Author : Harsh V. Pant

Published on Feb 27, 2026 Commentaries 4 Days ago

तेजी से बदलती वैश्विक भू-राजनीति के इस दौर में भारत और इजरायल का रिश्ता कितना परिपक्व हुआ है, यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तेल अवीव दौर से पता चलता है. अमेरिका-ईरान में बढ़ते तनाव और गाजा संघर्ष की छाया में. 

भारत–इज़रायल सहयोग का नया अध्याय

तेजी से बदलती वैश्विक भू-राजनीति के इस दौर में भारत और इजरायल का रिश्ता कितना परिपक्व हुआ है, यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तेल अवीव दौरे से पता चलता है. अमेरिका-ईरान में बढ़ते तनाव और गाजा संघर्ष की छाया में 25-26 फरवरी को प्रधानमंत्री मोदी इजरायल में थे. वहां न सिर्फ बेंजामिन नेतन्याहू के साथ उनके निजी रिश्ते की झलक मिली, बल्कि रणनीतिक नजरिये से द्विपक्षीय रिश्ते की अहमियत भी अधिक पुष्ट हुई.

गुरुवार को जारी साझा बयान में इजरायल से रक्षा, एआई, कृषि सहित कई क्षेत्रों में समझौते की घोषणा की गई. प्रधानमंत्री मोदी ने इजरायल के साथ “विशेष रणनीतिक रिश्ते” की बात भी कही. वास्तव में, 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करने के बाद से दोनों देशों ने सुरक्षा हितों और आर्थिक तालमेल बढ़ाने पर खूब काम किया है. इससे मध्य-पूर्व में व्यापक संतुलन साधने में नई दिल्ली की मुश्किलें कुछ हद तक दूर हुई हैं. देखा जाए, तो दोनों देशों का यह रिश्ता सिर्फ द्विपक्षीय नहीं रहा, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व को प्रभावित करता है. भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा और भारत-इजरायल-यूएई-अमेरिका (आई2यू2) को देखते हुए यह समझ में भी आता है.

प्रधानमंत्री की इजरायल यात्रा

साल 2017 के बाद प्रधानमंत्री मोदी की यह दूसरी इजरायल यात्रा थी. अस्थिर क्षेत्रीय परिवेश के बीच आपसी रिश्तों को मजबूत करना इस यात्रा का बड़ा मकसद था. बेन गुरियन हवाई अड्डे पर भारतीय प्रधानमंत्री को लेने खुद नेतन्याहू पहुंचे, जो रणनीतिक रिश्ते में निहित निजी संबंध का संकेत था. ऐसी दोस्ती का बड़ा फायदा यह होता है कि इससे गठबंधन सिर्फ रणनीतिक नहीं रह जाता, बल्कि मानवीय बनता है. नेतन्याहू ने मोदी को “बड़ा भाई” भी बताया.

धानमंत्री मोदी ने इजरायल के साथ “विशेष रणनीतिक रिश्ते” की बात भी कही. वास्तव में, 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करने के बाद से दोनों देशों ने सुरक्षा हितों और आर्थिक तालमेल बढ़ाने पर खूब काम किया है. इससे मध्य-पूर्व में व्यापक संतुलन साधने में नई दिल्ली की मुश्किलें कुछ हद तक दूर हुई हैं.

येरुशलम के किंग डेविड होटल में दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत और प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता हुई, जिसमें मुख्य जोर सुरक्षा और आर्थिक रिश्तों को बेहतर बनाने पर रहा. मुक्त व्यापार समझौते के लिए लंबित कामों को पूरा करने पर भी सहमति बनी. इसमें यह सब यूं ही नहीं हुआ है. इतिहास बताता है कि इजरायल ने हमेशा खुद को भारत का एक विश्वसनीय भागीदार साबित किया है. उसने जरूरत के समय महत्वपूर्ण रक्षा तकनीक की हमें आपूर्ति की है, जैसे 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान.

इस दौरे की एक ऐतिहासिक घटना रही, भारतीय प्रधानमंत्री का इजरायली संसद को संबोधित करना. इस मौके पर उन्हें ‘स्पीकर ऑफ द नेसेट मेडल’ से भी सम्मानित किया गया, जो इस सदन का सर्वोच्च सम्मान है. यहां मोदी का हमास हमलों के संदर्भ में यह कहना कि “इजरायल के साथ भारत खड़ा है”, उल्लेखनीय था, क्योंकि यह सीमा पार आतंकवाद, खासतौर से पाकिस्तानी जमीन पर पलने वाले संगठनों से भारत को होने वाले नुकसान से समानता रखता है. हालांकि, इसमें प्रधानमंत्री ने फलस्तीन मसले के संदर्भ में गाजा शांति योजना का भी समर्थन किया, जिससे भारतीय कूटनीति की गहराई सामने आती है. यह रुख अरब देशों का भरोसा बनाए रखने के साथ-साथ इजरायल के साथ हमारे रिश्ते को और गहरा बनाएगा.

राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग के साथ मुलाकात और याद वाशेम स्मारक के दौरे सहित अन्य बैठकों में मौजूदा खतरों के खिलाफ समन्वय बढ़ाने की वकालत की गई. कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा, जल संसाधन और कृषि में इजरायल ने खासी तरक्की की है, जिसको प्रदर्शित करने वाली नवाचार प्रदर्शनी ने संभावित सहयोग के रास्ते दिखाए. प्रधानमंत्री मोदी ने इजरायली कंपनियों से भारत में निवेश करने को कहा और कई समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर भी हुए. इनमें इजरायली आयरन डोम को भारत की सुदर्शन चक्र वायु रक्षा प्रणाली से जोड़ने को लेकर किया गया एमओयू उल्लेखनीय है. इन सबसे यह संकेत मिलता है कि अब गोपनीय रक्षा समझौतों तक ही दोनों देशों का रिश्ता सिमटा हुआ नहीं है, बल्कि यह अब बहुआयामी हो चुका है, जिसे इजरायली तकनीकी दक्षता और भारत के विशाल बाजार से नई ऊर्जा मिल रही है.

तकनीक और रक्षा क्षेत्र में साझेदारी

इस साझेदारी के मूल में कई कारक हैं, जिनमें पहला है— रक्षा और सुरक्षा सहयोग. यह 1992 से ही द्विपक्षीय संबंध की बुनियाद रहा है. 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से इजरायल भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है और रक्षा खरीद 66.2 करोड़ डॉलर से अधिक की हो चुकी है. सुदर्शन चक्र-आयरन डोम जैसी संयुक्त परियोजनाएं पाकिस्तान व चीन के बरअक्स भारत को नई ताकत देंगी.

प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा रक्षा, प्रौद्योगिकी और आतंकवाद-विरोधी क्षेत्रों में साथ-साथ आगे बढ़ते हुए मध्य-पूर्व की प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों से निपटने में सहायक साबित होगी. इससे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता मजबूत हुई है. तेजी से बहुध्रुवीय हो रहे विश्व में, दोनों देशों के लिए ऐसी साझेदारियां अनिवार्य हैं.

भारत और इजरायल, दोनों को अपने पड़ोसी देशों के “नॉन स्टेट एक्टर्स” से जूझना पड़ता है. इसीलिए, खुफिया जानकारियां साझा करने और आतंकवाद-विरोधी समन्वय बढ़ाने की जरूरत भी समझी गई. हालांकि, इसमें कुछ चुनौतियां भी हैं. मसलन, ईरानी तेल पर भारत की निर्भरता और चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए नई दिल्ली को इस कदर संतुलन साधना पड़ेगा कि तेहरान भी नाराज न हो और येरुशलम से संबंध भी आगे बढ़े.

प्रौद्योगिकी और नवाचार दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहां इजरायल की ‘स्टार्ट-अप राष्ट्र’ की छवि भारत की डिजिटल महत्वाकांक्षा को नया रूप दे सकती है. एआई, साइबर सुरक्षा और क्वांटम कंप्यूटिंग में सहयोग दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को लाभ पहुंचाएगा. 2022-23 में द्विपक्षीय व्यापार (रक्षा को छोड़कर) 10.77 अरब डॉलर था, जो मूलतः हीरा, रसायन और मशीनरी के कारोबार पर टिका था. इस आंकड़े को दोगुना करने का लक्ष्य है. फिलहाल, निवेश दोनों तरफ से होता है. इतना ही नहीं, इजरायल की ड्रिप सिंचाई और विलवणीकरण में विशेषज्ञता भारत की खाद्य सुरक्षा चुनौतियों से पार पाने में सहायक साबित हो रही हैं. भारत की बढ़ती उत्पादकता इसका सुबूत है.

क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर समान सोच इस साझेदारी को आगे बढ़ा रही है. भारत को जहां पाकिस्तान और चीन से तनाव झेलना पड़ता है, वहीं इजरायल को ईरान व उसके सहयोगी देशों से. हालांकि, भारत का रुख संतुलित है. फिलिस्तीनियों के प्रति सहानुभूति रखते हुए इजरायल के प्रति व्यावहारिक नजरिया अपनाया गया है. प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा रक्षा, प्रौद्योगिकी और आतंकवाद-विरोधी क्षेत्रों में साथ-साथ आगे बढ़ते हुए मध्य-पूर्व की प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों से निपटने में सहायक साबित होगी. इससे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता मजबूत हुई है. तेजी से बहुध्रुवीय हो रहे विश्व में, दोनों देशों के लिए ऐसी साझेदारियां अनिवार्य हैं.


यह लेख हिन्दुस्तान में प्रकाशित हो चुका है. 

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