों ने अपने युद्ध अभियानों को अपनी सर्वश्रेष्ठता के अहंकार भाव के साथ शुरू किया, जिसमें माना गया था कि उनकी जीत तय है, लेकिन इन दोनों का सामना ऐसे दुश्मन से हुआ, जो अलग-अलग पहलुओं का फायदा उठाने, नई तकनीक के प्रयोग और जंग को सैन्य, सूचना-तंत्र और अर्थ-तंत्र तक विस्तार देने में माहिर हैं. नतीजा सामने है, जीत किसी की नहीं हो पा रही है. इसमें पारंपरिक अर्थ वाली जीत किसी को नहीं मिल पा रही है, बल्कि यह युद्ध निर्णायक लड़ाई कम और अनिश्चित हालात में लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष का प्रबंधन ज्यादा बन गया है.

युद्ध में तकनीक का उपयोग  

रणनीतिक तौर पर देखें, तो इस युद्ध का संदेश साफ है, दुश्मन अगर मुकाबले का हो, तो वह न तो जल्दी खत्म होने वाला है और न ही निर्णायक होगा. गठबंधन, आर्थिक मजबूती और युद्ध-विस्तार का प्रबंधन अब मैदान की जीत जितने ही जरूरी हो गए हैं. यूक्रेन की जंग में टिके रहने की क्षमता पश्चिमी देशों के समर्थन से जुड़ी है, ठीक वैसे ही जैसे ईरान के खिलाफ अमेरिकी हमले का प्रभाव पश्चिम एशिया के सहयोगी देशों से गहरे तालमेल पर निर्भर रहा है.

रूस और अमेरिका, दोनों ने अपने युद्ध अभियानों को अपनी सर्वश्रेष्ठता के अहंकार भाव के साथ शुरू किया, जिसमें माना गया था कि उनकी जीत तय है, लेकिन इन दोनों का सामना ऐसे दुश्मन से हुआ, जो अलग-अलग पहलुओं का फायदा उठाने, नई तकनीक के प्रयोग और जंग को सैन्य, सूचना-तंत्र और अर्थ-तंत्र तक विस्तार देने में माहिर हैं.

इसके उलट, अलग-थलग रहना आपके विकल्प सीमित करता है और आपको कमजोर बनाता है. सूचनाओं की भूमिका, चाहे साइबर ऑपरेशन हो या वैश्विक मीडिया के जरिए नैरेटिव गढ़ना हो, अब हाशिये से केंद्र में आ गई है, जिससे युद्ध की घरेलू वैधता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग, दोनों पर असर पड़ रहा है. यूक्रेन ने साबित किया है कि कैसे हवाई दबदबे को तोड़कर किसी मजबूत दुश्मन को कमजोर किया जा सकता है, जबकि ईरान ने यह दिखाया है कि अगर साइबर व अंतरिक्ष क्षमताओं का असरदार तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो हालात को बहुत जल्दी नियंत्रित किया जा सकता है.

सामरिक दृष्टि से देखें, तो मारक क्षमता का विकेंद्रीकरण शायद सबसे ज्यादा असरदार साबित हुआ है. सस्ते ड्रोन और स्वचालित हथियारों ने लड़ाई के खर्च का हिसाब-किताब बदल दिया है. इससे छोटे युद्धक तंत्र अति-विकसित फौजों पर भारी पड़ रहे हैं. लड़ाई में बने रहना इस बात पर निर्भर करने लगा है कि आपमें गतिशीलता, विस्तार और तेजी से अनुकूलित होने की क्षमता कितनी है? परंपरागत तरीके में टैंक, लड़ाकू विमानों और स्थायी युद्धक ढांचे के नजर में आने और निशाना बनने के जोखिम लेकर काम करना होगा. ऐसे में, सफलता के लिए न सिर्फ तकनीकी परिष्कार, बल्कि संगठनात्मक स्तर पर तेजी से अनुकूलित होने की क्षमता भी जरूरी है, जिससे निचले स्तर के कमांडरों को तत्काल फैसले लेने में मदद मिले.

सैन्य शक्ति अब भी जरूरी बनी हुई है, लेकिन यह अब अकेले निर्णायक नहीं रह गई है. तकनीक, आर्थिक और राजनयिक अंतर्संबंधों से लड़ाइयों को जीतना और खत्म करना, दोनों ही मुश्किल हो जाएंगे. नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती होगी कि वे लक्ष्य को दक्षता के साथ हासिल करने, जल्दी जीत के लालच से बचने और लंबे समय के लिए तैयारी करने पर ध्यान दें.

युद्ध का बदलता स्वरूप

कुल मिलाकर, भविष्य की जंगों के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है. सैन्य शक्ति अब भी जरूरी बनी हुई है, लेकिन यह अब अकेले निर्णायक नहीं रह गई है. तकनीक, आर्थिक और राजनयिक अंतर्संबंधों से लड़ाइयों को जीतना और खत्म करना, दोनों ही मुश्किल हो जाएंगे. नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती होगी कि वे लक्ष्य को दक्षता के साथ हासिल करने, जल्दी जीत के लालच से बचने और लंबे समय के लिए तैयारी करने पर ध्यान दें.

इन जंगों से एक बात तो पक्की हो गई है कि आधुनिक युद्धों में नतीजे आकार या शुरुआती बढ़त से नहीं, बल्कि तेजी से बदलते युद्धक्षेत्र में सीखने, अनुकूलित होने और टिके रहने की क्षमता से तय होते हैं. आधुनिक युद्धों में सिर्फ दबदबा नहीं, बल्कि तेजी से अनुकूल बनना सफलता की असली कसौटी बन गया है.


यह लेख हिंदुस्तान में प्रकाशित हो चुका है. 

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