Author : Harsh V. Pant

Published on Mar 02, 2026 Commentaries 1 Days ago

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली ख़ामेनेई की मौत के बाद से हालात बेहद खराब हैं. भारत पर भी इसका असर पड़ रहा है. इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के बाद भारत और ईरान के रिश्तें लंबे समय के लिए खराब हो सकते हैं.

ख़ामेनेई की मौत: भारत के लिए नई भू-राजनीतिक चुनौती

शनिवार यानी 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई तेहरान दफ्तर में मारे गए. ईरान के सरकारी मीडिया ने इसकी पुष्टि की. जवाबी कार्रवाई में ईरान ने इराक, खाड़ी देशों और इजरायल में अमेरिकी बेसों पर मिसाइल दागीं.

तय थे वारिस: ख़ामेनेई की हत्या के बाद ईरान की सत्ता खाली हो गई. वहां का संविधान कहता है कि एक्सपर्ट्स असेंबली जब तक उत्तराधिकारी न चुन ले तब तक तीन लोगों की अस्थायी काउंसिल ही सुप्रीम अथॉरिटी संभालेगी. इसमें राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, जुडिशरी प्रमुख गुलाम होसैन मोहसेनी इजेही और गार्डियन काउंसिल ज्यूरिस्ट शामिल हैं. कहा जा रहा है कि ख़ामेनेई ने पिछले साल ही युद्ध के दौरान कई संभावित वारिस तय कर लिए थे. इनमें ईरानी मदरसे के प्रमुख अयातुल्ला अलीरेज अराफी, अयातुल्ला मोहसेन अराकी और अयातुल्ला हशेम हुसैनी बुशहरी और संभवत: जुडिशरी प्रमुख मोहसेनी इजेही शामिल हैं. इसके अलावा, ख़ामेनेई के 56 वर्षीय बेटे मोजतबा ख़ामेनेई और हसन खुमैनी का भी नाम है.

संभावना है कि अमीरों के बीच संघर्ष होगा, बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन किए जाएंगे या दलबदल के बीच सरकार गिर जाएगी. हालांकि, ऐसा नहीं लगता कि लोकतंत्र आएगा.

IRGC रीढ़: तीन संभावना जताई जा रही है. पहली, यथास्थिति बरकरार रखना. इसके तहत मौलवी आइडियोलॉजी बरकरार रहेगी और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ताकत देती रहेगी. दूसरी, IRGC को सीधे मिलिट्री टेकओवर, सुरक्षा सिस्टम का दबदबा और मौलवी संस्थाओं को हटाया जाएगा. तीसरी संभावना है कि अमीरों के बीच संघर्ष होगा, बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन किए जाएंगे या दलबदल के बीच सरकार गिर जाएगी. हालांकि, ऐसा नहीं लगता कि लोकतंत्र आएगा.

टकराव का खतरा: ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर है. देश प्रतिबंध, महंगाई, करेंसी में गिरावट जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है. अगर नया नेतृत्व भी कट्टरपंथी होता है, तो अमेरिका के साथ टकराव बढ़ने का खतरा है. सिर्फ एक व्यावहारिक और बातचीत के लिए तैयार नया नेता ही प्रतिबंधों में राहत दिला सकता है. लेकिन, अगर लोगों को लगा कि वह दबाव में झुक कर समझौता कर रहा है, तो घरेलू मोर्चे पर मुश्किल होगी.

अमेरिका का विरोध: ईरान ने जवाबी कार्रवाई में इराकी कुर्दिस्तान और खाड़ी देशों सहित दो दर्जन से अधिक अमेरिकी बेस को निशाना बनाया. दोहा, दुबई और मनामा में भी हमले हुए. इजरायल ने अधिकतर मिसाइलें नष्ट कर दीं, लेकिन पूरे देश में सायरन बजा. इराक, यमन और लेबनान में ईरान समर्थित मिलिशिया संघर्ष बढ़ाने को तैयार हैं. आर्म्ड फोर्सेज के प्रमुख मौसवी, रक्षा मंत्री नासिरजादेह और IRGC प्रमुख पाकपुर जैसे वरिष्ठ कमांडरों की हत्या से कमांड एंड कंट्रोल कमजोर हुआ. बगदाद से कराची और श्रीनगर तक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

विदेश मंत्रालय ने गहरी चिंता जताई और बातचीत की अपील की. ईरान की दिल्ली एम्बेसी ने सार्वजनिक रूप से शोक व्यक्त किया, जबकि कश्मीर और लखनऊ में शिया समुदाय ने विरोध किया. कुल मिलाकर ख़ामेनेई की मौत से अभी हालात अस्थिर हो सकते हैं. तेल महंगा हो सकता है और क्षेत्र में तनाव बढ़ सकता है.

बदलाव संभव: 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है. हिज्बुल्लाह, हूती और इराकी मिलिशिया ने प्रमुख संरक्षक और स्ट्रेटेजिक कोऑर्डिनेटर खो दिया है. छोटे हमले हो सकते हैं, लेकिन तेहरान के निर्देश और फंडिंग के बिना प्रॉक्सी वॉर कमजोर पड़ सकती है. कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं. आने वाले हफ्तों में एक्सपर्ट्स असेंबली की बैठक, IRGC की मजबूती या कमजोरी और आम लोगों का गुस्सा जैसी तीन बातों पर ध्यान रहेगा. ख़ामेनेई की मौत से 36 साल का संतुलन टूट गया है. ईरान अब बिना परखी हुई काउंसिल, विरोधी दावेदार और युद्ध की परिस्थितियों में खड़ा है.

भारत पर असर: ख़ामेनेई की हत्या भारत के लिए भी गंभीर गंभीर चुनौती है. ईरान के साथ आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक रिश्ते हैं. होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल पर निर्भर भारत की ऊर्जा सुरक्षा जोखिम में है. ईरान की जवाबी कार्रवाई, शिपिंग रुकावट और स्ट्रेट बंद होने की धमकियों से कच्चा तेल 100 डॉलर से अधिक प्रति बैरल तक जा सकता है, जिससे फ्यूल, ट्रांसपोर्ट और दवाएं महंगे हो सकते हैं. चाबहार पोर्ट, लंबे निवेश और 2024 एग्रीमेंट के बावजूद नेतृत्व परिवर्तन, गुटबाजी और अमेरिकी प्रतिबंध से अनिश्चितता है. इससे पाकिस्तान को बाईपास करने और चीन के असर को कम करने की भारत की रणनीति प्रभावित हो सकती है.

रहेगी उथल-पुथल: डिप्लोमैटिक स्तर पर भारत नाजुक संतुलन बनाए रखता है. विदेश मंत्रालय ने गहरी चिंता जताई और बातचीत की अपील की. ईरान की दिल्ली एम्बेसी ने सार्वजनिक रूप से शोक व्यक्त किया, जबकि कश्मीर और लखनऊ में शिया समुदाय ने विरोध किया. कुल मिलाकर ख़ामेनेई की मौत से अभी हालात अस्थिर हो सकते हैं. तेल महंगा हो सकता है और क्षेत्र में तनाव बढ़ सकता है. आगे नया नेता कौन और कैसा होगा, इसी पर भारत की कूटनीति निर्भर करेगी.


यह लेख नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है. 

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Harsh V. Pant

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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...

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