Author : Kabir Taneja

Published on Feb 24, 2026 Commentaries 2 Days ago
हाल ही में दिल्ली में हुई भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक ने दिखाया कि दोनों क्षेत्र अपनी ताकत और फैसले खुद लेने की क्षमता बढ़ा रहे हैं. अगर यह रुख जारी रहा तो आने वाले समय में भारत और मध्य-पूर्व नई वैश्विक व्यवस्था के अहम खिलाड़ी बन सकते हैं.
भारत और मध्य-पूर्वः खेल बदल रहा है

31 जनवरी 2026 को दिल्ली में भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक (आईएएफएमएम) की दूसरी बैठक हुई. इस तरह की पहली बैठक 2016 में बहरीन के मनामा में हुई थी, तब दुनिया भू-राजनीतिक तौर पर इतनी अस्थिर नहीं थी. क्षेत्रीय संघर्ष और वैश्विक प्रतिद्वंद्विता दोनों एक व्यापक वैश्विक बहुपक्षीय संरचना के दायरे में बनी हुई थी. हालांकि, मौजूदा विवाद के कुछ मुद्दे तब भी थे, फिर भी उनसे निपटने के तंत्र की एक वैश्विक व्यवस्था थी. ये अलग बहस का विषय है कि वो व्यवस्था कितनी सफल या अफसल रही, लेकिन एक नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति पश्चिमी देशों की प्रतिबद्धता स्पष्ट थी. अब 2026 तक आते-आते ऐसा लग रहा है कि पश्चिमी देश खुद इस व्यवस्था को ध्वस्त कर रहे हैं. इससे अन्य देशों को नई वैश्विक व्यवस्था को आकार देने में दावेदार के रूप में उभरने का मौका मिल रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ये पल पश्चिम के 'अंत' का प्रतीक है या बाकी देशों के 'उदय' का रास्ता साफ कर रहा है. इस पर फिलहाल कोई स्पष्ट राय बनाना जल्दबाजी होगा.

भारत और मध्य-पूर्व के लिए इसके क्या मायने हैं?

दशकों से चली आ रही अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का विघटन तेज़ी से हुआ है. भारतीय उपमहाद्वीप और मध्य पूर्व दोनों पर ही इस नई वास्तविकता का प्रभाव पड़ा है. भारतीय उपमहाद्वीप और मध्य-पूर्व दोनों ही टैरिफ और व्यापार समझौतों को लेकर अमेरिका के साथ गतिरोध में फंसे हैं. मध्य-पूर्व की स्थिति और जटिल है. अरब देशों और अमेरिका के बीच 1940 के दशक से चली आ रही सैन्य और रक्षा साझेदारियां अस्थिरता से जूझ रही हैं. 2026 तक, इस पश्चिमी बहुपक्षीय व्यवस्था में दरारें काफी चौड़ी हो चुकी हैं. भारत, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों के लिए मौजूदा दौर एक नई राजनीतिक व्यवस्था के भविष्य को आकार देने का अवसर पेश कर रहा है. सवाल ये है कि, क्या ये देश नई व्यवस्था को आकार देने के लिए तैयार हैं, या बदलाव का ये क्षण समय से पहले आ गया है?

ये अलग बहस का विषय है कि वो व्यवस्था कितनी सफल या अफसल रही, लेकिन एक नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति पश्चिमी देशों की प्रतिबद्धता स्पष्ट थी. अब 2026 तक आते-आते ऐसा लग रहा है कि पश्चिमी देश खुद इस व्यवस्था को ध्वस्त कर रहे हैं. इ

भारत द्वारा अरब नेताओं की मेज़बानी करने से फिलिस्तीन पर नई दिल्ली की स्थिति को मज़बूत करने में मदद मिली, जिसे भारत ने आधिकारिक तौर पर 1988 में मान्यता दी थी. हालांकि, भारत पिछले कुछ साल से मध्य-पूर्व में संतुलन बनाने की कोशिश में लगा हुआ है, जो ग़ाज़ा युद्ध और ईरान से जुड़े नए तनावों दोनों से प्रभावित है. अरब शिखर सम्मेलन के दौरान, भारत के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पवन कपूर ईरान गए थे. ये ऐसे समय हुआ, जब अमेरिका के साथ ईरान तनाव काफी बढ़ गया था. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर बातचीत का दबाव बनाने के लिए उसके चारों तरफ एक बड़ा सैन्य बेड़ा तैनात कर दिया था. इसके साथ ही, ऐसी खबरें भी आईं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस महीने के अंत में इज़राइल का दौरा कर सकते हैं.

हाल ही में, स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने एक भाषण दिया, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि अंतर्राष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था की कहानी "आंशिक रूप से झूठी" थी. मार्क कार्नी ने ये भी कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की वैश्विक व्यवस्था को आकार देने वाले बड़े देशों ने व्यापार से लेकर सुरक्षा तक के विभिन्न क्षेत्रों में इस प्रणाली से लाभ उठाया. इन बड़े देशों में कनाडा भी शामिल था और इन देशों की मदद से ही दुनिया पर अमेरिकी प्रभुत्व स्थापित किया गया था. ये अलग बात है कि आजकल मार्क कार्नी को खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है. इससे उत्तरी अमेरिका के इन दो अच्छे पड़ोसी देशों के संबंधों में तनाव पैदा हो रहा है.

भारत और मध्य-पूर्व

पिछले कुछ साल में, 'रणनीतिक स्वायत्तता' की अवधारणा ने भारत और मध्य-पूर्व में विदेश नीति पर होने वाली बहसों को चुनौती दी है, साथ ही उन्हें नई ऊर्जा भी प्रदान की है. इस बदलाव का पहला संकेत 2022 में संयुक्त राष्ट्र में देखने को मिला, जब अरब देशों ने यूक्रेन युद्ध के दौरान तटस्थता बनाए रखने के उद्देश्य से रूस के ख़िलाफ अमेरिका और यूरोप का स्पष्ट रूप से समर्थन नहीं दिया. हालांकि, गुटनिरपेक्षता आंदोलन के संस्थापक रह चुके भारत के लिए ये दृष्टिकोण नया नहीं था, लेकिन मध्य-पूर्व में इस तरह की तटस्थता की रणनीति अपनाने के परिणाम कहीं अधिक गंभीर थे. अमेरिका की सुरक्षा गारंटी से बंधे होने के बावजूद ये अरब देश रणनीतिक स्वायत्तता चाहते हैं, जबकि भारत के सामने ऐसी कोई बाध्यता नहीं है.

भारत की विदेश नीति उसकी भौगोलिक परिस्थितियों और 1947 में आज़ादी के बाद से चली आ रही कूटनीतिक परंपराओं पर आधारित हैं. भारत आमतौर पर किसी गुट में शामिल होने, या खुले तौर पर किसी का पक्ष लेने से परहेज करता है. अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ भारत भी क्वाड का सदस्य है. इसके साथ ही, वो शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) और ब्रिक्स में भी भाग लेता है, जहां रूस और चीन प्रमुख भूमिका निभाते हैं. भारत को किसी एक गुट का सदस्य नहीं होने का फायदा भी मिलता है. भारतीय वायु सेना रूस के साथ मिलकर ब्रह्मोस मिसाइल बना रही है, फ्रांस से मिराज़ 2000 फाइटर प्लेन की फ्लीट ले रही है और इज़राइल में बने SCALP-2000 बम भी भारत को मिल रहे हैं.

भारत को किसी एक गुट का सदस्य नहीं होने का फायदा भी मिलता है. भारतीय वायु सेना रूस के साथ मिलकर ब्रह्मोस मिसाइल बना रही है, फ्रांस से मिराज़ 2000 फाइटर प्लेन की फ्लीट ले रही है और इज़राइल में बने SCALP-2000 बम भी भारत को मिल रहे हैं.

वहीं मध्य-पूर्व में रणनीतिक स्वायत्तता की अवधारणा ने एक अलग ही मोड़ ले लिया है. क़तर, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों ने खुद को महत्वपूर्ण अरब शक्तियों के रूप में स्थापित किया है. ये कुछ हद तक बड़े संघर्षों में मध्यस्थता करने में सक्षम हैं. यही कारण है कि यूक्रेन के साथ संघर्ष के बाद भी इन्होंने रूस के साथ संबंध बनाए रखे हैं. नाटो के सदस्य तुर्किए ने भी यही रास्ता अपनाया है. काला सागर क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति का इस्तेमाल तुर्किए खुद को कूटनीति के केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए कह रहा है. दोहा, रियाद और अबू धाबी सहित अन्य देशों ने रूस, यूक्रेन और ईरान जैसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक मुद्दों पर नए युग के मध्यस्थ के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर ली है.

ये राजनीतिक और कूटनीतिक गतिविधियां महत्वपूर्ण चुनौतियों के बीच हो रही हैं. इन्हीं बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच अपनी स्थिति और हितों को मज़बूत करने के उद्देश्य से इन देशों को अपनी नीति में लचीलापन बनाए रखना ज़रूरी है. खाड़ी देशों से भारत के हित भी जुड़े हैं, क्योंकि 14 लाख से ज्यादा भारतीय नागरिक अरब देशों में रहते हैं और इनकी अर्थव्यवस्था का आकार 4.18 ट्रिलियन डॉलर है. भारत लंबे समय से बहुध्रुवीयता का समर्थक रहा है. बहुध्रुवीयता का अर्थ है किसी एक महाशक्ति का ना होना, सत्ता के कई केंद्र होना. भारत खुद को एशिया में ऐसे ही एक शक्ति केंद्र के रूप में देखता है. अरब सागर से लेकर भारत के तटों तक, खाड़ी क्षेत्र में भी सत्ता का केंद्र बनने की होड़ ज़ोरों पर है. पहले की व्यवस्था के अनुसार, मध्य-पूर्व में तीन सत्ता केंद्र थे, अरब शक्तियां, इज़राइल और ईरान. हालांकि, अब सामरिक समीकरणों में आए बदलावों ने अरब जगत में नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता और असहमति पैदा कर दी है.

बहुध्रुवीय विश्व का सपना: चुनौतियां और अवसर

आखिर में, ये सवाल उठता है कि क्या उभरती हुई शक्तियां पश्चिमी देशों द्वारा छोड़े गए रिक्त स्थानों को भरने की तैयारी में पिछड़ गई है? इसका उत्तर हैं कि, हां पिछड़ गई है. मैटियस स्पेक्टर जैसे स्कॉलर तर्क देते हैं कि कनाडा के प्रधानमंत्री कार्नी द्वारा पश्चिमी देशों के पाखंड की आलोचना वैध हो सकती है, लेकिन एक हकीक़त ये भी है कि दुनिया को मौजूदा वैश्विक व्यवस्था की याद सताएगी. बहुध्रुवीय भविष्य का जो खाका दिख रहा है, वो अंतर्राष्ट्रीयता अस्थिरता का कारण बन सकता है.

मध्य-पूर्व के देश या क्षेत्रीय शक्तियां इस खाली स्थान को भरने के लिए कैसे समन्वय करेंगी, ये अभी स्पष्ट नहीं है. इससे भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक जैसे मौजूदा मंचों के भीतर एक नए संवाद को बढ़ावा देने का अवसर मिलता है. अन्य सभी पक्षों की तुलना में, भारत इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने और वर्तमान में दिशाहीन राजनयिक तंत्रों को फिर से ज़िंदा करने के लिए बेहतर स्थिति में है. अगर भारत और मध्य-पूर्व एक बहुध्रुवीय संरचना में शक्ति के दो ध्रुवों का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो अगली वैश्विक व्यवस्था को आकार देने के लिए इन्हें बिना किसी देरी के इस दिशा में मिलकर काम शुरू कर देना चाहिए.


ये लेख ओआरएफ मिडिल ईस्ट में प्रकाशित हो चुका है.

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