कभी सिर्फ व्यापार बढ़ाने के लिए चर्चित IMEC और ग्रेटर मेकांग जैसे कॉरिडोर आज वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद अहम बन गए हैं. बढ़ते युद्ध और सप्लाई संकट के बीच ये कॉरिडोर दुनिया को सुरक्षित खाद्य आपूर्ति का नया रास्ता कैसे दे सकते हैं? जानें.
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2026 में इज़राइल–अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष जैसे भू-राजनैतिक व्यवधान अब वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं में गहराई तक असर डाल रहे हैं. यह व्यापारिक चोकपॉइंट्स पर अत्यधिक निर्भरता की संरचनात्मक कमजोरियों को दर्शाता है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया के लगभग 38 प्रतिशत कच्चे तेल, 13 प्रतिशत रसायन जैसे उर्वरक और 2.4 प्रतिशत सूखा थोक माल जैसे अनाज का परिवहन होता है. इस चोकपॉइंट के अस्थिर होने से इसके झटके केवल ऊर्जा बाजारों तक सीमित नहीं रहे हैं. प्राकृतिक गैस की कीमतें बढ़ने से नाइट्रोजन आधारित उर्वरक महंगे हो गए हैं. इससे गरीब देशों में उनकी उपलब्धता कम हुई है. खाड़ी देशों पर एशिया की उर्वरक निर्भरता के कारण पूरे क्षेत्र का कृषि उत्पादन खतरे में आ गया है.
जैसे-जैसे उर्वरक और ईंधन की लागत बढ़ रही है, लागत-प्रेरित खाद्य मुद्रास्फीति का खतरा बढ़ता जा रहा है, जबकि खाद्य उत्पादन पर दबाव बढ़ रहा है. मार्च 2026 के विश्व बैंक के अनुमान बताते हैं कि खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति की वृद्धि दर सभी वस्तुओं और सेवाओं की तुलना में अधिक है.
भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया और डाय-अमोनियम फॉस्फेट आयातक है - पहले ही इंडोनेशिया, बेलारूस, रूस और चीन जैसे देशों की ओर अपने आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है. उर्वरक कीमतों में बढ़ते दबाव को देखते हुए भारत ने 2025 से पोषक-आधारित सब्सिडी में 11.6 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा की है और अन्य उर्वरकों के लिए भी अतिरिक्त सहायता प्रदान कर रहा है. जैसे-जैसे उर्वरक और ईंधन की लागत बढ़ रही है, लागत-प्रेरित खाद्य मुद्रास्फीति का खतरा बढ़ता जा रहा है, जबकि खाद्य उत्पादन पर दबाव बढ़ रहा है. मार्च 2026 के विश्व बैंक के अनुमान बताते हैं कि खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति की वृद्धि दर सभी वस्तुओं और सेवाओं की तुलना में अधिक है.
मध्य पूर्व का यह संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय सुरक्षा संकट नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक खाद्य और कृषि आपूर्ति श्रृंखलाओं की बड़ी परीक्षा बन चुका है. पहले से ही कम लाभ पर काम कर रहे किसानों के लिए इसके परिणाम गंभीर हैं. उर्वरकों की ऊंची कीमतें किसानों को कम इनपुट उपयोग करने या कम इनपुट वाली फसलों की ओर जाने के लिए मजबूर कर सकती हैं, जिससे उत्पादन और आय दोनों घट सकते हैं. इस चोकपॉइंट संकट ने विभिन्न देशों के कृषि निर्यात प्रवाह को भी बाधित कर दिया है. बढ़ती माल ढुलाई लागत के कारण भारत के लगभग 4 लाख टन बासमती चावल बंदरगाहों पर अटक गए हैं, जबकि लगभग 200 कंटेनर नष्ट होने योग्य भारतीय निर्यात बंदरगाहों और होल्डिंग जोनों में फंसे हुए हैं, जिनका भविष्य अनिश्चित बना हुआ है.
यदि यह संघर्ष और बढ़ता है, तो वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दबाव और गहरा सकता है, जैसा कि अन्य भू-राजनैतिक झटकों के दौरान भी देखा गया है. रूस–यूक्रेन युद्ध के शुरुआती चरणों में कृषि वस्तुओं की कीमतों में तेज वृद्धि और भारी अस्थिरता देखी गई थी. इसी तरह, लाल सागर में हूती हमले और स्वेज नहर के आसपास रुकावटों ने खाद्य वस्तु बाजारों को उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए अस्थिर कर दिया है.
खाद्य पहुंच, वहनीयता और आपूर्ति स्थिरता की रक्षा के लिए नियम-आधारित व्यवस्था पर आधारित विशेष सुरक्षा उपाय स्थापित किए जाने चाहिए. दिसंबर 2025 में आयोजित खाद्य पर विश्व व्यापार संगठन व्यापार संवाद में भी इस बात को दोहराया गया, जहां नेताओं ने माना कि ‘खाद्य व्यापार एक नैतिक दायित्व है.
ऐसे व्यवधान अक्सर इस बात को दर्शाते हैं कि देश किस तरह भू-राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए आपूर्ति श्रृंखलाओं का हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन जब खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं का हथियारीकरण होता है, तो इसकी कीमत केवल उत्पादकों को ही नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं को भी भूख, कुपोषण और खाद्य असुरक्षा के रूप में चुकानी पड़ती है.
खाद्य व्यवधानों की मानवीय कीमत तुरंत सामने आती है. यही कारण है कि वैश्विक संकटों के दौरान खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को एक विशेष श्रेणी के रूप में देखा जाना चाहिए. खाद्य पहुंच, वहनीयता और आपूर्ति स्थिरता की रक्षा के लिए नियम-आधारित व्यवस्था पर आधारित विशेष सुरक्षा उपाय स्थापित किए जाने चाहिए. दिसंबर 2025 में आयोजित खाद्य पर विश्व व्यापार संगठन व्यापार संवाद में भी इस बात को दोहराया गया, जहां नेताओं ने माना कि ‘खाद्य व्यापार एक नैतिक दायित्व है.
हालांकि तत्काल राहत उपाय किए जा रहे हैं, फिर भी व्यापारिक चोकपॉइंट्स की संरचनात्मक कमजोरियों को दूर करना आवश्यक है. खाद्य आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए नए व्यापारिक रास्ते बनाना जरूरी है. इससे किसानों को बेहतर बाजार, स्थिर व्यापार, अधिक निवेश और संकट के समय भी खाद्य सुरक्षा मिलेगी. क्षेत्रीय व्यापार समूह अब इस महत्व को समझने लगे हैं, जैसे भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा. 2023 में घोषित यह गलियारा भारत को संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और ग्रीस के माध्यम से यूरोप से जोड़ेगा, जिससे समुद्री चोकपॉइंट्स पर निर्भरता कम होगी.
यदि ये संस्थागत समर्थन मजबूत हों, तो आर्थिक गलियारे ऐसे लचीले व्यापारिक मार्ग बन सकते हैं जो खाद्य प्रणालियों को भू-राजनैतिक झटकों से बचाने, लेन-देन लागत घटाने और अधिक सुरक्षित व विविधीकृत कृषि बाजार तैयार करने में सक्षम होंगे.
आसियान अब आर्थिक गलियारों को आसियान आर्थिक समुदाय के तहत गहरे क्षेत्रीय एकीकरण के आधार के रूप में देख रहा है. कंबोडिया में, दक्षिणी आर्थिक गलियारे और दक्षिणी तटीय गलियारे के साथ चावल, मक्का, कसावा और आम की फसलों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए गलियारा-आधारित हस्तक्षेप किए जा रहे हैं. वहीं लाओस में विकास प्रयास चावल और जैविक सब्जियों पर केंद्रित हैं, जिनमें पूर्व-पश्चिम आर्थिक गलियारा के आसपास उगाई जाने वाली फसलें भी शामिल हैं. नए व्यापारिक रास्ते भू-आवेष्ठित देशों को बाजारों और बंदरगाहों से जोड़कर खेती और व्यापार बढ़ाने में मदद करते हैं.
ग्रेटर मेकांग उपक्षेत्र के गलियारे इस मॉडल की सफलता का सबसे स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. यहां निवेश के साथ वार्षिक आर्थिक वृद्धि में 6–8 प्रतिशत तक बढ़ोतरी और अत्यधिक गरीबी में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई है. इसकी दोहराने योग्य क्षमता ही इस मॉडल को इतना प्रभावशाली बनाती है. दक्षिण-पूर्व एशिया के कई उप-क्षेत्रीय समूह पहले ही इसे अपना रहे हैं और इसी तरह के मॉडल को दक्षिण एशिया और मध्य एशिया तक विस्तार देने की नींव भी मौजूद है.
लेकिन आर्थिक गलियारे केवल अवसंरचना विकास पर निर्भर नहीं करते. साझा राजनीतिक समझ और इच्छाशक्ति विकसित करने के लिए भी कदम उठाने होंगे. अवसंरचना के पीछे मौजूद संस्थागत ढांचा - जैसे साझा मानक, विवाद समाधान तंत्र, निवेश ढांचे, सीमा शुल्क समन्वय और परस्पर-संगत डेटा प्रणालियां ही तय करेंगे कि ये गलियारे सफल होंगे या नहीं. यदि ये संस्थागत समर्थन मजबूत हों, तो आर्थिक गलियारे ऐसे लचीले व्यापारिक मार्ग बन सकते हैं जो खाद्य प्रणालियों को भू-राजनैतिक झटकों से बचाने, लेन-देन लागत घटाने और अधिक सुरक्षित व विविधीकृत कृषि बाजार तैयार करने में सक्षम होंगे.
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Shruti is an Associate Fellow at the Centre for Development Studies, Observer Research Foundation (ORF), where her research examines the intersections between policy, economic diplomacy ...
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