Author : Kabir Taneja

Originally Published हिंदुस्तान टाइम्स Published on Dec 30, 2025 Commentaries 0 Hours ago

पश्चिम एशिया और भारत में बढ़ते आतंकी हमले बताते हैं कि आतंकवाद अब भी एक गंभीर वैश्विक खतरा है. ऐसे समय में मोदी का जॉर्डन दौरा आतंक के ख़िलाफ़ भारत की स्पष्ट सुरक्षा सोच को दर्शाता है.

भारत और जॉर्डन: आतंक के ख़िलाफ़ नई साझेदारी

इस महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा हाशमाइट साम्राज्य के देश जॉर्डन का पहला पूर्णकालिक दौरा ऐसे समय में हुआ है जो न केवल पश्चिम एशिया की अपनी क्षेत्रीय भू-राजनीति बल्कि दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था के हिसाब से भी महत्वपूर्ण है. अक्टूबर 2023 में इज़रायल पर हमास के आतंकी हमलों और उसके बाद गाज़ा व लेबनान में शुरू हुए युद्ध के बाद पैदा हालात से निपटने में जॉर्डन सबसे सक्रिय भूमिका निभा रहा है,पिछले कुछ वर्षों के दौरान पश्चिम एशिया और भारत- दोनों आतंकवादी हमलों का शिकार हुए हैं. इससे एक ऐसा वैश्विक संकट सामने आया है जिसे बहुपक्षीय मंचों पर अनदेखा किया गया है. इसका कारण ये है कि 9/11 के बाद अमेरिका ने आतंक से मुकाबला करने के लिए जो सैन्य, राजनीतिक और क़ानूनी ताकत लगा दी थी, उसे वापस ले लिया है. वैसे तो अमेरिका पश्चिम एशिया और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में लक्षित और सीमित आतंकवाद विरोधी अभियान को लेकर प्रतिबद्ध बना हुआ है लेकिन ऐसे हालात में क्षेत्रीय ताकतों को ही इस इलाके की सुरक्षा संरचना में कमियों को पूरा करना होगा, भले ही वो अपनी इच्छा से करें या मजबूरी में. प्रधानमंत्री मोदी के जॉर्डन दौरे के कुछ ही दिनों बाद अमेरिका ने जॉर्डन के साथ मिलकर सीरिया के भीतर हवाई हमले किए. इस दौरान इस्लामिक स्टेट (IS) के आतंकी नेटवर्क से जुड़े 70 ठिकानों को निशाना बनाया गया.

जॉर्डन के साथ भारत का सुरक्षा सहयोग सही अवसर पर हुआ है और मोदी की जॉर्डन यात्रा ने द्विपक्षीय संबंधों में एक व्यक्तिगत स्पर्श जोड़ा है. जॉर्डन के किंग अब्दुल्लाह II ने कट्टरपंथ और चरमपंथ के ख़िलाफ़ लगातार आवाज़ उठाई है. 

जॉर्डन के साथ भारत का सुरक्षा सहयोग सही अवसर पर हुआ है और मोदी की जॉर्डन यात्रा ने द्विपक्षीय संबंधों में एक व्यक्तिगत स्पर्श जोड़ा है. जॉर्डन के किंग अब्दुल्लाह II ने कट्टरपंथ और चरमपंथ के ख़िलाफ़ लगातार आवाज़ उठाई है. ये ऐसा विषय है जिसका ज़िक्र प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी यात्रा के दौरान सार्वजनिक बातचीत में किया. 2018 में अब्दुल्ला ने अपने भारत दौरे में दिल्ली में भाषण के दौरान इस्लामिक विरासत: समझ और संयम को बढ़ावा शीर्षक से अपने भाषण के दौरान इनमें से कुछ मुद्दों पर ध्यान दिया. मोदी सरकार ने भी कट्टरपंथ ख़त्म करने से जुड़े कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया है. इसके साथ-साथ सूफीवाद को इस्लाम के भीतर अधिक उदार और आधुनिक वैचारिक दिशा के रूप में आगे किया है. यही वो विषय हैं जहां भारत और जॉर्डन जैसे देशों के बीच सुरक्षा संबंधों को सही मायने में मज़बूत किया जा सकता है. 2025 में आतंकवाद के ख़िलाफ़ दुनिया की लड़ाई टूट और मतभेद के कगार पर पहुंच गई है (जिसे महाशक्तियों के बीच मुकाबले और यूक्रेन एवं गाज़ा जैसे युद्धों और क्षेत्रीय घुसपैठ ने बढ़ाया है) लेकिन आतंक एवं हिंसक चरमपंथ का मुकाबला करने के अधिक मूलभूत पहलुओं को भारत और जॉर्डन के बीच विकसित किया जा सकता है जिससे दीर्घकालिक लाभ होगा. इन लाभों में उदारवादी इस्लामिक सांस्कृतिक संबंध एवं आदान-प्रदान को संस्थागत रूप देना, कट्टरता का मुकाबला करने की पद्धतियों एवं ब्लूप्रिंट में सहयोग देना, खुफिया एवं सुरक्षा एजेंसियों के बीच जानकारी साझा करने के लिए सक्रिय प्रारूप का उपयोग करना और यहां तक कि दक्षिण एवं पश्चिम एशिया की सुरक्षा चुनौतियों को लेकर नियमित रूप से भारत-जॉर्डन के बीच बातचीत के लिए अम्मान को आधार के रूप में इस्तेमाल करना शामिल है. इस तरह कट्टरता का मुकाबला करने वाली सिविल सोसायटी और समूहों को बढ़ावा मिलेगा. 

इस बदलाव के दौर में भारत और जॉर्डन जैसे देश अपने द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग को मज़बूत करने के लिए अच्छी स्थिति में हैं. 

भारत-जॉर्डन सुरक्षा सहयोग सही समय पर

आगे बढ़ें तो हिंसक अतिवाद एक ऐसा ख़तरा है जो इतनी जल्दी ख़त्म होने वाला नहीं है. अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़े से लेकर “सुधरे” हुए जिहादी अहमद अल शरा के सीरिया का राष्ट्रपति बनने तक- आतंकवाद का मुकाबला करने की दिशा संपूर्ण ख़ात्मे से सुलह की तरफ बढ़ती दिख रही है. जॉर्डन ने सीरिया के प्रति समर्थन को दोहराया है और अल शरा ने तीन बार जॉर्डन का दौरा किया है. भारत ने कई वर्षों तक सावधानी बरतने के बाद पिछले दिनों काबुल में तालिबान के साथ कूटनीतिक आदान-प्रदान शुरू किया है लेकिन इस राह का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है. 

सभी अनुमानों के हिसाब से आने वाले वर्षों में आतंकवाद का ख़तरा कम होने के बदले बढ़ने की ही आशंका है. जैसे-जैसे सामूहिक सुरक्षा का विचार कमज़ोर होता जा रहा है, वैसे-वैसे चरमपंथी समूह और संगठन अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में मौजूद दरारों का फायदा उठाने के लिए अच्छी स्थिति में होंगे. इस बदलाव के दौर में भारत और जॉर्डन जैसे देश अपने द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग को मज़बूत करने के लिए अच्छी स्थिति में हैं. 


ये लेख मूल रूप से हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुआ था. 

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Kabir Taneja

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Kabir Taneja is a Deputy Director and Fellow, Middle East, with the Strategic Studies programme. His research focuses on India’s relations with the Middle East ...

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